Rupee slips below 91Rupee slips below 91

16 दिसंबर 2025, Rupee slips below 91: भारतीय रुपये ने आज एक ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की, जब यह पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91 के स्तर को पार कर गया। इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 0.3% की कमजोरी के साथ 91.0750 पर पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। यह गिरावट लगातार चौथे सत्र में जारी रही, जहां दिसंबर महीने में ही रुपया 1.72% लुढ़क चुका है। 2025 में कुल मिलाकर रुपये की 6% की गिरावट ने इसे एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बना दिया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी और वैश्विक टैरिफ अनिश्चितताओं ने इस पतन को गति दी। इस रिपोर्ट में हम रुपये की गिरावट के कारणों, आर्थिक प्रभावों, विशेषज्ञ विश्लेषण और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो निवेशकों और अर्थव्यवस्था विशेषज्ञों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बनेगी।

रुपये की यह गिरावट कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि जुलाई 2025 से चली आ रही प्रवृत्ति का परिणाम है। 3 दिसंबर को रुपये ने पहली बार 90 के स्तर को तोड़ा था, और उसके बाद हर सत्र में नया निचला स्तर दर्ज हो रहा है। आज के सत्र में रुपया खुलते ही 90.77 पर था, लेकिन दोपहर तक 35 पैसे की गिरावट के साथ 91.08 तक पहुंच गया। ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार, अंतिम बंद 91.01 पर हुआ, जो पिछले बंद से 23 पैसे नीचे है। यह स्तर न केवल रिकॉर्ड है, बल्कि पिछले 10 ट्रेडिंग सेशनों में 90 से 91 तक की तेज गिरावट दर्शाता है। वैश्विक स्तर पर डॉलर इंडेक्स मजबूत रहा, जो 106.50 के आसपास कारोबार कर रहा था, लेकिन भारतीय रुपये पर दबाव मुख्य रूप से घरेलू कारकों से आया।

गिरावट के प्रमुख कारणों में सबसे ऊपर FII की बिकवाली है। दिसंबर में FII ने 21,073 करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं, जिसमें आज अकेले 1,468 करोड़ का नुकसान हुआ। जुलाई से कुल 1,70,000 करोड़ रुपये की बिकवाली ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। निवेशक उच्च वैल्यूएशन, वैश्विक अनिश्चितताओं और अमेरिकी टैरिफ नीतियों से सतर्क हैं। अमेरिका ने भारत से आयात पर 50% टैरिफ लगाए हैं, जो निर्यात को प्रभावित कर रहा है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी ने अनिश्चितता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि मार्च 2026 से पहले कोई ब्रेकथ्रू नहीं होगा, जो निवेशकों के मनोबल को तोड़ रहा है। इसके अलावा, हेजिंग एक्टिविटी बढ़ गई है, जहां कंपनियां डॉलर खरीदकर जोखिम कम कर रही हैं। ट्रेड डेफिसिट नवंबर में कम हुआ, लेकिन निर्यात में वृद्धि सीमित रही। वैश्विक कारक जैसे बैंक ऑफ जापान की नीतियां और अमेरिकी जॉब्स डेटा भी असर डाल रहे हैं।

इस गिरावट का आर्थिक प्रभाव गहरा है। सबसे पहले, आयात महंगे हो जाएंगे। तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयात-निर्भर क्षेत्रों में लागत बढ़ेगी, जो महंगाई को भड़का सकती है। नवंबर में महंगाई दर 0.71% पर स्थिर रही, जो RBI के 2% निचले थ्रेशोल्ड से नीचे है, लेकिन रुपये की कमजोरी से यह ऊपर चढ़ सकती है। निर्यातकों को फायदा होगा, क्योंकि उनकी कमाई डॉलर में होगी, लेकिन समग्र अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा। स्टॉक मार्केट पर दबाव बढ़ा है, जहां सेंसेक्स और निफ्टी आज 0.6% गिरे। विश्लेषकों का मानना है कि रुपये की गिरावट से इक्विटी रिटर्न्स म्यूटेड रहेंगे, और निवेशक डिफेंसिव सेक्टर्स जैसे FMCG और फार्मा की ओर रुख करेंगे। कॉर्पोरेट बैलेंस शीट्स प्रभावित होंगी, खासकर विदेशी कर्ज वाली कंपनियों के लिए। HSBC फ्लैश PMI 58.9 पर स्लिप होने से प्राइवेट सेक्टर ग्रोथ 10 महीनों के निचले स्तर पर पहुंच गई, जो चिंता बढ़ा रही है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की भूमिका यहां महत्वपूर्ण है। RBI ने आज भी डॉलर बेचकर हस्तक्षेप किया, लेकिन गिरावट को रोकना मुश्किल साबित हो रहा है। फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व 650 बिलियन डॉलर के आसपास हैं, जो हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन लंबे समय तक बिकवाली जारी रही तो चुनौती बढ़ेगी। RBI गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि वे मुद्रा स्थिरता सुनिश्चित करेंगे, लेकिन ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश बनी हुई है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को ट्रेड डील तेज करने और FII आकर्षण के लिए नीतिगत सुधारों पर फोकस करना चाहिए।

विशेषज्ञों की राय मिश्रित है। जियोजीत फाइनेंशियल सर्विसेज के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट डॉ. वीके विजयकुमार ने कहा, “रुपये की तेज गिरावट अप्रत्याशित है, लेकिन FII बिकवाली और ट्रेड डील की अनिश्चितता मुख्य वजहें हैं। वर्तमान स्तरों पर स्थिरता आ सकती है, लेकिन 92 का स्तर टूटा तो और दबाव बढ़ेगा।” मनीकंट्रोल की जोया स्प्रिंगवाला ने चेतावनी दी, “रुपये का पतन इक्विटी में जोखिम बढ़ा रहा है, निवेशक सिलेक्टिव और डिफेंसिव एक्सपोजर अपनाएं।” ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के जोशुआ फेरर ने जोड़ा, “50% US टैरिफ ने निर्यात को प्रभावित किया, लेकिन नवंबर में निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे, जो सकारात्मक है।” इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, यह गिरावट उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी है।

भविष्य की संभावनाएं चिंताजनक लेकिन प्रबंधनीय लग रही हैं। अगर भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क जल्द अंतिम रूप ले ले, तो रुपये में रिकवरी संभव है। EU के साथ बातचीत भी रुकी हुई है, जो अतिरिक्त दबाव डाल रही है। विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 में RBI की दर कटौती से राहत मिलेगी, लेकिन वैश्विक रिसेशन के जोखिम से सतर्क रहना होगा। लॉन्ग-टर्म में, रुपये को 88-90 के दायरे में स्थिर करने की उम्मीद है, लेकिन शॉर्ट-टर्म में 91.50 तक गिरावट का खतरा है।

निष्कर्षतः रुपये का 91 के पार लुढ़कना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी है। FII बिकवाली और ट्रेड अनिश्चितताओं ने मुद्रा को कमजोर किया, लेकिन मजबूत फंडामेंटल्स और RBI का हस्तक्षेप आशा की किरण हैं। सरकार को तत्काल कदम उठाने चाहिए, जैसे निर्यात प्रोत्साहन और विदेशी निवेश नीतियां। निवेशक विविधीकरण अपनाएं और वैश्विक संकेतों पर नजर रखें। यह संकट अवसर भी बन सकता है, अगर नीतिगत सुधार समय पर हो जाएं। रुपये की रक्षा ही अर्थव्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करेगी।

By SHAHID

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *