27 जनवरी 2026, किसान आंदोलन फिर सुलगा: भारत की राजनीति और सड़कों पर एक बार फिर ‘अन्नदाता’ की हुंकार गूँजने वाली है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर कानूनी गारंटी की मांग को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और विभिन्न किसान संगठनों ने फरवरी 2026 में ‘दिल्ली कूच’ का शंखनाद कर दिया है। 2020-21 के ऐतिहासिक आंदोलन की यादें अभी धुंधली भी नहीं हुई थीं कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बॉर्डर एक बार फिर छावनी में तब्दील होने लगे हैं।
आंदोलन का मुख्य कारण: अधूरी मांगें और MSP का पेंच
इस नए आंदोलन की जड़ें पिछले आंदोलन की समाप्ति के दौरान सरकार द्वारा किए गए वादों में छिपी हैं। किसानों का आरोप है कि सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेते समय MSP पर कानून बनाने के लिए जिस समिति का गठन किया था, वह केवल एक ‘दिखावा’ साबित हुई है।
किसानों की प्रमुख माँगें:
- MSP की कानूनी गारंटी: सभी फसलों पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों (C2+50%) के आधार पर खरीद की कानूनी गारंटी।
- कर्ज माफी: देश भर के किसानों के कृषि ऋणों को पूरी तरह माफ करना।
- लखीमपुर खीरी न्याय: अजय मिश्रा टेनी की बर्खास्तगी और किसानों पर दर्ज केस वापस लेना।
- पेंशन योजना: 60 वर्ष से अधिक उम्र के किसानों के लिए 10,000 रुपये मासिक पेंशन।
- बिजली संशोधन विधेयक: बिजली संशोधन बिल 2020 को पूरी तरह रद्द करना।
पंजाब-हरियाणा बॉर्डर: किलेबंदी और पुलिस अलर्ट
फरवरी के कूच को देखते हुए हरियाणा और पंजाब पुलिस पूरी तरह अलर्ट पर है। विशेष रूप से शंभू बॉर्डर, खनौरी और डबवाली जैसे एंट्री पॉइंट्स पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं।
हरियाणा सरकार ने कई जिलों में धारा 144 लगाने और इंटरनेट सेवाओं पर नजर रखने के संकेत दिए हैं। कंक्रीट के बैरिकेड्स, कटीले तार और वाटर कैनन की तैनाती यह बता रही है कि इस बार प्रशासन किसानों को दिल्ली की सीमा में घुसने से रोकने के लिए हर संभव प्रयास करेगा। वहीं, किसानों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके पास महीनों का राशन मौजूद है और वे किसी भी बाधा को पार करने के लिए तैयार हैं।
संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) की रणनीति
इस बार का आंदोलन पहले से अधिक संगठित और व्यापक होने का दावा किया जा रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं का कहना है कि यह केवल पंजाब या हरियाणा का आंदोलन नहीं है, बल्कि इसमें दक्षिण भारत और मध्य भारत के किसान भी हिस्सा लेंगे।
- गांव-गांव बैठकें: जनवरी के अंतिम सप्ताह से ही पंजाब और हरियाणा के गांवों में लामबंदी शुरू हो चुकी है।
- ट्रैक्टर मार्च: दिल्ली पहुँचने के लिए हजारों ट्रैक्टरों का काफिला तैयार किया गया है।
- सोशल मीडिया का उपयोग: किसान युवा विंग इस बार सूचनाओं के प्रसार और अफवाहों को रोकने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का बखूबी इस्तेमाल कर रही है।
सरकार का रुख और राजनीतिक निहितार्थ
केंद्र सरकार का तर्क है कि MSP पर कानूनी गारंटी देना सरकारी खजाने पर भारी बोझ डाल सकता है और इससे बाजार की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। हालांकि, 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों और आगामी लोकसभा समीकरणों को देखते हुए सरकार इस बार टकराव को टालने की कोशिश भी कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह आंदोलन लंबा खिंचता है, तो इसका सीधा असर देश की सप्लाई चेन और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। दिल्ली-NCR के लोगों के लिए आने वाले दिन यातायात और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
किसान आंदोलन 2.0 केवल आर्थिक मांगों का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह किसानों के आत्मसम्मान और उनकी भविष्य की सुरक्षा की लड़ाई बन चुका है। फरवरी का ‘दिल्ली कूच’ यह तय करेगा कि सरकार और किसानों के बीच के इस गतिरोध का समाधान बातचीत की मेज पर होगा या फिर सड़कों पर पिछले आंदोलन की पुनरावृत्ति होगी।
देश की नजरें अब फरवरी की उन तारीखों पर टिकी हैं, जब ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट दिल्ली की सीमाओं पर दस्तक देगी। क्या सरकार समय रहते कोई बीच का रास्ता निकालेगी, या एक बार फिर भारत का किसान कड़ाके की ठंड में सड़कों पर रात बिताने को मजबूर होगा?
Sources: द ट्रिब्यून