Thailand-Cambodia Border Conflict, 14 दिसंबर 2025 – दक्षिण-पूर्व एशिया की दो पड़ोसी देशों थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद ने एक बार फिर हिंसक रूप धारण कर लिया है। रविवार सुबह कंबोडियाई सेना द्वारा थाई सीमा पर रॉकेट हमलों में कम से कम 7 थाई नागरिक मारे गए, जबकि 22 घायल हो गए। जवाब में थाईलैंड ने ट्राट प्रांत में कर्फ्यू लगा दिया, ईंधन निर्यात रोकने की योजना बनाई और सीमा क्षेत्रों में मार्शल लॉ की घोषणा कर दी। यह संघर्ष प्राचीन प्रह विहार मंदिर विवाद की जड़ों से जुड़ा है, लेकिन हाल के दिनों में जल संसाधनों और सीमा चिह्नों पर अतिक्रमण ने इसे भड़का दिया। संयुक्त राष्ट्र और आसियान ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है, लेकिन स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है, जिससे लाखों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है।
संघर्ष की शुरुआत शनिवार शाम को हुई, जब कंबोडियाई सैनिकों ने थाईलैंड के ट्राट प्रांत के हाट चाईरत गांव पर रॉकेट दागे। स्थानीय मीडिया के अनुसार, हमले में एक स्कूल और दो मंदिर क्षतिग्रस्त हो गए, जिसमें 5 बच्चे और 2 बुजुर्ग मारे गए। थाई प्रधानमंत्री सretta थाविसिन ने इसे “कायराना हमला” करार देते हुए कहा, “हमारी सीमा की रक्षा के लिए हर कदम उठाएंगे।” थाई सेना ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की, जिसमें कंबोडियाई सीमा के पास एक चौकी पर तोपखाने से फायरिंग की गई। कंबोडियाई अधिकारियों के मुताबिक, इस जवाब में 4 सैनिक मारे गए और 15 घायल हुए। चश्मदीदों ने बताया कि रॉकेटों की गूंज से पूरा इलाका थर्रा गया, और लोग घरों से भागे। थाईलैंड के उत्तरी सीमा प्रांतों में भी हलचल बढ़ गई, जहां हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित हो रहे हैं।
थाईलैंड की प्रतिक्रिया तीव्र रही। रविवार दोपहर को आंतरिक मंत्रालय ने ट्राट प्रांत के चार जिलों में कर्फ्यू लगाने की घोषणा की, जो शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक प्रभावी रहेगा। इसके अलावा, सीमा के 10 किलोमीटर दायरे में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया, जिसके तहत सेना को विशेष शक्तियां मिल गई हैं – जैसे घरों की तलाशी, संचार प्रतिबंध और आपातकालीन हिरासत। थाई सरकार ने कंबोडिया को ईंधन और गैस निर्यात तत्काल रोकने का फैसला लिया, जो दोनों देशों के बीच 2024 में 2 बिलियन डॉलर का व्यापार था। अर्थशास्त्री वॉर्निंग जारी कर चुके हैं कि इससे कंबोडिया की अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा, जबकि थाईलैंड के सीमावर्ती व्यापारियों को नुकसान होगा। थाई सेना प्रमुख जनरल नरित पनिचपकड़ी ने कहा, “हम शांति चाहते हैं, लेकिन हमारी संप्रभुता पर कोई अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं।” कंबोडियाई प्रधानमंत्री हून मानेत ने इसे “थाई आक्रामकता” बताया और संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग की।
इस विवाद की जड़ें 1962 के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले में हैं, जब प्रह विहार मंदिर को कंबोडिया को सौंपा गया था, लेकिन सीमा के 4.6 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा आज भी विवादास्पद है। 2008-2011 के बीच इसी विवाद पर सैकड़ों सैनिक मारे गए थे। हाल ही में, कंबोडिया द्वारा मंदिर के पास एक नया जलाशय बनाने और थाईलैंड द्वारा सीमा पर बाड़ लगाने से तनाव बढ़ा। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि मेकांग नदी के जल बंटवारे पर असहमति ने इसे और जटिल बना दिया। आसियान की रिपोर्ट के अनुसार, सीमा पर 50,000 से अधिक लोग रहते हैं, जिनमें से 20,000 पहले से ही विस्थापित हो चुके हैं। मानवीय संकट गहरा रहा है – रेड क्रॉस ने बताया कि 10,000 लोग बेघर हो गए, और भोजन-जल की कमी से महामारी का खतरा है। थाईलैंड ने सीमा पर 5,000 अतिरिक्त सैनिक तैनात किए हैं, जबकि कंबोडिया ने चीनी हथियारों से लैस अपनी सेना को अलर्ट कर दिया।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं तेज हैं। अमेरिकी विदेश विभाग ने थाईलैंड को “हमारे निकट सहयोगी” बताते हुए समर्थन का वादा किया, लेकिन दोनों पक्षों से संयम की अपील की। चीन, जो कंबोडिया का प्रमुख निवेशक है, ने “शांतिपूर्ण समाधान” की बात की, जबकि वियतनाम और लाओस ने आसियान बैठक बुलाने का प्रस्ताव रखा। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा, “यह क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है। तत्काल युद्धविराम जरूरी।” यूरोपीय संघ ने दोनों देशों को सहायता का पैकेज देने की पेशकश की। थाईलैंड के विपक्ष ने सरकार पर “अक्षमता” का आरोप लगाया, जबकि कंबोडिया में विपक्षी नेता ने हून परिवार की “उत्तेजक नीतियों” की आलोचना की।
आर्थिक प्रभाव गंभीर हैं। थाईलैंड का पर्यटन उद्योग, जो सीमा क्षेत्र पर निर्भर है, ठप हो गया – ट्राट के होटल 80% खाली हैं। कंबोडिया के राइस एक्सपोर्ट में कमी आने की आशंका है। विश्व बैंक के अनुमान से, यदि संघर्ष एक सप्ताह चला तो दोनों अर्थव्यवस्थाओं को 500 मिलियन डॉलर का नुकसान होगा। स्थानीय किसान सबसे अधिक प्रभावित हैं, जिनके खेत रॉकेटों से जल चुके। एक थाई किसान ने कहा, “हम शांति चाहते हैं, युद्ध नहीं।”
भविष्य की संभावनाएं धुंधली हैं। थाईलैंड ने कंबोडिया के साथ राजनयिक चैनलों को खुला रखा है, लेकिन मार्शल लॉ के कारण बातचीत मुश्किल। विशेषज्ञों का मानना है कि आसियान मध्यस्थता ही रास्ता है, लेकिन ऐतिहासिक असफलताएं चिंता बढ़ाती हैं। यह संघर्ष न केवल दो देशों, बल्कि पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया की स्थिरता को चुनौती दे रहा है। शांति की उम्मीद में, दोनों पक्षों को पीछे हटना होगा, वरना मानवीय त्रासदी और गहरा जाएगी।