11 दिसंबर 2025: बिहार के पूर्णिया सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस प्रवेश के लिए फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्रों का एक बड़ा रैकेट उजागर होने से सनसनी फैल गई है। पिछले तीन वर्षों में 18 छात्रों के प्रमाण पत्रों पर संदेह जताया गया है, जो मुख्य रूप से श्रवण विकलांगता (बहरापन) का दावा करते हैं। यह घोटाला न केवल मेडिकल शिक्षा की अखंडता पर प्रहार है, बल्कि आरक्षित कोटे की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है। कॉलेज प्रशासन ने विशेष जांच टीम गठित कर ली है, जबकि पुलिस ने दो छात्रों को हिरासत में ले लिया है।

घटना की शुरुआत 2025-29 सत्र के एमबीबीएस काउंसलिंग के दौरान हुई। सीतामढ़ी जिले के निवासी कार्तिकेय यादव (पिता: सुनील कुमार यादव, नीट यूजी रोल नंबर: 4416105152) ने गोवा मेडिकल कॉलेज से जारी कथित फर्जी श्रवण विकलांगता प्रमाण पत्र जमा किया। कॉलेज प्राचार्य डॉ. हरिशंकर मिश्रा को छात्र की शारीरिक बनावट और प्रमाण पत्र पर शक हुआ। काउंसलिंग के बाद हॉस्टल आवंटन प्रक्रिया में भी संदेह गहराया, जब कार्तिक अपने साथ एक अन्य छात्र को लेकर दबाव बनाने लगा। पूछताछ में कार्तिक ने लिखित रूप से कबूल किया कि उसने नोएडा स्थित एक गिरोह से 30-35 लाख रुपये देकर यह फर्जी प्रमाण पत्र बनवाया था। गिरोह का मास्टरमाइंड गोवा मेडिकल कॉलेज के नाम पर नकली दस्तावेज तैयार करता है, और इसका नेटवर्क बिहार से लेकर पूरे भारत तक फैला हुआ है।

कार्तिक के साथी के रूप में आनंद कुमार मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (गया) के द्वितीय वर्ष के छात्र कुणाल कुमार (पिता: राकेश कुमार) को भी हिरासत में लिया गया। कुणाल प्रवेश और हॉस्टल के लिए दबाव डाल रहा था। प्राचार्य ने दोनों को तत्काल पुलिस के हवाले कर दिया। सदर एसडीपीओ ज्योति शंकर के नेतृत्व में पूछताछ चली, जिसमें कार्तिक ने गिरोह के संपर्कों का खुलासा किया। पुलिस ने प्रवेश शाखा प्रमुख अवदेश कुमार झा की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की है। अब प्योर टोन ऑडियोमेट्री टेस्ट के लिए आईजीआईएमएस पटना या अन्य संस्थान से अनुमति ली जा रही है, क्योंकि पूर्णिया में सुविधा नहीं है।

कॉलेज ने 29 नवंबर 2025 को गोवा मेडिकल कॉलेज को प्रमाण पत्र सत्यापन के लिए पत्र (संख्या 1517) भेजा था, लेकिन 9 दिसंबर को ईमेल के बावजूद कोई जवाब नहीं आया। इसी तरह, कोलकाता, बीएचयू और चंडीगढ़ जैसे संस्थानों से जारी अन्य प्रमाण पत्रों की भी जांच शुरू हो गई है। पिछले तीन वर्षों में कॉलेज में 5% दिव्यांग कोटे से लगभग 80 छात्र बिहार के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश ले चुके हैं, जिनमें से कई के दस्तावेज संदिग्ध हैं। यह रैकेट कोटा का दुरुपयोग कर मेरिट-आधारित प्रवेश को प्रभावित कर रहा है।

यह मामला अकेला नहीं है। अक्टूबर 2025 में पटना में छह अभ्यर्थियों को फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र जमा करने पर गिरफ्तार किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी धांधली शिक्षा माफिया की साजिश है, जो गरीब और वास्तविक दिव्यांगों के अधिकारों का हनन करती है। बिहार मेडिकल शिक्षा विभाग को अब सख्त सत्यापन प्रक्रिया अपनानी होगी, जिसमें डिजिटल वेरिफिकेशन और त्वरित मेडिकल जांच शामिल हो। यदि दोषी पाए गए, तो न केवल प्रवेश रद्द होगा, बल्कि आपराधिक मुकदमे भी दर्ज होंगे।

यह घटना बिहार की मेडिकल शिक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या आरक्षण प्रणाली की रक्षा के लिए पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकती है? सरकार को तत्काल केंद्रीकृत सत्यापन पोर्टल स्थापित करने की जरूरत है, ताकि भविष्य में ऐसे घोटाले न हों। अन्यथा, चिकित्सा क्षेत्र की विश्वसनीयता दांव पर लग जाएगी।

By SHAHID

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