SHANTI Bill Tabled In Lok SabhaSHANTI Bill Tabled In Lok Sabha

16 दिसंबर 2025, SHANTI Bill Tabled In Lok Sabha – भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास की दौड़ में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। लोकसभा में पेश किए गए ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल, 2025’ (SHANTI बिल) ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया है। यह विधेयक न केवल 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम और 2010 के सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट को निरस्त करेगा, बल्कि एक एकीकृत कानूनी ढांचा स्थापित करेगा जो निजी निवेश को आकर्षित करेगा। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा 15 दिसंबर को लोकसभा में पेश इस बिल को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 12 दिसंबर को मंजूरी दी थी। सरकार का दावा है कि यह बिल 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता हासिल करने के लक्ष्य को साकार करेगा, लेकिन विपक्ष ने सुरक्षा, पर्यावरण और निजीकरण के जोखिमों पर चिंता जताई है। यह रिपोर्ट SHANTI बिल के प्रावधानों, प्रभावों और विवादों पर गहन नजर डालती है।

भारत का परमाणु ऊर्जा क्षेत्र लंबे समय से सरकारी एकाधिकार का शिकार रहा है। 1962 का परमाणु ऊर्जा अधिनियम केंद्र सरकार को ही परमाणु सुविधाओं के निर्माण, संचालन और नियमन का अधिकार देता था, जबकि 2010 का लायबिलिटी एक्ट आपूर्तिकर्ताओं पर असीमित दायित्व थोपता था, जिसने विदेशी निवेशकों को दूर रखा। वर्तमान में भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता 450 गीगावाट से अधिक है, लेकिन परमाणु का योगदान मात्र 7 गीगावाट (करीब 1.5%) है। यह स्थिति जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा मांग के बढ़ते दबाव में बाधक बनी हुई है। राष्ट्रीय ऊर्जा नीति के तहत भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य रखा है, लेकिन बेसलोड पावर (निरंतर बिजली) के लिए परमाणु आवश्यक है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2047 तक परमाणु क्षमता बढ़ाने के लिए 217 अरब डॉलर (करीब 18 लाख करोड़ रुपये) की आवश्यकता होगी। SHANTI बिल इसी कमी को पूरा करने का प्रयास है, जो निजी क्षेत्र को लाइसेंस जारी करने, संयुक्त उद्यमों को प्रोत्साहन और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) के विकास पर जोर देता है।

बिल के प्रमुख प्रावधानों पर नजर डालें तो यह एक व्यापक सुधार पैकेज है। सबसे पहले, यह निजी कंपनियों, संयुक्त उद्यमों और अन्य इकाइयों को परमाणु सुविधाओं के निर्माण, स्वामित्व, संचालन, ईंधन परिवहन और विघटन के लिए लाइसेंस प्राप्त करने की अनुमति देता है। हालांकि, विदेशी कंपनियों को सीधे भागीदारी से वंचित रखा गया है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। लाइसेंस के लिए विकिरण सुरक्षा प्राधिकरण से अनुमति अनिवार्य होगी, जो एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (AERB) के तहत होगा। बिल AERB को वैधानिक दर्जा प्रदान करता है, जिससे इसकी प्रवर्तन शक्तियां मजबूत होंगी। साथ ही, परमाणु ऊर्जा क्षतिपूर्ति सलाहकार परिषद (Atomic Energy Redressal Advisory Council) का गठन किया जाएगा, जो विवादों का निपटारा करेगा।

सबसे विवादास्पद प्रावधान सिविल दायित्व व्यवस्था से जुड़ा है। 2010 के एक्ट के तहत आपूर्तिकर्ता (सप्लायर्स) पर असीमित दायित्व था, जो परमाणु दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे को प्रभावित करता था। SHANTI बिल सप्लायर्स को दायित्व से छूट देता है और संचालक (ऑपरेटर) की दायित्व सीमा को प्रति घटना 300 मिलियन स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) तक सीमित करता है, जिसकी समकक्ष राशि करीब 3,500 करोड़ रुपये है। सरकार इसे ‘व्यावहारिक’ बताती है, लेकिन विपक्ष इसे ‘कॉरपोरेट बचाव’ करार देता है। इसके अलावा, बिल में कई छूटें हैं, जैसे युद्ध, आतंकवाद या प्राकृतिक आपदा से होने वाली क्षति पर दायित्व नहीं। उल्लंघनों के लिए ग्रेडेड जुर्माना लगाया जा सकता है, जो कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करेगा।

