ICJ gambia vs mayanmarICJ gambia vs mayanmar

13 जनवरी 2026, गांबिया बनाम म्यांमार नरसंहार मामले में ICJ सुनवाई: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में गांबिया द्वारा म्यांमार के खिलाफ दायर रोहिंग्या नरसंहार मामले की सुनवाई 12 जनवरी से शुरू हो गई है, जो एक दशक से अधिक समय बाद पहला पूर्ण नरसंहार मुकदमा है। यह मामला 2019 में दायर किया गया था और अब मेरिट्स पर सुनवाई हो रही है, जिसमें 11 देश हस्तक्षेप कर रहे हैं। गांबिया ने म्यांमार की सेना पर रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ “क्रूर और क्रूर उल्लंघन” का आरोप लगाया है, जबकि म्यांमार इन आरोपों को खारिज करता है। सुनवाई 29 जनवरी तक चलेगी, जो रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए न्याय की उम्मीद जगा रही है। यह रिपोर्ट मामले की पृष्ठभूमि, कार्यवाही और निहितार्थों पर विस्तार से चर्चा करती है।

रोहिंग्या संकट की पृष्ठभूमि

रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन राज्य में रहने वाला मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय है, जिसे दशकों से भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ा है। 1982 के नागरिकता कानून ने उन्हें नागरिकता से वंचित कर दिया, जिससे वे दुनिया के सबसे बड़े स्टेटलेस समुदाय बन गए। संकट 2016-2017 में चरम पर पहुंचा, जब म्यांमार सेना ने “क्लीयरेंस ऑपरेशन” के नाम पर गांवों को जला दिया, हत्याएं कीं और सामूहिक बलात्कार किए।

2017 की हिंसा और शरणार्थी संकट

अगस्त 2017 में रोहिंग्या विद्रोहियों के हमलों के बाद सेना की प्रतिक्रिया में 700,000 से अधिक रोहिंग्या बांग्लादेश भाग गए। संयुक्त राष्ट्र ने इसे “नरसंहार की पाठ्यपुस्तक उदाहरण” कहा। रिपोर्ट्स में 10,000 से अधिक मौतें, हजारों बलात्कार और गांवों का विनाश दर्ज है। रोहिंग्या अब कॉक्स बाजार में दुनिया के सबसे बड़े शरणार्थी शिविर में रहते हैं, जहां स्वास्थ्य और सुरक्षा की समस्याएं बनी हुई हैं। म्यांमार ने इन आरोपों को “आतंकवाद विरोधी अभियान” बताया।

गांबिया की भूमिका

एक छोटा अफ्रीकी देश गांबिया ने 1948 के नरसंहार कन्वेंशन के तहत मामला दायर किया, क्योंकि म्यांमार और गांबिया दोनों हस्ताक्षरकर्ता हैं। गांबिया के न्याय मंत्री अबुबाकर तम्बाडू ने कहा कि यह मुस्लिम समुदाय की एकजुटता का प्रतीक है। ओआईसी (ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन) ने गांबिया का समर्थन किया।

ICJ में कार्यवाही का सफर

मामला नवंबर 2019 में दायर किया गया, जब गांबिया ने म्यांमार पर नरसंहार रोकने की मांग की। ICJ ने जनवरी 2020 में अस्थायी उपाय जारी किए, म्यांमार को रोहिंग्या की रक्षा करने का आदेश दिया।

प्रारंभिक आपत्तियां और अस्वीकृति

म्यांमार ने 2021 में प्रारंभिक आपत्तियां दर्ज कीं, दावा करते हुए कि गांबिया को मुकदमा दायर करने का अधिकार नहीं। जुलाई 2022 में ICJ ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया, कहा कि कन्वेंशन के तहत कोई भी हस्ताक्षरकर्ता मुकदमा दायर कर सकता है। म्यांमार की नेता आंग सान सू की ने 2019 में खुद बचाव किया था, लेकिन 2021 के तख्तापलट के बाद सेना शासन में है।

वर्तमान सुनवाई: जनवरी 2026

12 जनवरी 2026 को हेग में सुनवाई शुरू हुई, जो 29 जनवरी तक चलेगी। गांबिया ने पहले दिन तर्क पेश किए, म्यांमार पर रोहिंग्या को “मिटाने” का प्रयास करने का आरोप लगाया। गांबिया के वकीलों ने सबूत पेश किए, जिसमें सैन्य अभियानों की तस्वीरें, गवाहियां और रिपोर्ट्स शामिल हैं। म्यांमार का प्रतिनिधित्व सेना के अधिकारी कर रहे हैं, जो आरोपों को अस्वीकार करेंगे। 11 देशों ने हस्तक्षेप किया है, जिसमें कनाडा, नीदरलैंड्स आदि शामिल हैं।

गांबिया के मुख्य तर्क

गांबिया ने कहा कि म्यांमार ने रोहिंग्या के खिलाफ हत्या, बलात्कार और उत्पीड़न के माध्यम से नरसंहार किया। उन्होंने UN रिपोर्ट्स का हवाला दिया, जिसमें सेना की भूमिका साबित है। गांबिया ने मुआवजा और न्याय की मांग की।

म्यांमार का बचाव

म्यांमार दावा करता है कि कार्रवाई आतंकवाद विरोधी थी, न कि नरसंहार। वे ICJ के क्षेत्राधिकार को चुनौती देते रहे हैं। तख्तापलट के बाद, सेना ने सू की को हिरासत में लिया, लेकिन मामला जारी है।

मामले के निहितार्थ

यदि ICJ म्यांमार को दोषी ठहराता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाएगा, संभवतः प्रतिबंध और जांच। रोहिंग्या के लिए यह न्याय की जीत होगी, लेकिन क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है क्योंकि ICJ के फैसले बाध्यकारी हैं लेकिन प्रवर्तन UNSC पर निर्भर। चीन और रूस जैसे देश म्यांमार का समर्थन कर सकते हैं।

वैश्विक प्रतिक्रिया

बांग्लादेश के रोहिंग्या शरणार्थी न्याय की उम्मीद कर रहे हैं। मानवाधिकार संगठन जैसे एमनेस्टी और HRW ने सुनवाई का स्वागत किया। यह मामला नरसंहार कन्वेंशन की प्रभावशीलता की परीक्षा है।

निष्कर्ष

यह सुनवाई रोहिंग्या के दशकों के दर्द पर वैश्विक ध्यान केंद्रित करती है। फैसला 2026 के अंत तक आ सकता है, जो म्यांमार की राजनीति को प्रभावित करेगा। रोहिंग्या समुदाय के लिए यह उम्मीद की किरण है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी। कुल मिलाकर, यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्याय की ताकत दिखाता है, जहां एक छोटा देश बड़े अन्याय के खिलाफ खड़ा हो सकता है।

Sources: अल जज़ीरा, बीबीसी

By Mohd Abdush Shahid

Mohd Abdush Shahid is Founder and content creator at www.views24.in, specializing in news analysis, feature reporting, and in-depth storytelling. With a keen eye for detail and a passion for uncovering impactful narratives, Mohd Abdush Shahid delivers trusted, engaging content that keeps readers informed and inspired.

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