MP Mohammad JawedMP Mohammad Jawed

16 दिसंबर 2025, MP Mohammad Jawed– भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर लोकसभा में आज एक ऐसा प्रस्ताव गूंजा, जिसने पूरे सदन को झकझोर दिया। किशनगंज से कांग्रेस MP Mohammad Jawed ने मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं पर तत्काल चर्चा की मांग करते हुए अन्य सभी बहसों को स्थगित करने का प्रस्ताव पेश किया। उनका यह कदम न केवल हालिया हिंसक घटनाओं के खिलाफ एक मजबूत आवाज है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर हो रहे हमलों के प्रति जागरूकता का प्रतीक भी है। सांसद जावेद ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मॉब लिंचिंग सिर्फ हत्या नहीं है, यह संविधान पर सीधा हमला है। नवादा से लेकर दादरी तक, जब जवाबदेही कमजोर होती है तो नफरत वाले अपराध बढ़ते हैं।” इस प्रस्ताव ने विपक्ष और सत्ताधारी दलों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है, जो देश में व्याप्त साम्प्रदायिक तनाव को उजागर करता है।

मॉब लिंचिंग, या भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा, भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक गंभीर समस्या बन चुकी है। यह न केवल व्यक्तिगत हत्याओं का रूप ले चुकी है, बल्कि सामाजिक सद्भाव को चोट पहुंचाने वाला हथियार भी। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2024 तक मॉब लिंचिंग से जुड़ी घटनाओं में 200% से अधिक की वृद्धि हुई है, जिसमें अधिकांश पीड़ित अल्पसंख्यक समुदायों से हैं। दिसंबर 2025 में ही बिहार के नवादा जिले में हुई एक दिल दहला देने वाली घटना ने इस समस्या को और गहरा दिया। 5 दिसंबर को 50 वर्षीय मुस्लिम कपड़ा विक्रेता मोहम्मद अथर हुसैन को एक भीड़ ने लूटा, पीटा, उनके कानों और उंगलियों को प्लायर से काटा, और गर्म लोहे की रॉड से ब्रांडिंग की। अस्पताल में 12 दिसंबर को उनकी मौत हो गई। पुलिस ने आठ लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन पीड़ित के भाई ने इसे धार्मिक पहचान पर हमला बताया है। अथर हुसैन ने मरने से पहले दर्ज बयान में कहा, “उन्होंने मेरी धार्मिक पहचान जांचने के लिए निजी अंगों की जांच की और कहा कि तू मुसलमान है, इसलिए सजा मिलेगी।” यह घटना नवादा से दिल्ली के दादरी तक फैली नफरत की श्रृंखला का हिस्सा लगती है, जहां 2015 में मोहम्मद अखलाक की हत्या के दोषियों पर अब आरोप हटाने की कोशिश हो रही है।

MP Mohammad Jawed का प्रस्ताव इस संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है। लोकसभा की शीतकालीन सत्र में, जब अन्य मुद्दों जैसे यूपीआईईडी पोर्टल और वक्फ संपत्ति पर चर्चा हो रही थी, जावेद ने ‘निलंबन प्रस्ताव’ (सस्पेंशन ऑफ बिजनेस) के तहत मॉब लिंचिंग को प्राथमिकता देने की मांग की। उन्होंने सदन में कहा कि ये घटनाएं संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन हैं। “जब भीड़ कानून अपने हाथ में ले लेती है, तो राज्य की विफलता स्पष्ट हो जाती है। सरकार को तत्काल कड़े कानून बनाने चाहिए, जैसे मॉब लिंचिंग को विशेष अपराध घोषित करना,” जावेद ने जोर देकर कहा। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जहां #StopMobLynching ट्रेंड कर रहा है।

इस प्रस्ताव पर सदन में प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रहीं। विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस, सपा और तृणमूल कांग्रेस ने जावेद का समर्थन किया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, “मॉब लिंचिंग भारत की एकता के लिए खतरा है। सांसद जावेद की मांग सही है, सरकार को जवाब देना चाहिए।” वहीं, सत्ताधारी भाजपा ने इसे ‘राजनीतिक स्टंट’ बताते हुए टाल दिया। लोकसभा स्पीकर ने प्रस्ताव को विचार के लिए भेज दिया, लेकिन चर्चा तुरंत शुरू नहीं हुई। एक भाजपा सांसद ने कहा, “पहले कानून लागू होने दो, फिर चर्चा करेंगे।” यह बहस संसद के हंगामे का हिस्सा बनी, जहां विपक्ष ने सरकार पर ‘सांप्रदायिक हिंसा को नजरअंदाज करने’ का आरोप लगाया।