सरकार का तर्क है कि यह बिल ऊर्जा क्रांति का आधार बनेगा। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “SHANTI बिल डेटा सेंटरों और 24×7 बिजली आपूर्ति के लिए परमाणु ऊर्जा को रीढ़ बनाएगा। SMRs के माध्यम से दूरदराज क्षेत्रों में स्वच्छ बेसलोड पावर उपलब्ध होगी।” यह निजी भागीदारी से निवेश आकर्षित करेगी, जो नवीकरणीय ऊर्जा के साथ संतुलन बनाएगी। परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसार, बिल भारत को वैश्विक परमाणु बाजार में मजबूत बनाएगा, जहां SMRs जैसे नवाचारों पर फोकस है। अनुमान है कि इससे 50,000 से अधिक नौकरियां पैदा होंगी और कार्बन उत्सर्जन में 20% कमी आएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ विजन से जुड़ते हुए, यह बिल ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगा।

हालांकि, विपक्ष ने बिल को ‘खतरनाक निजीकरण’ बताया है। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने लोकसभा में बहस के दौरान कहा, “परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनियां लाभ कमाने के लिए सुरक्षा को खतरे में डालेंगी। सप्लायर्स को छूट दुर्घटनाओं में पीड़ितों को न्याय से वंचित करेगी।” तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय ने चेतावनी दी कि पर्यावरणीय जोखिम बढ़ेंगे, खासकर चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी घटनाओं के बाद। वाम दलों ने इसे ‘कॉरपोरेट हितों का सौदा’ कहा, जबकि क्षेत्रीय पार्टियां जैसे डीएमके ने दक्षिण भारत के परमाणु संयंत्रों के पास रहने वाले समुदायों की सुरक्षा पर सवाल उठाए। विपक्ष की मांग है कि बिल को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा जाए, जहां सुरक्षा मानकों और पारदर्शिता पर गहन जांच हो।

विशेषज्ञों की राय मिश्रित है। परमाणु ऊर्जा विशेषज्ञ एनी मेट्टायिल ने कहा, “बिल निवेश बढ़ाएगा, लेकिन AERB की स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी होगी। SMRs सुरक्षित हैं, लेकिन नियमन कड़े होने चाहिए।” पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने चिंता जताई, “निजीकरण से लाभप्रधानता हावी हो जाएगी, जो दीर्घकालिक जोखिम पैदा करेगी।” आर्थिक दृष्टि से, यह बिल भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत बनाएगा। रिलायंस और टाटा जैसी कंपनियां पहले से SMRs में रुचि दिखा रही हैं, जो 2030 तक 10 गीगावाट क्षमता जोड़ सकती हैं। वैश्विक संदर्भ में, अमेरिका और चीन जैसे देशों ने निजी भागीदारी से परमाणु विस्तार किया है, जो भारत के लिए मॉडल हो सकता है।

SHANTI बिल के प्रभाव बहुआयामी होंगे। ऊर्जा क्षेत्र में यह निजी निवेश को 18 लाख करोड़ रुपये तक ला सकता है, जो डेटा सेंटरों (जो 2030 तक 1,000 अरब डॉलर का बाजार बनेंगे) को शक्ति देगा। पर्यावरणीय रूप से, परमाणु विस्तार नवीकरणीय ऊर्जा के पूरक बनेगा, लेकिन कचरा प्रबंधन और सुरक्षा प्रोटोकॉल मजबूत करने होंगे। राजनीतिक रूप से, यह विंटर सेशन में बहस का केंद्र बनेगा, जहां सरकार बहुमत के दम पर इसे पारित कराने का प्रयास करेगी। यदि पारित हुआ, तो 2026 से निजी परियोजनाएं शुरू हो सकती हैं, जो भारत को ‘परमाणु महाशक्ति’ बनाने की दिशा में कदम होगा।

निष्कर्षतः SHANTI बिल ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास का द्वार खोलता है, लेकिन सफलता नियमन और संतुलन पर निर्भर करेगी। सरकार को विपक्ष की चिंताओं को संबोधित कर पारदर्शी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि यह बिल ‘ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ का वास्तविक माध्यम बने। अन्यथा, यह निजीकरण के जोखिमों को न्यौता दे सकता है। भारत की ऊर्जा यात्रा में यह कदम स्वागतयोग्य है, लेकिन सतर्कता आवश्यक।

By SHAHID

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