Serious warning in new UN reportSerious warning in new UN report

29 जनवरी 2026, जलवायु परिवर्तन: UN की नई रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी: संयुक्त राष्ट्र की विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की ताजा रिपोर्टों ने जलवायु परिवर्तन को लेकर एक बार फिर दुनिया को चेतावनी दी है। 2025 को पृथ्वी का तीसरा सबसे गर्म साल दर्ज किया गया है, जो मानवजनित ग्लोबल वॉर्मिंग की रफ्तार को दर्शाता है। रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि 2026 में नए तापमान रिकॉर्ड टूट सकते हैं, क्योंकि ला नीना का ठंडा प्रभाव खत्म होने के बाद एल नीनो की वापसी की आशंका है। साथ ही, विकासशील देशों के लिए क्लाइमेट फाइनेंस की मांग तेज हो गई है, जहां COP सम्मेलनों में 2035 तक सालाना 1.3 ट्रिलियन डॉलर की फंडिंग का लक्ष्य रखा गया है। ये रिपोर्ट्स जलवायु संकट की गहराती चुनौतियों को रेखांकित करती हैं और तत्काल कार्रवाई की जरूरत पर जोर देती हैं।

2025: तीसरा सबसे गर्म साल

WMO की 14 जनवरी 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, 2025 वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे गर्म साल रहा। वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर (1850-1900) से करीब 1.47 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। यह 2024 और 2023 के बाद तीसरा स्थान है, जहां 2024 सबसे गर्म साल था। कोपर्निकस क्लाइमेट चेंज सर्विस और बर्कले अर्थ की रिपोर्ट्स भी इसी निष्कर्ष पर पहुंची हैं।

ला नीना के प्रभाव से 2025 में थोड़ी ठंडक आई, लेकिन फिर भी तापमान रिकॉर्ड स्तर पर रहा। समुद्र सतह का तापमान भी ऊंचा दर्ज किया गया। यूरोपीय संघ की कोपर्निकस रिपोर्ट में कहा गया कि 2025 सिर्फ 0.01 डिग्री से 2023 से पीछे रहा। भारत में भी यह प्रभाव दिखा – उत्तर भारत में भीषण ठंड और कोहरे के बावजूद, गर्मियों में रिकॉर्ड हीटवेव देखी गई। बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बाढ़ और सूखे की घटनाएं बढ़ीं, जो जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हैं।

2026 में और रिकॉर्ड टूटने की आशंका

WMO की ग्लोबल एनुअल टू डिसेडल क्लाइमेट अपडेट (2025-2029) में चेतावनी दी गई है कि 2025-2029 की पांच साल की औसत वार्मिंग 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने की 70 प्रतिशत संभावना है। यह पेरिस समझौते की सीमा का उल्लंघन होगा। 2026 में ला नीना कमजोर पड़ने से तापमान फिर बढ़ सकता है। UNEP की एमिशन्स गैप रिपोर्ट 2025 में कहा गया कि वर्तमान राष्ट्रिय निर्धारित योगदान (NDCs) से भी वैश्विक तापमान इस सदी के अंत तक 2.5-2.9 डिग्री बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी नहीं हुई तो 2026 सबसे गर्म साल बन सकता है। समुद्र स्तर 상승, ग्लेशियर पिघलना और चरम मौसमी घटनाएं (हीटवेव, बाढ़, तूफान) बढ़ेंगी। भारत जैसे विकासशील देशों में कृषि, जल संसाधन और स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ेगा।

विकासशील देशों के लिए 1.3 ट्रिलियन डॉलर की मांग

जलवायु वित्तीयन का मुद्दा भी रिपोर्ट्स में प्रमुख है। COP29 (बाकू) और COP30 (बेलेम) में न्यू कलेक्टिव क्वांटिफाइड गोल (NCQG) पर सहमति बनी, जिसमें विकसित देशों से 2035 तक सालाना 300 बिलियन डॉलर की कोर फंडिंग और कुल 1.3 ट्रिलियन डॉलर की महत्वाकांक्षा रखी गई। विकासशील देश लंबे समय से 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की मांग कर रहे हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव (लॉस एंड डैमेज) से सबसे ज्यादा वे प्रभावित हैं।

UNFCCC की रिपोर्ट्स में कहा गया कि विकासशील देशों को अनुकूलन (एडाप्टेशन) और मिटिगेशन के लिए बड़ी राशि चाहिए। भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने जोर दिया कि विकसित देश ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं, इसलिए फंडिंग उनकी जिम्मेदारी है। वर्तमान में क्लाइमेट फाइनेंस करीब 100-200 बिलियन डॉलर सालाना है, जो अपर्याप्त है। बाकू टू बेलेम रोडमैप में 1.3 ट्रिलियन तक पहुंचने की योजना है, लेकिन कार्यान्वयन पर सवाल बने हुए हैं।

विशेषज्ञों की राय और प्रभाव

विशेषज्ञों का कहना है कि उत्सर्जन गैप अभी भी बड़ा है। UNEP की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि अगर नए NDCs मजबूत नहीं हुए तो लक्ष्य दूर रहेंगे। IPCC और अन्य की रिपोर्ट्स में जोर दिया गया कि नेट जीरो तक पहुंचने के लिए फॉसिल फ्यूल से दूर होना जरूरी है।

भारत के संदर्भ में, जलवायु परिवर्तन से बिहार जैसे राज्यों में बाढ़ बढ़ रही है, जबकि राजस्थान में सूखा। किसान प्रभावित हैं, प्रवासन बढ़ रहा है। सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा पर फोकस किया है, लेकिन फाइनेंस की कमी बाधा है।

आगे की राह और सबक

ये रिपोर्ट्स एक कड़वा सच सामने लाती हैं – जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की समस्या है। विकसित देशों को फंडिंग बढ़ानी होगी, जबकि सभी देशों को उत्सर्जन कम करना होगा। COP30 में नए NDCs पेश होने हैं, जो निर्णायक होंगे।

व्यक्तिगत स्तर पर भी जागरूकता जरूरी है – ऊर्जा बचत, पेड़ लगाना और सस्टेनेबल लाइफस्टाइल अपनाना। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो 2030 तक अपूरणीय क्षति हो सकती है। यूएन की ये चेतावनियां अंतिम अलार्म हैं – अब कार्रवाई का समय है।

Sources: UN वेबसाइट

By Mohd Abdush Shahid

Mohd Abdush Shahid is Founder and content creator at www.views24.in, specializing in news analysis, feature reporting, and in-depth storytelling. With a keen eye for detail and a passion for uncovering impactful narratives, Mohd Abdush Shahid delivers trusted, engaging content that keeps readers informed and inspired.

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