Aravali खनन के खिलाफ पर्यावरणीय विरोध तेज: सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राजस्थान में भड़काई आग, पारिस्थितिकी संकट गहराया
24 दिसंबर 2025, Aravali – विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली हिल्स आज पर्यावरणीय संकट के केंद्र में है। राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में फैली इस हरी-भरी श्रृंखला पर अवैध खनन की धमक ने स्थानीय निवासियों, पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतार दिया है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने, जिसमें अरावली की परिभाषा को 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर निर्धारित किया गया है, विरोध की लहर तेज कर दी है। कार्यकर्ता इसे खनन माफिया को खुला रास्ता देने वाला कदम बता रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। प्रदर्शनों में हजारों लोग शामिल हो चुके हैं, जो न केवल खनन रोकने की मांग कर रहे हैं, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर अरावली की सीमाओं को परिभाषित करने की भी अपील कर रहे हैं।
Aravali पर्वत श्रृंखला, जो लगभग 700 किलोमीटर लंबी है, भारतीय उपमहाद्वीप की ‘फेफड़े’ के रूप में जानी जाती है। यह दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई है और राजस्थान के अनेक जिलों जैसे अलवर, जयपुर, सीकर और उदयपुर को प्रभावित करती है। यहां की जैव विविधता अद्भुत है – तेंदुए, हिरण, मोर जैसे वन्यजीवों का घर, साथ ही वर्षा जल संरक्षण और रेगिस्तानी पारिस्थितिकी का संतुलन बनाए रखने वाली। लेकिन पिछले दशकों से चूना पत्थर, संगमरमर और अन्य खनिजों के लालच में अवैध खनन ने इसे चीर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में Aravali में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था, लेकिन स्थानीय प्रशासनिक ढिलाई और राजनीतिक दबाव के कारण उल्लंघन जारी रहा। हाल के वर्षों में, खनन से भूमि क्षरण, जल स्रोतों का सूखना और वन्यजीवों का विस्थापन बढ़ा है, जिससे दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण भी 30% तक बढ़ गया है।
सुप्रीम कोर्ट का 20 दिसंबर 2025 का फैसला इस विवाद का नया अध्याय खोल चुका है। अदालत ने Aravali Hills और रेंजेस की एकसमान परिभाषा तय की, जिसमें 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों को ही Aravali माना जाएगा। इससे पहले, विभिन्न राज्यों में अलग-अलग मानदंड थे, जो खनन को बढ़ावा देते थे। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह नियम खनन कंपनियों को फायदा पहुंचाएगा, क्योंकि कई संवेदनशील क्षेत्र अब ‘गैर-अरावली’ घोषित हो जाएंगे। राजस्थान के अलवर जिले में 21 दिसंबर को हजारों किसानों और पर्यावरण प्रेमियों ने सड़कों पर उतरकर ‘अरावली बचाओ’ के नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों ने मशाल जुलूस निकाला और जिला कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया। इसी तरह, जयपुर और उदयपुर में भी धरना-प्रदर्शन हुए, जहां महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। एक प्रमुख कार्यकर्ता, हिमांतर झा ने कहा, “यह फैसला पारिस्थिक संतुलन को खत्म करने का प्रयास है। हम वैज्ञानिक मानदंडों – जैसे भूगोल, पारिस्थितिकी और वन्यजीव कनेक्टिविटी – पर आधारित परिभाषा की मांग करते हैं।”
विरोध की लहर सोशल मीडिया पर भी तेज हो गई है। #SaveAravali और #StopMiningInAravali हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां हजारों पोस्ट्स में खनन से प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीरें साझा की जा रही हैं। पर्यावरण संगठन जैसे ग्रीनपीस इंडिया और अरावली बचाओ आंदोलन ने संयुक्त बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार की मांग की है। इन संगठनों के अनुसार, अरावली में खनन से न केवल जैव विविधता नष्ट हो रही है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ प्राकृतिक बाधा भी कमजोर पड़ रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में 20% से अधिक अरावली क्षेत्र खनन के कारण बंजर हो चुका है, जिससे राजस्थान में सूखा प्रभावित जिलों की संख्या बढ़ गई है। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो 26 दिसंबर को राज्यव्यापी हड़ताल होगी।
केंद्र सरकार ने इन आरोपों को ‘भ्रामक’ बताते हुए खारिज कर दिया है। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 21 दिसंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “Aravali की नई परिभाषा खनन को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि स्पष्टता लाने के लिए है। कोई छूट नहीं दी गई है।” उन्होंने जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला राज्यों को खनन पट्टों पर सख्ती बरतने का निर्देश देता है। राजस्थान सरकार ने भी बयान जारी कर कहा कि अवैध खनन पर कार्रवाई तेज की जाएगी, और 50 से अधिक पट्टे रद्द किए जा चुके हैं। फिर भी, विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे ‘पर्यावरण हत्या’ करार दिया है। राजस्थान कांग्रेस प्रमुख गोविंद सिंह डोटासरा ने विधानसभा में प्रस्ताव लाने की घोषणा की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल खनन तक सीमित नहीं; इससे भूमि उपयोग, वन संरक्षण और जल नीतियां प्रभावित होंगी।
पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर हैं। Aravali दिल्ली को धूल भरी आंधियों से बचाती है, लेकिन खनन से वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 400 से ऊपर पहुंच गया है। जल स्रोतों का क्षरण होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है – किसान फसलें खो रहे हैं, और पशुपालन प्रभावित हो रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि अरावली वन्यजीवों के लिए कॉरिडोर है, जो टूटने से प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, यह मुद्दा जलवायु सम्मेलनों में उठाया जा रहा है, जहां भारत की हरित प्रतिबद्धताओं पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कार्यकर्ता अब संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।
यह आंदोलन भारत के पर्यावरण आंदोलनों की एक कड़ी है – चिपको से नर्मदा बचाओ तक। राजस्थान सरकार को अब संतुलन बनाना होगा: आर्थिक विकास और पारिस्थिक संरक्षण के बीच। यदि विरोध अनियंत्रित हुआ, तो राजनीतिक संकट भी गहरा सकता है। फिलहाल, जयपुर की सड़कें नारों से गूंज रही हैं, और अरावली की वादियां संकट की पुकार बुला रही हैं। उम्मीद है कि सरकार जल्द ही कार्यकर्ताओं की सुन लेगी, वरना यह हरी श्रृंखला इतिहास के पन्नों में सिमट सकती है।
Sources: बीबीसी