25 फरवरी 2026, France ने सोर्स कोड देने से इनकार: भारतीय वायु सेना (IAF) के लिए लड़ाकू विमान खरीद का मामला हमेशा से रणनीतिक, तकनीकी और राजनीतिक महत्व का रहा है। हाल ही में, फ्रांस से 114 राफेल मल्टी-रोल फाइटर जेट्स की खरीद को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने मंजूरी दी है, जो भारत की सबसे बड़ी सैन्य खरीद में से एक है। इस डील की अनुमानित कीमत लगभग 35-40 बिलियन अमेरिकी डॉलर है। लेकिन फ्रांसीसी मीडिया आउटलेट L’Essentiel de l’Éco और Military Watch Magazine जैसी रिपोर्ट्स के अनुसार, फ्रांस ने राफेल के मुख्य इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट SPECTRA के सोर्स कोड ट्रांसफर करने से साफ इनकार कर दिया है। यह फैसला भारत की ऑपरेशनल स्वायत्तता पर गहरा असर डाल सकता है और रूस के Su-57 की अपील को बढ़ा सकता है।
राफेल डील का बैकग्राउंड
राफेल डील की जड़ें 2007 के MMRCA (Medium Multi-Role Combat Aircraft) कॉम्पिटिशन में हैं, जहां 126 विमानों की खरीद के लिए Dassault Aviation को चुना गया था। लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT), लागत और HAL के साथ प्रोडक्शन पर असहमति के कारण डील रद्द हो गई। 2016 में भारत ने 36 राफेल सीधे खरीदे, जो अब IAF में ऑपरेशनल हैं। 2025 के मई में पाकिस्तान के साथ हुए संघर्ष (Operation Sindoor) में राफेल की भूमिका चर्चा में रही, लेकिन कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोर्स कोड की कमी से इंडिजिनस हथियारों (जैसे Astra मिसाइल) की इंटीग्रेशन और डेटा-लिंक ऑप्टिमाइजेशन में दिक्कत आई, जिससे कम से कम एक राफेल की हानि हुई।
अब MRFA (Multi-Role Fighter Aircraft) प्रोग्राम के तहत 114 राफेल की खरीद पर बात चल रही है – जिसमें 18 फ्लाई-अवे और बाकी भारत में प्रोडक्शन (Dassault-Reliance JV के जरिए)। लेकिन फ्रांस ने SPECTRA EW सूट, RBE2 AESA रडार, मॉड्यूलर मिशन कंप्यूटर (MDPU – राफेल का ‘ब्रेन’) और अन्य कोर एवियोनिक्स के सोर्स कोड देने से मना कर दिया है। फ्रांस इसे अपनी दशकों की R&D से बनी प्रोप्राइटरी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी मानता है। इससे भारत को इंडिपेंडेंटली सॉफ्टवेयर कस्टमाइजेशन, नए सेंसर्स/हथियार इंटीग्रेट करने या अपग्रेड्स में फ्रांस पर निर्भर रहना पड़ेगा।
Su-57: रूस का आकर्षक ऑफर
दूसरी ओर, रूस Su-57E (एक्सपोर्ट वेरिएंट) ऑफर कर रहा है। रूसी कंपनी United Aircraft Corporation (UAC) के डायरेक्टर जनरल Vadim Badekha ने कहा है कि भारत की सभी तकनीकी मांगें स्वीकार्य हैं। Su-57 के साथ “अनरेस्ट्रिक्टेड” टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सोर्स कोड एक्सेस, लाइसेंस्ड प्रोडक्शन और जॉइंट डेवलपमेंट का प्रस्ताव है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत 36-40 Su-57E खरीदने पर विचार कर रहा है (कीमत लगभग 7-9 बिलियन डॉलर), जो AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) के आने तक इंटरिम 5th जनरेशन सॉल्यूशन हो सकता है।
Su-57 एक ट्रू 5th जनरेशन स्टेल्थ फाइटर है, जिसमें सुपरक्रूज, 3D थ्रस्ट वेक्टरिंग, AESA रडार और इंटरनल वेपन बे हैं। राफेल 4.5 जनरेशन का है – बेहद वर्सेटाइल, कॉम्बैट-प्रूवन (लीबिया, माली, इराक में इस्तेमाल), लेकिन स्टेल्थ में कमजोर। Su-57 का RCS (रडार क्रॉस-सेक्शन) कम है, स्पीड Mach 2+, रेंज ज्यादा, लेकिन प्रोडक्शन अभी सीमित (~25 यूनिट्स) और रियल-वर्ल्ड कॉम्बैट एक्सपीरियंस कम।
तुलनात्मक विश्लेषण
- जनरेशन और स्टेल्थ: Su-57 5th जनरेशन (स्टेल्थ, सुपरक्रूज), राफेल 4.5 जनरेशन (सेमी-स्टेल्थ, बेहतर EW)।
- परफॉर्मेंस: Su-57 की मैक्स स्पीड ~2,130 km/h, पेलोड ~10 टन; राफेल की ~1,912 km/h, लेकिन बेहतर सेंसर्स (SPECTRA EW सूट दुनिया के बेस्ट में से एक)।
- टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: फ्रांस – लिमिटेड ToT, कोई सोर्स कोड; रूस – फुल ToT, सोर्स कोड, जॉइंट प्रोडक्शन।
- लागत और उपलब्धता: राफेल महंगा (~200-250 मिलियन डॉलर प्रति यूनिट), लेकिन प्रूवन और लॉजिस्टिक्स तैयार; Su-57 सस्ता (~100-150 मिलियन डॉलर), लेकिन सप्लाई चेन और मेंटेनेंस इश्यूज।
- रणनीतिक निर्भरता: फ्रांस के साथ डील से भारत पश्चिमी टेक्नोलॉजी और NATO-स्टैंडर्ड इंटरऑपरेबिलिटी पाता है, लेकिन निर्भरता बनी रहती है। रूस के साथ पुराना रिश्ता, लेकिन CAATSA सैंक्शंस का रिस्क।
भारत के लिए निहितार्थ
फ्रांस का इनकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य से टकराता है। बिना सोर्स कोड के भारत 40 साल तक फ्रांस पर निर्भर रहेगा – अपग्रेड्स, इंडिजिनस हथियार इंटीग्रेशन (Astra Mk2, Rudram) में दिक्कत। कुछ एक्सपर्ट्स इसे “जेट मिलेंगे, लेकिन ब्रेन नहीं” कहते हैं। इससे Su-57 की अपील बढ़ी है, खासकर जब रूस फुल कोऑपरेशन दे रहा है। लेकिन IAF राफेल इकोसिस्टम (ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स) को मजबूत करना चाहती है।
अंत में, भारत की चुनौती मल्टी-वेक्टर स्ट्रैटेजी है – फ्रांस से 4.5G, रूस से 5G, और अमेरिका से F-35 (लेकिन CAATSA और हाई कॉस्ट)। DAC की मंजूरी के बावजूद, नेगोशिएशंस में सोर्स कोड और ToT पर दबाव बनेगा। यह डील न सिर्फ वायुसेना की ताकत, बल्कि भारत की डिफेंस इंडिपेंडेंस को भी तय करेगी।
Sources: द वायर