11 फरवरी 2026, SC-ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ (समृद्ध वर्ग) को लाभ से बाहर करने की याचिकाओं पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। साथ ही, कोर्ट ने 1 अगस्त 2024 के संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले पर अब तक की गई कार्रवाई का एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) भी तलब किया है। यह फैसला SC-ST समुदायों के भीतर सब-क्लासिफिकेशन (उप-वर्गीकरण) को मान्यता देता था और क्रीमी लेयर सिद्धांत को इन वर्गों पर भी लागू करने का सुझाव देता था।
मंगलवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने यह आदेश दिया। बेंच में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस एन वी अंजरिया भी शामिल थे। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाओं पर अपना पक्ष रखे और 2024 के फैसले के अनुपालन में की गई कार्रवाइयों की रिपोर्ट दाखिल करे। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि SC-ST में सामाजिक-आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को आरक्षण का लाभ न मिले, ताकि वास्तव में वंचित तबकों तक यह सुविधा पहुंच सके।
2024 के फैसले का बैकग्राउंड
1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह मामले में 6:1 के बहुमत से महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। पीठ ने राज्यों को SC-ST सूचियों के भीतर उप-वर्गीकरण करने की अनुमति दी, ताकि अधिक पिछड़े समुदायों को आरक्षण का ज्यादा लाभ मिल सके। तत्कालीन CJI डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ में जस्टिस बी आर गवई (अब रिटायर्ड) ने अलग राय में कहा था कि SC-ST से भी क्रीमी लेयर को बाहर करने की नीति बनाई जानी चाहिए। जस्टिस गवई ने तर्क दिया था कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक उत्थान है, इसलिए जो लोग पहले से ही उच्च पदों पर हैं या आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उन्हें इसका लाभ नहीं मिलना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट कहा था, “राज्य को SC-ST से भी क्रीमी लेयर की पहचान करने की नीति विकसित करनी चाहिए और उन्हें सकारात्मक कार्रवाई के लाभ से बाहर करना चाहिए।” हालांकि, बहुमत ने क्रीमी लेयर को अनिवार्य नहीं बनाया, लेकिन जस्टिस गवई की राय ने इस मुद्दे को जीवंत कर दिया। इसके बाद कई याचिकाएं दाखिल हुईं, जिनमें ओपी शुक्ला और समता आंदोलन समिति जैसी संस्थाओं ने क्रीमी लेयर के लिए स्पष्ट मापदंड बनाने की मांग की।
कोर्ट में क्या हुआ?
कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र से कहा, “संघीय सरकार संविधान पीठ के फैसले के अनुपालन में एक्शन टेकन रिपोर्ट के साथ हलफनामा दाखिल करे।” याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उच्च सरकारी पदों पर पहुंच चुके SC-ST व्यक्तियों या उनके परिवारों को आरक्षण का लाभ मिलना अन्य वंचितों के साथ अन्याय है। उन्होंने उदाहरण दिया कि अगर कोई SC-ST व्यक्ति IAS, IPS या संवैधानिक पदों पर है, तो उसके बच्चों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
क्रीमी लेयर का सिद्धांत पहले से OBC आरक्षण में लागू है, जहां 8 लाख रुपये सालाना आय की सीमा है। मंडल कमीशन के फैसले से यह प्रावधान आया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि SC-ST के लिए अलग मापदंड हो सकते हैं, लेकिन सिद्धांत लागू होना चाहिए। कोर्ट ने इस मुद्दे को संवेदनशील बताते हुए सभी पक्षों से जवाब मांगा है।
केंद्र सरकार का रुख और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
केंद्र सरकार ने पहले 2024 के फैसले पर क्रीमी लेयर लागू करने का विरोध किया था। कई राज्य सरकारें भी इससे असहमत हैं, क्योंकि उनका मानना है कि SC-ST अभी भी सामाजिक भेदभाव का शिकार हैं और क्रीमी लेयर लागू करने से आरक्षण का मूल उद्देश्य प्रभावित होगा। दलित संगठनों और विपक्षी दलों ने इसे आरक्षण विरोधी कदम बताया है। वहीं, कुछ सामाजिक न्याय समर्थक इसे सही दिशा में कदम मानते हैं, क्योंकि इससे वास्तविक जरूरतमंदों को लाभ मिलेगा।
बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय जैसी याचिकाओं ने इस बहस को और तेज किया है। उपाध्याय ने पहले भी कई PIL दाखिल की हैं। विपक्षी दल इसे सामाजिक न्याय पर हमला बता रहे हैं, जबकि कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे आरक्षण अधिक प्रभावी बनेगा।
सब-क्लासिफिकेशन पर एक्शन टेकन रिपोर्ट क्यों महत्वपूर्ण?
2024 के फैसले के बाद कई राज्यों ने सब-क्लासिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू की है। उदाहरण के लिए, कुछ राज्यों ने अधिक पिछड़ी SC जातियों को अलग कोटा दिया है। कोर्ट ने अब केंद्र से पूछा है कि राष्ट्रीय स्तर पर क्या कदम उठाए गए हैं। यह रिपोर्ट आने से नीतिगत बदलाव की दिशा स्पष्ट होगी।
निष्कर्ष
SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर और सब-क्लासिफिकेशन का मुद्दा सामाजिक न्याय की मूल भावना से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम आरक्षण व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में है, लेकिन यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी है। केंद्र का जवाब और ATR आने के बाद अगली सुनवाई में मामले की दिशा तय होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर क्रीमी लेयर लागू हुआ, तो लाखों वंचितों को सीधा लाभ मिलेगा, लेकिन इसका विरोध भी तेज होगा। फिलहाल, पूरा देश इस महत्वपूर्ण मामले पर कोर्ट के अगले कदम का इंतजार कर रहा है। आरक्षण नीति में सुधार की यह बहस लंबे समय तक चलने वाली है।
Sources: द पायनियर