4 जनवरी 2026, Thakurganj में हाथियों का झुंड 4 दिन से मचा रहा उत्पात: बिहार के किशनगंज जिले के Thakurganj प्रखंड में नेपाल सीमा से सटे इलाकों में हाथियों का एक झुंड पिछले चार दिनों से लगातार उत्पात मचा रहा है। इस झुंड ने किसानों की आलू, गोभी, मकई और अन्य सब्जियों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिससे लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत का माहौल है, और स्थानीय लोग वन विभाग की लापरवाही पर सवाल उठा रहे हैं। ठाकुरगंज के बंदरझुला, कद्दूभिटा और आसपास के गांवों में रात के अंधेरे में हाथी खेतों में घुसकर फसलें रौंद रहे हैं, जिससे किसान रात-रात भर जागकर पहरा दे रहे हैं। इस रिपोर्ट में हम इस समस्या की पृष्ठभूमि, प्रभाव, प्रशासनिक प्रतिक्रिया और समाधान के उपायों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
समस्या की पृष्ठभूमि: नेपाल से आने वाले हाथियों का सिलसिला
Thakurganj भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है, जहां कुसहा बैराज और महानंदा नदी के कारण वन्यजीवों का आवागमन आम बात है। वन विशेषज्ञों के अनुसार, नेपाल के तराई क्षेत्र से हाथी झुंड भोजन और पानी की तलाश में बिहार की ओर रुख कर रहे हैं। इस बार का झुंड लगभग 8-10 हाथियों का है, जो 31 दिसंबर से Thakurganj के खेतों में घुसा हुआ है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार रात को बंदरझुला पंचायत में हाथियों ने आलू और गोभी की फसलों को चर डाला, जिससे 20 से अधिक किसानों को 5-10 लाख रुपये का नुकसान हुआ। कद्दूभिटा गांव में भी इसी तरह की तबाही मची, जहां हाथियों ने न केवल फसलें उजाड़ीं बल्कि कुछ घरों के दरवाजे तोड़ दिए।
यह समस्या नई नहीं है। पिछले वर्ष फरवरी में भी नेपाल से आए हाथियों ने तलवारबंधा और डोरिया क्षेत्रों में फसलें बर्बाद की थीं। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट में उल्लेख है कि किशनगंज के मक्का उत्पादक किसान हाथियों के हमलों से परेशान हैं, क्योंकि फसल कटाई से ठीक पहले ये झुंड आ जाते हैं। जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई के कारण हाथियों का प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहा है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ गया है। बिहार वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में किशनगंज में हाथी उत्पात से 50 से अधिक मौतें और करोड़ों का नुकसान दर्ज किया गया। ठाकुरगंज जैसे सीमावर्ती इलाकों में यह समस्या और गंभीर है, क्योंकि नेपाल पक्ष से कोई समन्वय नहीं होता।
प्रभाव: आर्थिक तबाही और ग्रामीणों में भय का साया
हाथियों के इस उत्पात से सबसे ज्यादा प्रभावित किसान हैं। Thakurganj के स्थानीय किसान रामलाल महतो ने बताया, “हमारी आलू की फसल तैयार थी, लेकिन हाथियों ने सब कुछ रौंद दिया। अब बीमा का क्या फायदा, जब मुआवजा समय पर नहीं मिलता।” हिंदुस्तान की खबर के अनुसार, बंदरझुला में मकई की फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं, और कई परिवारों को राशन तक के लाले पड़ गए। कुल नुकसान का अनुमान 20-25 लाख रुपये लगाया जा रहा है, जिसमें सब्जी उत्पादन पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है।
न केवल फसलें, बल्कि ग्रामीणों की जान-माल को भी खतरा है। रात में हाथियों की दहाड़ से लोग घरों में कैद हो जाते हैं, और बच्चे-बुजुर्ग दहशत में जी रहे हैं। एक घटना में कद्दूभिटा के एक किसान को हाथी ने घायल कर दिया, जब वह फसल बचाने के चक्कर में खेत में उतरा। अमर उजाला की पुरानी रिपोर्ट याद दिलाती है कि फरवरी 2024 में किशनगंज में हाथियों ने कई घर तोड़ दिए थे, और पांच मौतें हो चुकी थीं। वर्तमान में, हालांकि कोई मौत नहीं हुई, लेकिन भय का माहौल इतना है कि स्कूलों में भी उपस्थिति कम हो गई है। महिलाएं और बच्चे रात में जंगल की ओर जाने से कतरा रहे हैं।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया: वन विभाग की सुस्ती पर सवाल
वन विभाग की टीम ने घटनास्थल का दौरा किया है, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई। Thakurganj वन रेंजर ने बताया कि हाथियों को खदेड़ने के लिए पटाखे और ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन झुंड नेपाल की ओर लौटने को तैयार नहीं। किसान संगठनों ने जिला प्रशासन से तत्काल मुआवजे की मांग की है, लेकिन पिछले अनुभवों से वे निराश हैं। पटना प्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि नेपाल से आने वाले हाथियों के लिए द्विपक्षीय समझौते की जरूरत है।
स्थानीय विधायक और जिला मजिस्ट्रेट ने बैठक बुलाई है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह सब कागजी कार्रवाई है। ईटीवी भारत की एक वीडियो रिपोर्ट (नवंबर 2025) में जमुई के हाथी उत्पात का जिक्र है, जहां 22 हाथियों ने फसलें बर्बाद कीं, और वन विभाग ने अलर्ट जारी किया था। किशनगंज में भी ऐसा ही अलर्ट जारी किया गया है, लेकिन प्रभावी नहीं।
समाधान के उपाय: दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता
इस समस्या का समाधान तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक होना चाहिए। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि सीमा पर इलेक्ट्रिक फेंसिंग लगाई जाए, और किसानों को बीमा कवर बढ़ाया जाए। नेपाल के साथ संयुक्त निगरानी टीम गठित करने से मदद मिल सकती है। इसके अलावा, हाथियों के लिए वैकल्पिक भोजन स्थल (फूड कॉरिडोर) विकसित किए जाएं। बिहार सरकार ने 2025 में ‘मानव-हाथी संघर्ष न्यूनीकरण योजना’ शुरू की थी, जिसमें सोलर लाइट्स और सायरन वितरित किए गए, लेकिन ठाकुरगंज में इनकी कमी है।
ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से वन विभाग पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। एक किसान नेता ने कहा, “हमें मुआवजा नहीं, सुरक्षा चाहिए। वरना हम सड़क पर उतरेंगे।” ओटीवी न्यूज की रिपोर्टों से प्रेरित होकर, ओडिशा मॉडल को अपनाया जा सकता है, जहां हाथियों को ट्रैक करने के लिए जीपीएस कॉलर लगाए जाते हैं।
निष्कर्ष: प्रकृति और मानव के बीच संतुलन की चुनौती
Thakurganj का यह हाथी उत्पात मानव-वन्यजीव संघर्ष का प्रतीक है, जो विकास और संरक्षण के बीच की खाई को उजागर करता है। लाखों की फसलें बर्बाद होने से किसानों का एक साल का मेहनत बेकार हो गया, और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे। यदि प्रशासन ने समय रहते कार्रवाई नहीं की, तो यह समस्या और विकराल रूप धारण कर लेगी। किशनगंज जैसे सीमावर्ती जिलों में स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना जरूरी है, ताकि वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में रह सकें। उम्मीद है कि वन विभाग जल्द ही प्रभावी उपाय करेगा, और Thakurganj के ग्रामीण फिर से निश्चिंत हो सकेंगे।
Sources: दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान