18 दिसंबर 2025, India Summoned Bangladesh Ambassador– भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों में तनाव का एक नया अध्याय जुड़ गया है। 17 दिसंबर 2025 को भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने बांग्लादेश के हाई कमिश्नर मुहम्मद रियाज हमीदुल्लाह को दिल्ली में तलब किया। इसका मुख्य कारण ढाका में भारतीय उच्चायोग की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। MEA ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बांग्लादेश में सुरक्षा वातावरण बिगड़ रहा है, खासकर कुछ चरमपंथी तत्वों द्वारा भारतीय मिशन के आसपास अशांति फैलाने की योजनाओं को लेकर। यह कदम पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में निर्वासन, एंटी-इंडिया बयानों और अल्पसंख्यक हिंसा जैसे मुद्दों पर बढ़ते विवादों की पृष्ठभूमि में आया है। इस रिपोर्ट में हम इस घटना की पृष्ठभूमि, कारणों, प्रभावों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
शेख हसीना का निर्वासन: तनाव की जड़
सब कुछ अगस्त 2024 में शुरू हुआ, जब बांग्लादेश में छात्र-नेतृत्व वाले ‘जुलाई विद्रोह’ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका। हसीना, जो 2009 से सत्ता में थीं, को भ्रष्टाचार, दमनकारी शासन और आर्थिक संकट के आरोपों का सामना करना पड़ा। विद्रोह के दौरान सैकड़ों लोगों की मौत हुई, और हसीना को भारत भागना पड़ा। भारत ने उन्हें शरण दी, जो बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के लिए अस्वीकार्य रहा। हसीना की अवामी लीग पार्टी पर ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ के आरोप लगे हैं, और ढाका ने कई बार उनकी प्रत्यर्पण की मांग की है।
हसीना का भारत में रहना न केवल राजनीतिक विवाद का विषय है, बल्कि यह बांग्लादेश में एंटी-इंडिया भावनाओं को भड़का रहा है। अंतरिम सरकार के विदेश सलाहकार तौहिद हुसैन ने हाल ही में कहा कि हसीना भारत से ‘भड़काऊ बयान’ दे रही हैं, जो बांग्लादेश के आगामी चुनावों को प्रभावित कर सकते हैं। 14 दिसंबर को बांग्लादेश ने भारतीय हाई कमिश्नर को तलब कर इसी मुद्दे पर विरोध दर्ज कराया। भारत का तर्क है कि हसीना को शरण देना मानवीय आधार पर है, लेकिन ढाका इसे ‘हस्तक्षेप’ मानता है।
इस संदर्भ में, बांग्लादेश नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) के नेता हसनत अब्दुल्लाह का 15 दिसंबर का बयान विवादास्पद रहा। उन्होंने धमकी दी कि यदि भारत बांग्लादेश को अस्थिर करने की कोशिश करेगा, तो वे भारत के पूर्वोत्तर के ‘सेवन सिस्टर्स’ (सात बहनें—असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय) को अलग-थलग कर देंगे और अलगाववादी समूहों को शरण देंगे। यह बयान भारत के लिए गंभीर खतरे का संकेत है, क्योंकि पूर्वोत्तर में लंबे समय से अलगाववादी आंदोलन सक्रिय हैं। हसीना के शासनकाल में भारत ने बांग्लादेश से इन समूहों के खिलाफ सहयोग लिया था, लेकिन अब अंतरिम सरकार का पाकिस्तान और चीन की ओर झुकाव चिंता बढ़ा रहा है।
ढाका में प्रदर्शन और सुरक्षा खतरे
तनाव चरम पर तब पहुंचा जब 17 दिसंबर को ढाका में ‘जुलाई ओइक्या’ (जुलाई एकता) नामक समूह ने भारतीय उच्चायोग की ओर मार्च शुरू किया। यह समूह, जिसमें कई कट्टरपंथी राजनीतिक दल और संगठन शामिल हैं, ने एंटी-इंडिया नारे लगाए और हसीना व उनके सहयोगियों को ‘हत्या करने वाले’ करार दिया। प्रदर्शनकारियों ने भारत पर ‘बांग्लादेशी आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप’ का आरोप लगाया, साथ ही हसीना के प्रत्यर्पण, प्रॉक्सी पार्टियों के माध्यम से साजिश रोंकने और 1971 के मुक्ति संग्राम के इतिहास को फिर से लिखने जैसे मुद्दे उठाए। पुलिस ने प्रदर्शन को रोक दिया, लेकिन MEA ने इसे ‘चरमपंथी तत्वों की योजना’ बताया।
