11 दिसंबर 2025: बिहार के सीमांचल क्षेत्र के किशनगंज जिले में सरकारी स्कूलों की स्वच्छता व्यवस्था का दावा करने वाली योजना में करोड़ों रुपये का महाघोटाला सामने आया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालयों की सफाई और रखरखाव के नाम पर गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा झूठे बिलों के जरिए सरकारी खजाने का गबन किया गया। इस मामले का खुलासा जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के ठाकुरगंज विधायक गोपाल अग्रवाल ने किया है, जिससे स्थानीय स्तर पर हड़कंप मच गया है।
स्वच्छ भारत मिशन, जो 2014 में शुरू हुई केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है, का मुख्य उद्देश्य देशभर में खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) गांव और स्कूल बनाना था। बिहार सरकार ने इस योजना के तहत जिले के सरकारी स्कूलों में शौचालय निर्माण, रखरखाव और नियमित सफाई के लिए विभिन्न एनजीओ को जिम्मेदारी सौंपी। किशनगंज जिले में ही करीब 500 से अधिक सरकारी स्कूलों में यह योजना लागू है, जहां प्रति स्कूल मासिक सफाई के लिए 5-10 हजार रुपये आवंटित किए जाते हैं। कुल मिलाकर, पिछले दो वर्षों में इस मद में करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा किया गया। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
विधायक गोपाल अग्रवाल ने जिले के विभिन्न स्कूलों का दौरा कर इस घोटाले की परतें खोलीं। उन्होंने बताया कि नियुक्त एनजीओ ने सफाई के नाम पर फर्जी बिल जमा कर करोड़ों रुपये हड़प लिए, जबकि अधिकांश शौचालयों में महीनों से सफाई नहीं हुई। “लाखों रुपये लेकर भी शौचालय गंदे पड़े हैं। बच्चे बीमार पड़ रहे हैं, लेकिन अधिकारी आंखें बंद किए हुए हैं,” अग्रवाल ने एक वीडियो संदेश में कहा। जांच में पाया गया कि एनजीओ ने कागजों पर साप्ताहिक सफाई का दावा किया, लेकिन वास्तविकता में न तो सफाईकर्मी पहुंचे और न ही कोई रखरखाव हुआ। कुछ स्कूलों में शौचालय टूटे-फूटे पड़े हैं, जहां दीवारें दरक रही हैं और पानी की कमी से उपयोग ही असंभव हो गया है। ठाकुरगंज, बहादुरगंज और किशनगंज सदर के स्कूलों में यह स्थिति सबसे विकट है। एक अनुमान के मुताबिक, घोटाले की राशि 5 करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है।
इस घोटाले का सबसे बड़ा शिकार जिले के हजारों छात्र हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां स्वच्छता की कमी पहले से ही एक समस्या है, वहां गंदे शौचालयों से बच्चों में डायरिया, त्वचा रोग और अन्य संक्रमण बढ़ गए हैं। अभिभावक संगठनों ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरना दिया और मांग की कि दोषी एनजीओ पर तत्काल कार्रवाई हो। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने मामले को संज्ञान में लेते हुए प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है। “हम सभी संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल कर रहे हैं। दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी,” डीईओ ने बताया। साथ ही, उच्च शिक्षा विभाग ने एनजीओ की लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया आरंभ कर दी है।
राजनीतिक हलकों में भी यह मुद्दा गरमा गया है। जदयू ने इसे विपक्षी दलों पर निशाना साधने का मौका बनाया, जबकि आरजेडी ने सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। स्थानीय सांसद ने भी सदन में इसकी चर्चा की मांग की है। सोशल मीडिया पर #KishanganjToiletScam ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग योजना की विफलता पर सवाल उठा रहे हैं।
यह घोटाला न केवल सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि सीमांचल जैसे पिछड़े क्षेत्र के विकास को झटका भी देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता की कमी और निगरानी के अभाव से ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। सुझाव दिया जा रहा है कि सफाई कार्य के लिए डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किया जाए, जहां जीपीएस ट्रैकिंग से कर्मियों की उपस्थिति सुनिश्चित हो। साथ ही, स्थानीय पंचायतों को योजना की निगरानी में शामिल किया जाए।
किशनगंज प्रशासन ने वादा किया है कि जांच पूरी होते ही दोषियों को सजा दी जाएगी और प्रभावित स्कूलों में तत्काल सफाई अभियान चलाया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह घोटाला सिर्फ ऊपरी सतह का है या इससे गहरी साजिश जुड़ी है? आने वाले दिनों में जांच की परिणाम ही सच्चाई उजागर करेंगे। फिलहाल, यह घटना बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती है।