Supreme Court grants passive euthanasia to Harish RanaSupreme Court grants passive euthanasia to Harish Rana

11 मार्च 2026, Supreme Court ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मंजूरी दी: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आज एक ऐतिहासिक और भावुक फैसला सुनाते हुए गाजियाबाद निवासी 32 वर्षीय हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। यह देश में पैसिव यूथेनेशिया की पहली व्यावहारिक मंजूरी है, जहां जीवन रक्षक उपकरणों को हटाकर मरीज को प्राकृतिक मृत्यु की ओर जाने की इजाजत दी गई है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हरीश की स्थिति में कोई सुधार की संभावना नहीं है और उन्हें कृत्रिम रूप से जीवित रखना उनके सम्मानजनक जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

फैसला सुनाते समय जस्टिस पारदीवाला भावुक हो गए। उन्होंने शेक्सपियर के प्रसिद्ध संवाद “टू बी ऑर नॉट टू बी” का जिक्र करते हुए कहा कि यह मामला जीवन और मृत्यु के बीच की उस जंग का प्रतीक है, जहां लंबे समय तक पीड़ा सहना इंसानियत के खिलाफ है। कोर्ट ने हरीश के माता-पिता की निष्ठा की सराहना की, जिन्होंने 13 साल तक उनके बगल नहीं छोड़ी, लेकिन अब उन्हें मुक्ति देने का फैसला किया।

हरीश राणा की कहानी: एक युवा जीवन की त्रासदी

हरीश राणा 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र थे, जहां वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। अगस्त 2013 में चंडीगढ़ में अपने पेइंग गेस्ट हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने से उन्हें गंभीर सिर की चोट लगी। इस दुर्घटना में उन्हें 100% क्वाड्रिप्लेजिक (चारों अंगों में लकवा) और स्थायी वेजिटेटिव स्टेट (Persistent Vegetative State) हो गया। तब से वे बिस्तर पर अचेत पड़े हैं – न बोल सकते हैं, न हिल सकते हैं, न कोई संवेदना महसूस कर सकते हैं। उनकी सांसें और पोषण सिर्फ मशीनों और ट्यूबों (क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन – CANH) के सहारे चल रही हैं।

परिवार ने कई सालों तक इलाज कराया, लेकिन AIIMS और अन्य मेडिकल बोर्डों की रिपोर्ट्स में बार-बार यही आया कि ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। हरीश के पिता अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि बेटे को “जिंदा लाश” की तरह रखना क्रूरता है। परिवार ने पैसिव यूथेनेशिया की मांग की, यानी जीवन रक्षक उपकरण हटाकर प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति।

कानूनी पृष्ठभूमि और कोर्ट का फैसला

भारत में इच्छामृत्यु का मुद्दा 2011 के अरुणा शानबाग मामले से शुरू हुआ, जहां सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को मान्यता दी, लेकिन सख्त शर्तों के साथ। 2018 के कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में कोर्ट ने राइट टू डाई विद डिग्निटी को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हिस्सा माना। 2023 में दिशानिर्देशों को सरल बनाया गया, जिसमें लिविंग विल (एडवांस डायरेक्टिव) और मेडिकल बोर्ड की भूमिका तय की गई।

हरीश राणा का मामला इस फ्रेमवर्क का पहला व्यावहारिक परीक्षण है। कोर्ट ने दो मेडिकल बोर्ड बनाए – एक AIIMS का और दूसरा स्वतंत्र। दोनों ने पुष्टि की कि हरीश की स्थिति अपरिवर्तनीय है। पीठ ने कहा:

  • लाइफ सपोर्ट हटाना “एबैंडनमेंट” नहीं, बल्कि मानवीय कदम है।
  • प्रक्रिया चरणबद्ध और मानवीय तरीके से होनी चाहिए।
  • AIIMS के पैलिएटिव केयर यूनिट में हरीश को भर्ती किया जाए, जहां फीडिंग ट्यूब, वेंटिलेटर आदि हटाए जाएं।
  • केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया पर व्यापक कानून बनाने की सिफारिश की।

पैसिव vs एक्टिव यूथेनेशिया: अंतर समझिए

  • एक्टिव यूथेनेशिया – दवा देकर मौत देना (भारत में अवैध)।
  • पैसिव यूथेनेशिया – जीवन रक्षक उपचार रोकना, प्राकृतिक मौत की अनुमति (कानूनी, लेकिन सख्त शर्तों के साथ)।

यह फैसला दुनिया के कई देशों (नीदरलैंड्स, बेल्जियम, कनाडा) से अलग है, जहां एक्टिव यूथेनेशिया भी वैध है, लेकिन भारत में सिर्फ पैसिव को मंजूरी है।

परिवार की प्रतिक्रिया और भावनात्मक पहलू

हरीश के पिता अशोक राणा ने फैसले पर कहा, “हम सुप्रीम कोर्ट के आभारी हैं। 13 साल तक हमने बेटे की सेवा की, लेकिन अब उसे दर्द से मुक्ति मिलेगी।” मां और परिवार के सदस्य भी भावुक थे। कोर्ट ने परिवार की “रियल लव एंड केयर” की प्रशंसा की, कहा कि वे कभी नहीं छोड़े, लेकिन अब मुक्ति जरूरी है।

व्यापक प्रभाव और बहस

यह फैसला इच्छामृत्यु पर बहस को नई दिशा देगा। कई लोग इसे मानवीय मानते हैं, जबकि कुछ धार्मिक और नैतिक आधार पर विरोध करते हैं। कोर्ट ने केंद्र को कानून बनाने की सलाह दी, ताकि ऐसे मामलों में प्रक्रिया आसान और पारदर्शी हो।

हरीश राणा का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की पीड़ा की कहानी है, जो लंबे समय तक कोमा या वेजिटेटिव स्टेट में रहने वाले प्रियजनों को देखते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला “डिग्निटी इन डेथ” को मजबूत करता है, लेकिन साथ ही चिकित्सा नैतिकता और कानूनी ढांचे पर गहन विचार की मांग भी करता है।

Sources: लाइव लॉ

By Mohd Abdush Shahid

Mohd Abdush Shahid is Founder and content creator at www.views24.in, specializing in news analysis, feature reporting, and in-depth storytelling. With a keen eye for detail and a passion for uncovering impactful narratives, Mohd Abdush Shahid delivers trusted, engaging content that keeps readers informed and inspired.

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