10 दिसंबर 2025: बिहार की राजनीति में एक और बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद विजय कृष्ण ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। 74 वर्षीय विजय कृष्ण, जो लालू प्रसाद यादव के पुराने सिपाही के रूप में जाने जाते हैं, ने न केवल आरजेडी छोड़ी है, बल्कि सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान भी कर दिया। उन्होंने आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद को एक संक्षिप्त पत्र लिखकर अपना फैसला सूचित किया, जिसमें कहा गया, “मैंने दलगत राजनीति और सक्रिय राजनीति से अलग हो जाने का निर्णय लिया है। अतः राष्ट्रीय जनता दल की प्राथमिक सदस्यता और सभी पदों से इस्तीफा दे रहा हूं। कृपया स्वीकार करें।” यह कदम बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में हार के बाद आरजेडी के लिए एक और करारा प्रहार है, जो पार्टी की आंतरिक कलह और नेतृत्व संकट को उजागर करता है।

विजय कृष्ण का राजनीतिक सफर लंबा और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। राजपूत बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले वे 1960 के दशक में समाजवादी युवा सभा से राजनीति में उतरे। 1977 में जनता पार्टी के बिहार महासचिव बने, जो उनके शुरुआती संघर्ष को दर्शाता है। 1990 और 1995 में जनता दल के टिकट पर बाढ़ विधानसभा सीट से लगातार विधायक चुने गए। लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की सरकारों में वे मंत्री के रूप में सेवा दे चुके हैं, जहां सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के मुद्दों पर उनकी सक्रियता चर्चित रही। उनका सबसे बड़ा राजनीतिक कारनामा 2004 का लोकसभा चुनाव था, जब आरजेडी के टिकट पर बाढ़ संसदीय सीट से उन्होंने तत्कालीन जेडीयू उम्मीदवार और वर्तमान बिहार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को करारी शिकस्त दी। इस जीत ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी थी, क्योंकि नीतीश को नालंदा से ही लोकसभा पहुंचना पड़ा। हालांकि, 1999 के चुनाव में नीतीश से हारने के बाद विजय कृष्ण ने धांधली का आरोप लगाकर अदालत का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उनकी याचिका खारिज हो गई।

विजय कृष्ण का राजनीतिक सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। 2009 के लोकसभा चुनाव में टिकट न मिलने पर वे नीतीश कुमार की जेडीयू में शामिल हो गए, लेकिन 2010 के विधानसभा चुनाव से पहले आरजेडी में लौट आए। पटना के कृष्णापुरी थाना क्षेत्र में 2009 में ट्रांसपोर्टर सत्येंद्र सिंह की हत्या के मामले में वे और उनके बेटे करीब 10 वर्ष तक बेउर जेल में बंद रहे। 2022 में पटना हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी, जिसके बाद वे राजनीतिक गतिविधियों से दूर हो गए थे। पटना जिले के बाढ़, मोकामा और बख्तियारपुर जैसे इलाकों में उनका मजबूत आधार था, जो आरजेडी के लिए सर्वण वोट बैंक का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। संस्थापक सदस्यों में शुमार विजय कृष्ण लालू की कोर टीम का हिस्सा थे, इसलिए उनका जाना पार्टी के लिए रणनीतिक नुकसान है।

यह इस्तीफा बिहार चुनावी हार के बाद आरजेडी के लिए लगातार आ रहे झटकों की कड़ी है। हाल ही में कई बागी नेताओं पर कार्रवाई के बीच विजय कृष्ण का फैसला तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर सवाल खड़े करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना पार्टी में वरिष्ठ नेताओं के असंतोष को प्रतिबिंबित करती है, जो युवा नेतृत्व के प्रति नाराजगी जता रहे हैं। आरजेडी प्रवक्ताओं ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह लालू परिवार के लिए व्यक्तिगत धक्का है। विजय कृष्ण का संन्यास बिहार की पुरानी पीढ़ी के समाजवादी नेताओं के पतन का प्रतीक भी बन गया है, जहां एक समय वे लालू के सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे। कुल मिलाकर, यह घटना बिहार की राजनीति में नए समीकरण रच सकती है, खासकर नीतीश सरकार के सामने विपक्ष की कमजोरी को उभारते हुए।

By SHAHID

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