21 दिसंबर 2025, Fake Police: बिहार के कटिहार जिले में कानून व्यवस्था पर एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जो पुलिस की वर्दी की मर्यादा को ही चुनौती दे रहा है। फलका थाना क्षेत्र के मोरसंडा गांव में एक किराना दुकानदार को Fake Police टीम द्वारा अगवा करने की सनसनीखेज कोशिश नाकाम हो गई। ग्रामीणों की सतर्कता ने न केवल इस साजिश को विफल कर दिया, बल्कि तीन बदमाशों को भी धर दबोचा। चौंकाने वाली बात यह है कि इस फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड फलका थाने का ही संविदा वाहन चालक अमन कुमार निकला, जो घटना के दिन छुट्टी पर था। पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि एक फरार है। इस घटना ने इलाके में हड़कंप मचा दिया है और अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पुलिस विभाग में संविदा कर्मियों की भर्ती और निगरानी की प्रक्रिया में कहां चूक हो रही है?
मोरसंडा गांव, जो कटिहार जिले के फलका थाना क्षेत्र में स्थित एक शांतिपूर्ण ग्रामीण बस्ती है, वहां की शाम करीब साढ़े चार बजे की घटना ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया। किराना दुकानदार मोहम्मद राहिल अपनी दुकान पर सामान बेच रहे थे, तभी एक चारपहिया वाहन तेज रफ्तार से रुका। वाहन से उतरे चार युवक खुद को फलका थाना की पुलिस टीम बताते हुए दुकान के अंदर घुस आए। उनके हाथ में प्रतिबंधित कोडीन सिरप की बोतलें थीं, जिन्हें वे राहिल पर थोपकर उसे फंसाने की साजिश रच रहे थे। “हम फलका थाने से हैं, तुम कोडीन सिरप बेच रहे हो, चलो थाने!” चिल्लाते हुए वे राहिल को जबरन गाड़ी में ठूंसने लगे। गाली-गलौज और धमकियां गूंजने लगीं। लेकिन राहिल ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, “ये फर्जी पुलिस वाले हैं, मदद करो!”
राहिल की चीखें सुनते ही आसपास के ग्रामीण दौड़ पड़े। दुकान के बाहर खड़ी भीड़ ने वाहन को घेर लिया। ग्रामीणों का गुस्सा भड़क उठा। उन्होंने आरोपियों को घेर लिया और पूछताछ शुरू कर दी। शक की सुई सबसे पहले वाहन चालक पर गई, क्योंकि वह फलका थाने का ही संविदा ड्राइवर था। ग्रामीणों ने तीनों को पकड़ लिया—अमन कुमार, छोटू कुमार और अमित कुमार राय—और उन्हें जमकर धुनाई दी। अफरा-तफरी में चौथा आरोपी ब्रजेश कुमार मौके का फायदा उठाकर भाग निकला। ग्रामीणों ने फरार आरोपी को भी देख लिया था, लेकिन भीड़ का ध्यान तीन पकड़े गए लोगों पर था। “अगर हम न आते तो ये दुकानदार को उठा ले जाते। ये तो साफ अपहरण की साजिश थी,” एक ग्रामीण ने बताया। ग्रामीणों ने आरोपियों को दबोचे रखा और तुरंत फलका थाने को सूचना दे दी। देर शाम तक गांव में हंगामा जारी रहा, और ग्रामीणों ने पुलिस वाहन को आने ही नहीं दिया जब तक तीनों को हिरासत में न ले लिया जाए।
इस साजिश का मास्टरमाइंड अमन कुमार कोई साधारण अपराधी नहीं था। वह फलका थाने में संविदा पर वाहन चालक के रूप में तैनात था, जिसकी नियुक्ति पिछले महीने 19 नवंबर को हुई थी। घटना के दिन वह छुट्टी पर घर लौटा था, लेकिन छुट्टी का फायदा उठाकर अपने तीन साथियों को इकट्ठा किया। अमन ने थाने के वाहन जैसा दिखने वाला चारपहिया वाहन का इंतजाम किया, जो साजिश को और विश्वसनीय बनाता था। छोटू कुमार और अमित कुमार राय उसके परिचित बताए जा रहे हैं, जबकि फरार ब्रजेश कुमार का आपराधिक इतिहास जांच का विषय है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, आरोपियों