Gurmeet Ram RahimGurmeet Ram Rahim

5 जनवरी 2026, Gurmeet Ram Rahim को 40 दिनों की पैरोल– हरियाणा के सुनारिया जेल से बलात्कार और हत्या के दोषी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख Gurmeet Ram Rahim को 40 दिनों की पैरोल मिल गई है। यह उनकी 15वीं पैरोल है, जो पांच महीने पहले मिली 40-दिवसीय छुट्टी के ठीक बाद आ रही है। हरियाणा सरकार के इस फैसले ने एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा कर दिया है। Gurmeet Ram Rahim, जिन्हें ‘मसीहा’ के नाम से पुकारा जाता है, आज जेल से रिहा होकर सिरसा स्थित अपने डेरा मुख्यालय लौट चुके हैं, जहां वे अनुयायियों के बीच रहेंगे। जेल प्रशासन के अनुसार, पैरोल के दौरान वे ‘धार्मिक कार्यों’ में संलग्न रहेंगे, लेकिन सख्त निगरानी में।

यह पैरोल हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद दी गई है, जहां राज्य सरकार को ‘विशेष सुरक्षा’ सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया था। Gurmeet Ram Rahim 2017 से रोहतक की सुनारिया जेल में सजा काट रहे हैं। CBI कोर्ट ने उन्हें दो नन के बलात्कार के लिए 20 साल की सजा सुनाई थी, जबकि 2015 के पत्रकार पत्रिका हत्याकांड में उम्रकैद। इन अपराधों के बावजूद, उनकी पैरोलें लगातार मिलती रही हैं—चुनावी मौसम, महामारी या ‘धार्मिक आयोजन’ के नाम पर। 2025 में ही उन्हें तीन बार पैरोल मिल चुकी थी, कुल मिलाकर 2017 से अब तक 14 बार जेल से बाहर। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पैरोल राजनीतिक दबाव का परिणाम है, खासकर हरियाणा और पंजाब में डेरा के लाखों अनुयायी वोट बैंक के कारण।

पृष्ठभूमि: अपराधों का काला इतिहास और ‘संत’ की छवि

Gurmeet Ram Rahim का जन्म 15 अगस्त 1967 को हरियाणा के लम्बी जागीर गांव में हुआ था। वे 1990 से डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख हैं, जो सामाजिक सेवा के नाम पर करोड़ों का साम्राज्य चला रहा है। डेरा के अनुयायी उन्हें ‘बालों का त्याग करने वाले संत’ मानते हैं, जिन्होंने कथित तौर पर लाखों को नशा छुड़ाया और रक्तदान अभियान चलाया। लेकिन 2015 में पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या और 2002 के बलात्कार कांड ने उनकी छवि को धूमिल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में इन सजाओं को बरकरार रखा, लेकिन पैरोल प्रक्रिया को ‘मानवीय आधार’ पर जारी रखा।

पिछली पैरोल्स में Gurmeet Ram Rahim ने डेरा में ‘सत्संग’ आयोजित किए, जहां वे अनुयायियों को ‘आशीर्वाद’ देते रहे। 2020 में कोविड के दौरान 20 दिनों की पैरोल मिली, जबकि 2024 लोकसभा चुनावों से पहले 30 दिनों की। इस बार 40 दिनों की पैरोल का आवेदन डेरा ने ‘धार्मिक उत्सव’ और ‘सेवा कार्य’ के लिए किया था। जेल अधीक्षक ने रिपोर्ट में कहा कि Gurmeet Ram Rahim का आचरण ‘अच्छा’ रहा है, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे ‘न्यायिक चूक’ बता रहे हैं। वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा, “पैरोल दोषियों को ‘छुट्टी’ नहीं, सुधार का मौका है। लेकिन राम रहीम के मामले में यह राजनीतिक खेल लगता है।”

