10 दिसंबर 2025: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा एमबीबीएस सीटों पर लगाए जाने वाले कैपिंग नियम को 2024-25 और 2025-26 शैक्षणिक सत्रों के लिए स्थगित कर दिया गया है। यह फैसला केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने मंगलवार (9 दिसंबर) को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में घोषित किया। 2023 में जारी एनएमसी के इस निर्देश के तहत राज्यों में प्रति 10 लाख आबादी पर केवल 100 एमबीबीएस सीटें सीमित करने का प्रस्ताव था, जो दक्षिणी राज्यों जैसे केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। इन राज्यों में पहले से ही निर्धारित अनुपात से अधिक सीटें उपलब्ध हैं, और कैपिंग लागू होने से मेडिकल शिक्षा का विस्तार रुक सकता था। नड्डा ने स्पष्ट किया कि यह स्थगन स्थायी नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए अस्थायी कदम है।

एनएमसी का यह निर्देश मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और डॉक्टर-आबादी अनुपात को संतुलित करने के उद्देश्य से आया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक के अनुसार, प्रति 1,000 आबादी पर कम से कम एक डॉक्टर होना चाहिए, जबकि भारत में यह अनुपात 0.7 है। कैपिंग के जरिए एनएमसी ने राज्यवार सीट वितरण को नियंत्रित करने का प्रयास किया, ताकि उत्तर भारत जैसे कम विकसित क्षेत्रों में मेडिकल कॉलेजों का विस्तार हो सके। हालांकि, दक्षिणी राज्यों के सांसदों और चिकित्सा संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया। केरल में प्रति 10 लाख आबादी पर 350 से अधिक सीटें हैं, जो कैपिंग से प्रभावित होतीं। तमिलनाडु मेडिकल काउंसिल और भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) ने चेतावनी दी थी कि इससे लाखों छात्रों के सपनों पर असर पड़ेगा और मेडिकल टूरिज्म जैसे क्षेत्र प्रभावित होंगे। राज्यसभा में द्रमुक सांसद के. कनिमोझी और अन्य ने इस मुद्दे को उठाया, जिसके बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने पुनर्विचार किया।

इस स्थगन से मेडिकल छात्रों और संस्थानों को बड़ी राहत मिली है। 2024-25 सत्र के लिए नीट-यूजी के माध्यम से 1.1 लाख से अधिक एमबीबीएस सीटें भरी जा रही हैं, और कैपिंग हटने से नए कॉलेजों को मंजूरी मिलना आसान होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम मेडिकल शिक्षा के विस्तार को बढ़ावा देगा, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समान नीति जरूरी है। नड्डा ने कहा कि सरकार क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए विशेष योजना पर काम कर रही है, जिसमें उत्तरी राज्यों में 50,000 नई सीटें जोड़ने का लक्ष्य है। साथ ही, एनएमसी अब 2027 से कैपिंग को पुनः लागू करने की तैयारी कर रही है, जिसमें राज्य सरकारों की राय ली जाएगी।

राजनीतिक रूप से यह फैसला विपक्ष के लिए जीत है, जो जंगल राज के दौर की नीतियों पर हमला बोल रहा था। आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इसे “छात्र-केंद्रित निर्णय” बताया, जबकि निजी मेडिकल कॉलेज एसोसिएशन ने निवेशकों को आकर्षित करने का अवसर देखा। हालांकि, आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह स्थगन केवल चुनावी लाभ के लिए है, क्योंकि 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। कुल मिलाकर, यह फैसला मेडिकल शिक्षा को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में सकारात्मक है, लेकिन कार्यान्वयन पर नजर रखना जरूरी। इससे देश में डॉक्टरों की कमी दूर करने और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

By SHAHID

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