11 दिसंबर 2025: 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े ‘बड़े षड्यंत्र’ मामले में लंबे समय से जेल में बंद पूर्व जेएनयू छात्र नेता उमर खालिद को दिल्ली की एक अदालत ने अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए दो सप्ताह की अंतरिम जमानत प्रदान कर दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने मंगलवार को यह फैसला सुनाया, जिससे खालिद को 16 से 29 दिसंबर तक जमानत पर बाहर रहने की अनुमति मिल गई। यह फैसला न केवल परिवार के लिए राहत का विषय है, बल्कि यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत लंबित मामलों में मानवीय आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप का उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।
यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़ा है, जिसमें 53 लोगों की मौत और सैकड़ों घायल हुए थे। दिल्ली पुलिस ने इसे ‘आतंकवादी साजिश’ बताते हुए खालिद सहित कई कार्यकर्ताओं पर यूएपीए के तहत मुकदमा चलाया। खालिद को अगस्त 2020 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वे तिहाड़ जेल में बंद हैं। उनकी नियमित जमानत याचिकाएं दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो चुकी हैं, लेकिन परिवार के विशेष अनुरोध पर अदालत ने यह अंतरिम राहत दी। न्यायाधीश बाजपेयी ने फैसले में कहा, “परिवार के महत्वपूर्ण अवसर पर उपस्थिति का अधिकार मौलिक है, लेकिन सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।”
अदालत ने जमानत पर सख्त शर्तें लगाई हैं। खालिद को सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट करने, मीडिया से बात करने या किसी से संपर्क करने की मनाही है। उन्हें दिल्ली पुलिस के संपर्क में रहना होगा और 29 दिसंबर को शाम 6 बजे तक जेल लौटना होगा। पुलिस ने याचिका का विरोध किया था, दावा करते हुए कि खालिद ‘साजिश के प्रमुख सूत्रधार’ हैं और उनकी रिहाई से जांच प्रभावित हो सकती है। लेकिन अदालत ने तर्क दिया कि यह सीमित अवधि की जमानत है, जो किसी भी तरह से मुकदमे को प्रभावित नहीं करेगी।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट में खालिद की नियमित जमानत याचिका की सुनवाई के बीच आया है, जहां जस्टिस संजय करोल की बेंच ने फैसला सुरक्षित रखा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतरिम राहत सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावित कर सकती है, खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लंबी हिरासत के मुद्दों पर। खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने इसे ‘मानवीय न्याय की जीत’ बताया, जबकि पुलिस ने अपील का संकेत दिया है।
परिवार के लिए यह खबर बेहद सुखद है। खालिद की बहन सना की शादी 26 दिसंबर को निर्धारित है, और चार साल की जुदाई के बाद भाई-बहन की मुलाकात भावुक पल लेकर आएगी। खालिद के समर्थक और मानवाधिकार संगठन जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल ने फैसले का स्वागत किया, लेकिन पूर्ण जमानत की मांग दोहराई। विपक्षी दलों ने इसे ‘राजनीतिक हिरासत’ का प्रमाण बताया, जबकि सत्ताधारी भाजपा ने ‘कानूनी प्रक्रिया का सम्मान’ पर जोर दिया। सोशल मीडिया पर #UmarKhalidBail ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग न्याय व्यवस्था पर बहस कर रहे हैं।
यह घटना भारतीय न्याय प्रणाली में संतुलन की चुनौतियों को उजागर करती है। एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कठोर कानून, दूसरी ओर व्यक्तिगत अधिकार। क्या यह अंतरिम जमानत लंबी लड़ाई का टर्निंग पॉइंट बनेगी? सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही तय करेगा। फिलहाल, खालिद परिवार के साथ समय बिताने को तैयार हैं, जो जेल की सलाखों से बाहर एक सांस राहत है।