MEA के बयान में कहा गया, “बांग्लादेश हाई कमिश्नर रियाज हमीदुल्लाह को बांग्लादेश में बिगड़ते सुरक्षा वातावरण पर भारत की मजबूत चिंताओं से अवगत कराया गया। विशेष रूप से, कुछ चरमपंथी तत्वों द्वारा भारतीय मिशन के आसपास अशांति पैदा करने की योजनाओं पर ध्यान दिलाया गया।” यह तलबी के तुरंत बाद भारत ने ढाका में अपना वीजा केंद्र (IVAC) अस्थायी रूप से बंद कर दिया, जो सुरक्षा कारणों से था। बांग्लादेश ने अभी तक आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन अंतरिम सरकार ने भारत के बयानों को ‘आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप’ बताया है।
इस घटना ने अल्पसंख्यक सुरक्षा के मुद्दे को भी उजागर किया। 2024 के संकट के बाद बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हमले बढ़े हैं, जिससे भारत में विरोध प्रदर्शन हुए। दिसंबर 2024 में त्रिपुरा में बांग्लादेश सहायक उच्चायोग पर हमला हुआ, जो अब अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल द्वारा हसीना को मौत की सजा देने के बाद और तीव्र हो सकता है। भारत का मानना है कि अंतरिम सरकार कट्टर इस्लामी समूहों को बढ़ावा दे रही है, जो 1971 के इतिहास को तोड़-मरोड़ रही है।
द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव: आर्थिक और कूटनीतिक झटका
भारत-बांग्लादेश संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं—1971 के युद्ध में भारत की भूमिका से लेकर व्यापार और जल-साझेदारी तक। लेकिन हसीना के निर्वासन ने सब बदल दिया। व्यापार, जो 2024 में 14 अरब डॉलर का था, अब प्रभावित हो रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण पारगमन मार्ग है, और अब्दुल्लाह के बयान से सीमा सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। भारत ने पहले ही वीजा प्रतिबंध लगाए हैं, और यदि तनाव बढ़ा तो व्यापार बाधित हो सकता है।
कूटनीतिक स्तर पर, यह घटना भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति को चुनौती दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने हसीना को शरण देकर बांग्लादेश की स्थिरता का समर्थन किया था, लेकिन अब अंतरिम सरकार का पाकिस्तान-चीन झुकाव (जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यास) भारत को अलग-थलग कर रहा है। पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत ने कहा, “यह पाकिस्तान और चीन के करीब आने का संकेत है, जो भारत के लिए खतरा है।” अमेरिका और यूरोपीय संघ ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है, लेकिन कोई मध्यस्थता की पेशकश नहीं की।
भारत ने बांग्लादेश से अपनी डिप्लोमेटिक संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। यदि प्रदर्शन जारी रहे, तो भारत कड़े कदम उठा सकता है, जैसे हसीना पर प्रतिबंध या आर्थिक दबाव। बांग्लादेश के आगामी चुनाव (2026 में संभावित) में यह मुद्दा बड़ा भूमिका निभा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा
दक्षिण एशिया में यह तनाव क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है। संकटग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 तक भारत-बांग्लादेश तनाव बढ़ सकता है, खासकर हसीना प्रत्यर्पण पर। पाकिस्तान का बांग्लादेश के साथ नजदीकी बढ़ना भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह आतंकवाद और सीमा विवादों को बढ़ावा दे सकता है। चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में बांग्लादेश की भागीदारी भी भारत को असहज कर रही है।
संयुक्त राष्ट्र ने अल्पसंख्यक सुरक्षा पर चिंता जताई है, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। भारत को अब कूटनीतिक प्रयास तेज करने होंगे—शायद ब्रिक्स या बिम्सटेक जैसे मंचों पर।
निष्कर्ष: संवाद की आवश्यकता
भारत द्वारा बांग्लादेश राजदूत को तलब करना द्विपक्षीय संबंधों में एक और मोड़ है। हसीना का निर्वासन, एंटी-इंडिया बयान और सुरक्षा खतरे जैसे मुद्दे अनसुलझे रहने से तनाव बढ़ेगा। दोनों देशों को संवाद की राह अपनानी चाहिए—शायद तीसरे पक्ष की मदद से। भारत को पूर्वोत्तर की सुरक्षा मजबूत करनी होगी, जबकि बांग्लादेश को चरमपंथ को रोकना होगा। अन्यथा, आर्थिक नुकसान और मानवीय संकट बढ़ेंगे। क्या यह संकट सामान्यीकरण की ओर ले जाएगा? समय बताएगा।