मॉब लिंचिंग की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें हालिया घटनाओं पर नजर डालनी होगी। दिसंबर 2025 में ही उत्तर प्रदेश के जौनपुर में एक अन्य घटना घटी, जहां साधुओं पर बच्चा चोरी के शक में भीड़ ने हमला किया। एक साधु नाले में गिर गया, और कई घायल हुए। हालांकि यह घटना धार्मिक नहीं थी, लेकिन यह दर्शाती है कि अफवाहें कैसे हिंसा को जन्म देती हैं। इसी महीने बुलंदशहर में एक मुस्लिम स्ट्रीट वेंडर को लूट-पीट कर मार डाला गया, जहां दो आरोपी गिरफ्तार हुए। झारखंड के रामगढ़ में 2017 की अलीमुद्दीन अंसारी की लिंचिंग का वीडियो अभी भी सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रहा है, जो ‘डिजिटल ट्रॉफी’ की तरह इस्तेमाल हो रहा। राजस्थान के अलवर में 2017 की पेहलू खान हत्याकांड की यादें ताजा हैं, जहां गाय तस्करी के शक में भीड़ ने हमला किया। इन घटनाओं में एक सामान्य धागा है: धार्मिक पूर्वाग्रह और कमजोर कानून व्यवस्था।

विशेषज्ञों का मानना है कि मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए सख्त कानून जरूरी हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2015 से 2024 तक 100 से अधिक लिंचिंग हुईं, जिनमें 80% में मुस्लिम पीड़ित थे। सामाजिक कार्यकर्ता राना अय्यूब ने कहा, “ये घटनाएं सिस्टमेटिक डिह्यूमनाइजेशन का परिणाम हैं। वीडियो बनाकर शेयर करना हिंसा को सामान्य बनाता है।” राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने जावेद के प्रस्ताव को सराहते हुए कहा, “यह संसद को अपनी जिम्मेदारी याद दिलाता है। सरकार को ‘बटेंगे तो कटेंगे’ जैसे बयानों का असर समझना चाहिए।” गुजरात कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने भी जुलाई 2025 में राहुल गांधी को पत्र लिखकर बुलडोजर एक्शन और मॉब लिंचिंग पर संसद में चर्चा की मांग की थी।

MP Mohammad Jawed का राजनीतिक सफर भी इस मुद्दे से जुड़ा है। किशनगंज से 2019 और 2024 में चुने गए जावेद एक चिकित्सक हैं और सामाजिक न्याय के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने ट्रिपल तलाक बिल पर भी जोरदार भाषण दिया था। उनका आज का प्रस्ताव AIMIM और अन्य विपक्षी दलों का समर्थन हासिल कर रहा है। सोशल मीडिया पर हजारों यूजर्स ने #JusticeForAtharHussain कैंपेन शुरू किया है, जो नवादा घटना से प्रेरित है।

इस प्रस्ताव का महत्व केवल सदन तक सीमित नहीं है। यह समाज को आईना दिखाता है कि नफरत कैसे कानून को कमजोर कर रही है। अगर सरकार ने तत्काल कदम नहीं उठाए, तो ये घटनाएं और बढ़ेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में तीर्थानकर मणि त्रिपाठी मामले में मॉब लिंचिंग पर दिशानिर्देश दिए थे, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा। अब समय है कि संसद एक विशेष कानून बनाए, जिसमें फास्ट-ट्रैक ट्रायल और कठोर सजा का प्रावधान हो।

निष्कर्षतः MP Mohammad Jawed का प्रस्ताव एक उम्मीद की किरण है। यह न केवल मॉब लिंचिंग के शिकारों के लिए न्याय की मांग है, बल्कि भारत के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प भी। अगर सदन ने इस पर गंभीर चर्चा की, तो शायद नवादा जैसी त्रासदियां रुक सकें। अन्यथा, नफरत की आग और भड़केगी। देश को अब एकजुट होकर इस चुनौती का सामना करना होगा।

By SHAHID

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