रिहाई के तुरंत बाद सिरसा डेरा में हर्षोल्लास का माहौल है। हजारों अनुयायी ‘मसीहा की जय’ के नारे लगा रहे हैं, जबकि सुरक्षा बलों ने भारी तैनाती की है। सोशल मीडिया पर #RamRahimParole ट्रेंड कर रहा है, जहां समर्थक उनकी ‘मासूमियत’ की बात कर रहे हैं।

प्रतिक्रियाएं: समर्थन और आलोचना का दौर

फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तीखी हैं। भाजपा और जजपा ने चुप्पी साधी है, क्योंकि हरियाणा में डेरा का वोट प्रभावी है। विपक्षी दल कांग्रेस ने कटाक्ष किया—नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा ने कहा, “अपराधी को बार-बार पैरोल देकर न्याय व्यवस्था का मजाक उड़ा रहे हैं।” आप ने इसे ‘चुनावी स्टंट’ करार दिया। पंजाब में AAP सरकार ने कहा कि वे डेरा की गतिविधियों पर नजर रखेंगे।

महिला अधिकार संगठनों ने कड़ी निंदा की। नेशनल कमीशन फॉर वुमन (NCW) ने पैरोल पर पुनर्विचार की मांग की, जबकि #MeToo एक्टिविस्ट राणा अयूब ने ट्वीट किया, “बलात्कार के दोषी को छुट्टी? यह पीड़ितों का अपमान है।” अनुयायी संगठन डेरा कमेटी ने कहा, “गुरमीत जी निर्दोष हैं, पैरोल सेवा का अवसर है।” पूर्व IPS अधिकारी ने कहा कि पैरोल के दौरान डेरा में ‘भर्ती’ बढ़ सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता मेदहा पाटकर ने कहा, “यह पैटर्न दर्शाता है कि अमीर और प्रभावशाली अपराधी कानून से ऊपर हैं।” संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार रिपोर्ट में भी भारत की पैरोल प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।

प्रभाव: सामाजिक और कानूनी निहितार्थ

यह पैरोल सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करेगी। डेरा के 6 करोड़ अनुयायी (आधिकारिक दावा) में ज्यादातर गरीब और दलित हैं, जो Gurmeet Ram Rahim को ‘मसीहा’ मानते हैं। उनकी रिहाई से डेरा की आर्थिक गतिविधियां—जैसे हॉस्पिटल और स्कूल—तेज होंगी, लेकिन बलात्कार पीड़ित परिवारों में आक्रोश बढ़ेगा। 2017 सजा के बाद डेरा में हिंसा हुई थी, जिसमें 38 लोग मारे गए। सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं।

कानूनी रूप से, यह UAPA और IPC मामलों में पैरोल मानदंडों पर बहस छेड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में दिशानिर्देश जारी किए थे कि पैरोल ‘सुधार’ पर आधारित हो, लेकिन राज्य सरकारें अक्सर नजरअंदाज करती हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2026 हरियाणा विधानसभा चुनावों से पहले और पैरोलें मिल सकती हैं। आर्थिक प्रभाव: डेरा का कारोबार करोड़ों का है, जो पैरोल से बढ़ेगा।

भविष्य: न्याय की प्रतीक्षा या राजनीतिक खेल?

Gurmeet Ram Rahim की सजा में अपील लंबित है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में कोई राहत नहीं दी। पैरोल के बाद वे डेरा में ‘सेवा’ करेंगे, लेकिन निगरानी सख्त रहेगी। यदि उल्लंघन हुआ, तो सजा बढ़ सकती है। विपक्ष सुधार कानून की मांग कर रहा है।

संक्षेप में, यह पैरोल ‘संत’ बनाम ‘अपराधी’ की बहस को जीवित रखेगी। क्या यह न्याय है या राजनीति? पीड़ितों को न्याय कब मिलेगा?

Sources: द हिंदू,

By Mohd Abdush Shahid

Mohd Abdush Shahid is Founder and content creator at www.views24.in, specializing in news analysis, feature reporting, and in-depth storytelling. With a keen eye for detail and a passion for uncovering impactful narratives, Mohd Abdush Shahid delivers trusted, engaging content that keeps readers informed and inspired.

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