1. वर्तमान स्थिति: रिकॉर्ड गिरावट
3 दिसंबर 2025 को भारतीय रुपये ने डॉलर के मुकाबले नया निचला स्तर छुआ। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में USD/INR 90.05 से 90.30 तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर है। दिन के अंत में यह 90.19 पर बंद हुआ।
यह गिरावट 0.5% तक रही, और रुपये ने साल भर में (YTD) 5% से अधिक की कमी दर्ज की है, जो एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बन गया है।
| तिथि | USD/INR उच्च स्तर | USD/INR निम्न स्तर | परिवर्तन (%) |
|---|---|---|---|
| 2 दिसंबर 2025 | 89.85 | 89.45 | -0.3 |
| 3 दिसंबर 2025 | 90.30 | 90.05 | -0.5 |
| 1 दिसंबर 2025 | 89.60 | 89.20 | -0.2 |
स्रोत: बाजार डेटा (FXStreet और Investing.com)
2. ऐतिहासिक संदर्भ: 10 से 90 रुपये तक की यात्रा
1970 के दशक में 1 USD लगभग 8 रुपये था, जो 1990 तक 17-20 के बीच पहुंचा। 2008 की वैश्विक मंदी और 2013 के ‘टेपर टैन्ट्रम’ ने इसे 68 तक धकेला। 2020 की महामारी के बाद यह 75-80 के दायरे में रहा, लेकिन 2025 में व्यापारिक अनिश्चितताओं ने इसे 90 के पार कर दिया। यह चार दशकों की असमान गिरावट का परिणाम है, जहां विदेशी निवेश की कमी और आयात निर्भरता प्रमुख कारक रहे।
रुपये की यह गिरावट 2024 के अंत से 5.08% है, जो इसे एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बनाती है।
3. गिरावट के प्रमुख कारण
रुपये की यह कमजोरी कई वैश्विक और घरेलू कारकों का मिश्रण है। यहां मुख्य कारणों की सूची है:
- अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में अनिश्चितता: अमेरिकी टैरिफ (50% तक) और व्यापारिक गतिरोध ने निर्यात को प्रभावित किया, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी।
- विदेशी संस्थागत निवेश (FII) का बहिर्वाह: भारतीय शेयर बाजार से लगातार बिकवाली, जिससे पूंजी बाहर जा रही है।
- चालू खाता घाटा और आयात दबाव: कच्चे तेल और कमोडिटी की ऊंची कीमतें आयात बिल बढ़ा रही हैं। भारत का व्यापार घाटा बढ़ा है।
- मजबूत अमेरिकी डॉलर और वैश्विक जोखिम से बचाव: अमेरिकी ब्याज दरें ऊंची हैं, जो डॉलर को आकर्षक बनाती हैं। वैश्विक मंदी के डर से निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की ओर मुड़ रहे हैं।
- घरेलू कारक: वित्तीय घाटा बढ़ना और मुद्रास्फीति का दबाव।
ये कारक मिलकर रुपये को दबाव में डाल रहे हैं, और विशेषज्ञों का कहना है कि बिना RBI हस्तक्षेप के यह और गिर सकता है।
4. भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
डॉलर के 90 के पार पहुंचने से अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी असर पड़ रहा है। सकारात्मक पक्ष कम हैं, लेकिन नकारात्मक प्रभाव प्रमुख हैं:
| क्षेत्र | प्रभाव |
|---|---|
| मुद्रास्फीति और जीवनयापन लागत | आयातित वस्तुओं (तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स) की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे महंगाई 6-7% तक पहुंच सकती है। |
| शिक्षा और यात्रा | विदेशी पढ़ाई या घूमने का खर्च 10-15% महंगा हो जाएगा। |
| निर्यात और उद्योग | निर्यातक लाभान्वित होंगे (रुपये की कमजोरी से), लेकिन आयात-निर्भर उद्योग (आईटी, फार्मा) प्रभावित। |
| आरबीआई नीति | मौद्रिक नीति समिति (MPC) पर दबाव; ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, जो विकास को धीमा करेगी। |
| कुल अर्थव्यवस्था | जीडीपी ग्रोथ पर 0.5-1% नकारात्मक असर; विदेशी निवेश घटेगा। |
कुल मिलाकर, यह रुपये को और नाजुक बना रहा है, और आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ा रहा है।
5. भविष्य का आउटलुक: क्या होगा आगे?
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि US-India व्यापार सौदा जल्द होता है और RBI डॉलर बेचकर हस्तक्षेप करता है, तो रुपये 88-89 तक स्थिर हो सकता है। लेकिन यदि टैरिफ बने रहते हैं, तो 92-95 तक गिरावट संभव है। RBI ने अभी तक सक्रिय भूमिका नहीं ली, लेकिन MPC बैठक में फैसला महत्वपूर्ण होगा।
सुझाव: निवेशक डॉलर-आधारित संपत्तियों (गोल्ड, US बॉन्ड्स) पर नजर रखें, और निर्यातक अवसर तलाशें।
निष्कर्ष
रुपये का 90 के पार जाना चिंताजनक है, लेकिन यह वैश्विक चुनौतियों का प्रतिबिंब है। भारत को व्यापार विविधीकरण, निर्यात बढ़ाने और FDI आकर्षित करने पर फोकस करना होगा।