का मकसद अवैध वसूली था। वे राहिल को थाने ले जाने के बहाने से कहीं जंगल या सुनसान जगह ले जाते, फिर पैसे ऐंठते या फिरौती मांगते। कोडीन सिरप का झूठा आरोप लगाकर वे दुकान पर छापेमारी का नाटक रच रहे थे, ताकि कोई शक न करे। “ये लोग संगठित गिरोह का हिस्सा लगते हैं। पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन इस बार मास्टरमाइंड का थाने से जुड़ाव चौंकाने वाला है,” एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा।
ग्रामीणों की भूमिका इस घटना में सराहनीय रही। मोरसंडा जैसे छोटे गांव में लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, और राहिल की चीखें ने पूरे समुदाय को एकजुट कर दिया। “आजकल फर्जी पुलिस वालों की खबरें सुनते हैं, लेकिन जब घर के द्वार पर आ जाएं तो चुप नहीं रह सकते,” गांव के मुखिया ने कहा। ग्रामीणों ने न केवल आरोपियों को पकड़ा, बल्कि पुलिस को भी कड़ी चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। हंगामे के दौरान कोढ़ा सर्किल इंस्पेक्टर उमेश कुमार भी मौके पर पहुंचे और ग्रामीणों को शांत करने में जुट गए। उन्होंने बताया, “अमन कुमार की अनुबंध पर नियुक्ति हाल ही में हुई थी। वह छुट्टी लेकर इस वारदात को अंजाम दिया। हम कड़ी कार्रवाई कर रहे हैं।” फलका थानाध्यक्ष रवि कुमार राय ने पीड़ित राहिल के आवेदन पर तुरंत कांड दर्ज कर लिया। कांड संख्या 180/2025 के तहत आईपीसी की धारा 364 (अपहरण), 384 (वसूली), 420 (धोखाधड़ी) और अन्य संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ है। तीनों आरोपी जिरह के बाद जेल भेज दिए गए हैं, और फरार ब्रजेश की तलाश में टीमें लगी हुई हैं। थानाध्यक्ष ने कहा, “यह विभागीय व्यक्ति का व्यक्तिगत कृत्य है, लेकिन जांच में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी। संविदा कर्मियों की पृष्ठभूमि जांच को और सख्त करने की सिफारिश करेंगे।”
पीड़ित राहिल ने घटना के बाद अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा, “वे बेहद आक्रामक थे। बिना कागजात दिखाए गालियां देते हुए मुझे गाड़ी में खींचने लगे। अगर ग्रामीण न पहुंचते तो जान पर बन जाती। अब पुलिस से न्याय की उम्मीद है।” यह घटना न केवल राहिल के लिए ट्रॉमा है, बल्कि पूरे इलाके के लिए एक सबक। कटिहार जैसे जिलों में अपराध की प्रवृत्ति बदल रही है। फर्जी पुलिस बनकर वसूली या अपहरण की कोशिशें बढ़ रही हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां जागरूकता कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि संविदा आधार पर भर्ती होने वाले कर्मियों की सत्यापन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी इस तरह की घटनाओं को जन्म दे रही है। बिहार पुलिस मुख्यालय ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है और विभागीय जांच के आदेश दिए हैं।
इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सतर्कता ही सबसे बड़ा हथियार है। ग्रामीणों की एकजुटता ने न केवल एक अपराध को रोका, बल्कि पुलिस व्यवस्था पर सवाल भी खड़े कर दिए। उम्मीद है कि यह मामला जल्द सुलझेगा और दोषियों को कड़ी सजा मिलेगी, ताकि वर्दी की मर्यादा बरकरार रहे। कटिहार पुलिस ने आश्वासन दिया है कि इलाके में गश्त बढ़ाई जाएगी और फर्जी पुलिस के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाएगा। लेकिन सवाल वही है—कानून का चेहरा कितना भरोसेमंद बचेगा?