19 फरवरी 2026, Supreme Court की फटकार, फ्रीबीज संस्कृति पर सवाल: आज सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर ‘फ्रीबीज कल्चर’ (मुफ्त योजनाओं की संस्कृति) पर तीखी टिप्पणी की, जिसने राजनीतिक और आर्थिक बहस को नई गर्मी दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने राज्यों को चेतावनी दी कि राजस्व घाटे में चलते हुए भी मुफ्त बिजली, खाना, साइकिल और कैश ट्रांसफर जैसी योजनाएं बांटना आर्थिक विकास को बाधित कर रहा है। कोर्ट ने पूछा, “कौन भुगतान करेगा?” और इसे “खतरनाक ट्रेंड” बताया। यह टिप्पणी तमिलनाडु सरकार की मुफ्त बिजली योजना से जुड़े मामले में आई, जहां कोर्ट ने केंद्र और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया। साथ ही, DGCA ने उड़ानों में डिसरप्टिव पैसेंजर्स पर सख्त नियमों का प्रस्ताव दिया। यह रिपोर्ट इस पूरे मुद्दे की विस्तृत पड़ताल करती है।
विवाद की जड़: तमिलनाडु की मुफ्त बिजली योजना मामला तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (TNPDCL) की याचिका से जुड़ा है, जिसमें इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) रूल्स 2024 के रूल 23 को चुनौती दी गई। यह रूल टैरिफ को कॉस्ट-रिफ्लेक्टिव बनाने और राजस्व घाटे को रोकने का प्रावधान करता है, सिवाय प्राकृतिक आपदा के। तमिलनाडु सरकार ने सभी उपभोक्ताओं को (आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना) मुफ्त बिजली देने का वादा किया था।
कोर्ट ने कहा कि गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं ठीक हैं, लेकिन अमीरों और बड़े जमींदारों तक मुफ्त सुविधाएं पहुंचाना गलत है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने मौखिक टिप्पणी में कहा, “हम जानते हैं कि कुछ राज्यों में बिजली मुफ्त है, जहां बड़े जमींदार भी लाइट्स और मशीनें चलाते रहते हैं। अगर कोई सुविधा चाहिए तो उसके लिए भुगतान करना चाहिए। यह टैक्सपेयर्स का पैसा है। कौन भुगतान करेगा?”
कोर्ट ने पूछा कि क्या यह “अप्पीज़मेंट पॉलिसी” (तुष्टिकरण नीति) नहीं बन रहा? बेंच में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल थे।
फ्रीबीज पर कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
- वित्तीय बोझ: अधिकांश राज्य राजस्व घाटे में हैं, फिर भी फ्रीबीज दे रहे हैं। इससे विकास परियोजनाओं के लिए फंड नहीं बचता।
- कार्य संस्कृति पर असर: “अगर सुबह-शाम फ्री खाना, फ्री साइकिल, फ्री बिजली मिलेगी तो लोग काम क्यों करेंगे? वर्क कल्चर क्या होगा?”
- चुनावी फ्रीबीज: चुनाव से ठीक पहले ऐसी योजनाएं घोषित करना आर्थिक विकास को बाधित करता है। कोर्ट ने कहा कि राज्य रोजगार के अवसर बढ़ाएं, न कि सबको फ्री दें।
- टैक्सपेयर्स का बोझ: “यह टैक्स मनी है। विकास के लिए पैसा कहां से आएगा?”
- संस्कृति का सवाल: “हम किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं? क्या यह अप्पीज़मेंट नहीं?”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गरीबों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी योजनाएं संवैधानिक दायित्व हैं, लेकिन अंधाधुंध फ्रीबीज अलग हैं। यह 2022 से चली आ रही बहस का हिस्सा है, जहां कोर्ट ने पहले भी फ्रीबीज को “भ्रष्ट आचरण” मानने की मांग पर सुनवाई की थी।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और संदर्भ विपक्षी दल इसे केंद्र सरकार पर हमला मान रहे हैं, जबकि सत्ताधारी दल इसे “फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी” का मुद्दा बता रहे हैं। तमिलनाडु जैसे राज्यों में जहां DMK जैसी पार्टियां फ्रीबीज पर निर्भर हैं, यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि फ्रीबीज से राज्य कर्ज बढ़ रहा है, और विकास परियोजनाएं प्रभावित हो रही हैं।
कोर्ट ने राज्यों को सलाह दी कि सब्सिडी को प्लान्ड एक्सपेंडिचर में शामिल करें और टारगेटेड वेलफेयर पर फोकस करें।
DGCA का डिसरप्टिव पैसेंजर्स पर सख्त प्रस्ताव इसी दिन DGCA ने उड़ानों में अनुशासनहीन यात्रियों पर नए नियमों का ड्राफ्ट जारी किया। मुख्य बिंदु:
- एयरलाइंस सीधे 30 दिनों तक फ्लाइंग बैन लगा सकेंगी (स्मोकिंग, शराब, सेफ्टी उल्लंघन पर)।
- गंभीर मामलों (कॉकपिट में घुसना, हिंसा) में 2 साल या लाइफटाइम बैन।
- नेशनल नो-फ्लाई डेटाबेस में नाम दर्ज।
- इंडिपेंडेंट कमिटी की जरूरत नहीं, तुरंत कार्रवाई।
यह प्रस्ताव हाल के कई घटनाओं (वर्बल अब्यूज, कॉकपिट ब्रेक) के बाद आया है, जो यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास है।
निष्कर्ष और सबक सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि नीतिगत संदेश है। फ्रीबीज लोकप्रिय लग सकती हैं, लेकिन लंबे समय में वे राज्य की अर्थव्यवस्था को कमजोर करती हैं। कोर्ट ने जोर दिया कि विकास, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस होना चाहिए। DGCA का प्रस्ताव भी सुरक्षा और अनुशासन की याद दिलाता है।
यह मुद्दा 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले और गर्म हो सकता है। क्या राज्य फ्रीबीज पर लगाम लगाएंगे या राजनीतिक फायदे के लिए जारी रखेंगे? समय बताएगा। लेकिन कोर्ट का संदेश साफ है – टैक्सपेयर्स का पैसा जिम्मेदारी से खर्च होना चाहिए।
Sources: द इंडियन एक्सप्रेस