26 दिसंबर 2025: 2025 का साल भारतीय छात्रों के लिए विदेशी सपनों का काला अध्याय साबित हुआ। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, रूस और यूएई जैसे देशों में उच्च शिक्षा की चकाचौंध के बीच कम से कम 20 से अधिक छात्रों की असमय मौत ने पूरे देश को सदमे में डाल दिया। हिंसक अपराधों से लेकर अचानक चिकित्सकीय आपातकाल तक, ये घटनाएं न केवल परिवारों को तोड़ रही हैं, बल्कि विदेश पढ़ाई के जोखिमों पर सवाल खड़े कर रही हैं। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में अब तक 20 से अधिक छात्रों की मौत दर्ज हुई, जिनमें अधिकांश शहरी हिंसा, हृदयाघात और रहस्यमय परिस्थितियां शामिल हैं। ये आंकड़े पिछले वर्षों के मुकाबले 15 प्रतिशत अधिक हैं, जब 2018-2024 के बीच 842 छात्रों की मौत हुई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती संख्या के साथ-साथ, आर्थिक दबाव, सांस्कृतिक अलगाव और खराब सुरक्षा व्यवस्था इन मौतों को बढ़ावा दे रही है।
साल की शुरुआत ही दुखद रही। मार्च 2025 में नीदरलैंड्स के आइंडहोवेन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (TU/e) के छात्र देवेश बापट (23 वर्ष) का शव जर्मनी में मिला। वे लापता होने के बाद मृत पाए गए, और प्रारंभिक जांच में कोई संदिग्ध परिस्थिति नहीं मिली। परिवार ने बताया कि देवेश आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे और पार्ट-टाइम जॉब के चक्कर में रातें बिताते थे। इसी महीने, अमेरिका में कई मामले सामने आए, जहां छात्रों को नाइट शिफ्ट की मजबूरी में जोखिम भरी नौकरियां करनी पड़ रही थीं।
अक्टूबर 2025 में यूएई के दुबई में मिडलसेक्स यूनिवर्सिटी के छात्र वैष्णव कृष्णकुमार (18 वर्ष) की अचानक हृदयाघात से मौत हो गई। वे एक सामान्य पार्टी के दौरान गिर पड़े, और अस्पताल पहुंचने से पहले ही चल बसे। डॉक्टरों ने तनाव और अनियमित जीवनशैली को कारण बताया। उसी महीने, टेक्सास के डेंटन में यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ टेक्सास के पोस्टग्रेजुएट छात्र चंद्रशेखर पोल (28 वर्ष) को गैस स्टेशन पर लूट के दौरान गोली मार दी गई। वे पार्ट-टाइम जॉब कर फीस का इंतजाम कर रहे थे। यह घटना अमेरिकी शहरी अपराध की भयावहता को उजागर करती है, जहां भारतीय छात्र लक्ष्य बन रहे हैं।
नवंबर में रूस के उफा में बश्किर स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी के छात्र अजित सिंह चौधरी (22 वर्ष) का शव एक बांध के पास मिला। वे लापता होने के बाद मृत पाए गए, और कारण स्पष्ट नहीं हो सका। रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच कई छात्रों को नौकरी के लालच में फौज में भर्ती कराया गया, जैसे राकेश कुमार मौर्या (30 वर्ष) और अजय गोदारा, जिनकी मौतें दिसंबर में दर्ज हुईं। ब्रिटेन के वूस्टर में यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट ऑफ इंग्लैंड के छात्र विजय कुमार शोरान (30 वर्ष) को चाकू मारकर हत्या कर दी गई। वे सरकारी नौकरी छोड़ उच्च शिक्षा के लिए गए थे।
दिसंबर का महीना सबसे खतरनाक साबित हुआ। 24 दिसंबर को टोरंटो के पास यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो स्कारबरो के छात्र शिवांक अवस्थी (20 वर्ष) को गोली मार दी गई। यह कनाडा का 41वां हत्या कांड था। उसी दिन, अमेरिका में तेलंगाना के छात्र पवन कुमार रेड्डी (एमएस छात्र) दोस्तों के साथ डिनर के दौरान अचानक बीमार पड़ गए। प्रारंभिक रिपोर्ट में हृदयाघात कहा गया, लेकिन सोशल मीडिया पर फूड पॉइजनिंग के दावे हैं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार है। कनाडा में ही हिमांशी खुराना की हत्या पार्टनर हिंसा से जुड़ी पाई गई।
ये मौतें केवल आंकड़े नहीं, बल्कि सपनों का अंत हैं। विदेश मंत्रालय ने चेतावनी जारी की है कि अमेरिका और कनाडा में भारतीय छात्रों की संख्या 13 लाख से अधिक है, लेकिन सुरक्षा उपाय अपर्याप्त हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, आर्थिक बोझ (वार्षिक खर्च 20-30 लाख रुपये) छात्रों को रिस्की जॉब्स की ओर धकेलता है। सांस्कृतिक अलगाव से मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, जिससे सुसाइड रेट बढ़ा। 96 प्रतिशत मौतें चिकित्सकीय या सुसाइड से जुड़ी हैं।
सरकार ने कदम उठाए हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दूतावासों को हेल्पलाइन मजबूत करने को कहा। ‘ट्रैक इंडियन स्टूडेंट्स’ ऐप लॉन्च किया गया, जो रीयल-टाइम लोकेशन शेयरिंग करता है। लेकिन परिवारों का गुस्सा फूट रहा है। शिवांक के पिता ने कहा, “हमारा बेटा सपना लेकर गया, लेकिन लाश लौटी।” एनआरआई संगठन FIIDS ने सर्वे शुरू किया, जिसमें 500 से अधिक छात्रों ने असुरक्षा की शिकायत की।
यह संकट शिक्षा नीति पर पुनर्विचार की मांग करता है। भारत सरकार को विदेशी विश्वविद्यालयों से सुरक्षा प्रोटोकॉल पर समझौते करने चाहिए। छात्रों को प्री-डिपार्चर ट्रेनिंग अनिवार्य हो, जिसमें सेल्फ-डिफेंस और इमरजेंसी कॉन्टैक्ट शामिल हों। माता-पिता को भी जागरूक रहना होगा। 2025 की ये त्रासदियां चेतावनी हैं कि विदेशी डिग्री के साथ सुरक्षा भी प्राथमिकता हो। अन्यथा, लाखों परिवारों के सपने दर्द में बदलते रहेंगे। आखिरकार, शिक्षा जीवन का उत्सव होनी चाहिए, न कि अंतिम संस्कार का कारण।
Sources: टाइम्स ऑफ़ इंडिया