10 दिसंबर 2025 – राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्वीकार किया कि भारत में वायु प्रदूषण से मौतों या बीमारियों का कोई निश्चित डेटा उपलब्ध नहीं है। राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा, “देश में वायु प्रदूषण के कारण मौत या बीमारी का प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने के लिए कोई निर्णायक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।” हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि वायु प्रदूषण श्वसन रोगों का ट्रिगर है, जो सांस की बीमारियों को बढ़ावा देता है। यह बयान दिल्ली और उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान बढ़ते वायु प्रदूषण संकट के बीच आया है, जहां AQI अक्सर ‘गंभीर’ स्तर पर पहुंच जाता है।
यह विवादास्पद बयान विपक्षी सांसदों के सवालों पर आधारित था, जो दिल्ली में प्रदूषण से जुड़ी मौतों के आंकड़ों की मांग कर रहे थे। जाधव ने स्पष्ट किया कि वायु प्रदूषण एकल कारक के रूप में मौत का कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह अन्य स्वास्थ्य मुद्दों से जुड़ा होता है। मंत्रालय के अनुसार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल या अन्य आधिकारिक स्रोतों में प्रदूषण-विशिष्ट मौतों का अलग से रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। इसके बजाय, श्वसन, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियां ट्रैक की जाती हैं, जहां प्रदूषण एक योगदानकर्ता है। केंद्र ने नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत 131 शहरों में सुधार के प्रयासों का जिक्र किया, लेकिन आंकड़ों की कमी पर चुप्पी साधी।
हालांकि, यह बयान वैश्विक और स्वतंत्र अध्ययनों से टकराता है। लैंसेट काउंटडाउन 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में भारत में PM2.5 प्रदूषण से 17.18 लाख मौतें हुईं, जो 2010 से 38% की वृद्धि दर्शाती है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत वैश्विक वायु प्रदूषण मौतों का 26% वहन करता है, जिसमें कोयला जलाने से 3.94 लाख मौतें जुड़ी हैं। इसी तरह, स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर (SoGA) 2025 ने 2023 में 20 लाख मौतों का अनुमान लगाया, जो मस्तिष्क स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की एक स्टडी में लंबे समय तक प्रदूषण एक्सपोजर से सालाना 15 लाख अतिरिक्त मौतें बताई गईं। दिल्ली में 2023 में सभी मौतों का 15% प्रदूषण से जुड़ा पाया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी आंकड़ों की कमी ‘डेटा गैप’ पैदा करती है, जो नीति निर्माण को प्रभावित करती है।
विपक्ष ने इसे ‘उदासीनता’ करार दिया। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने ट्वीट किया, “सरकार प्रदूषण को स्वीकारती है लेकिन मौतों को नकारती है। यह जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।” पर्यावरण कार्यकर्ता सुनीता नारायण ने कहा कि बिना डेटा के NCAP असफल रहेगा। WHO के अनुसार, भारत में सालाना 16 लाख मौतें प्रदूषण से होती हैं, जो GDP का 9.5% नुकसान पहुंचाती हैं। दिल्ली में हालिया स्टडी से पता चला कि शाम के कम्यूट में फेफड़ों को साल का सबसे ज्यादा नुकसान होता है।
केंद्र का यह रुख प्रदूषण नियंत्रण को चुनौती देता है। यदि डेटा संग्रह मजबूत न हुआ, तो 2050 तक 77 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जैसा कि नेचर स्टडी में चेतावनी दी गई। सरकार को ICMR के साथ मिलकर प्रदूषण-विशिष्ट सर्विलांस सिस्टम विकसित करने की जरूरत है। कुल मिलाकर, यह बयान बहस छेड़ता है: क्या आंकड़ों की कमी वास्तविकता को छिपा रही है, या जटिल स्वास्थ्य कारकों को मान्यता दे रही है? जन स्वास्थ्य के लिए पारदर्शी डेटा ही समाधान है।