2 जनवरी 2026, Iran– Iran की सड़कों पर गूंजते नारे अब हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं। आर्थिक संकट के खिलाफ शुरू हुए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पांचवें दिन पहुंचते हुए खूनी मोड़ ले चुके हैं, जहां कम से कम सात लोगों की मौत हो चुकी है। देश की मुद्रा रियाल का ऐतिहासिक अवमूल्यन, 40 प्रतिशत से अधिक की महंगाई और पश्चिमी प्रतिबंधों ने आम नागरिकों को हताश कर दिया है। यह संकट न केवल अर्थव्यवस्था को झकझोर रहा है, बल्कि इस्लामी गणराज्य की स्थिरता पर भी सवाल खड़े कर रहा है। इस रिपोर्ट में हम इस संकट की जड़ों, प्रदर्शनों के प्रसार, मौतों के विवरण और वैश्विक प्रभावों का विश्लेषण करेंगे।
आर्थिक संकट की जड़ें
Iran का आर्थिक संकट कोई नई बात नहीं है, लेकिन 2025 में यह चरम पर पहुंच गया। अमेरिकी और यूरोपीय संघ के प्रतिबंध, जो Iran के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े हैं, ने तेल निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है। जून 2025 में इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमलों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। परिणामस्वरूप, रियाल डॉलर के मुकाबले 144,000 तोमैन तक गिर गया, जो ऐतिहासिक निम्न स्तर है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 में महंगाई दर 42.5 प्रतिशत रही, जिससे दूध, ब्रेड और ईंधन जैसी बुनियादी वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं। आम परिवारों के लिए जीवनयापन असंभव हो गया है; एक मध्यम वर्गीय परिवार का मासिक खर्च दोगुना हो चुका है, जबकि वेतन स्थिर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट 2022 के महसा अमिनी विरोध प्रदर्शनों से भी बड़ा साबित हो सकता है, क्योंकि तब राजनीतिक मुद्दे प्रमुख थे, लेकिन अब आर्थिक हताशा ने सभी वर्गों को एकजुट कर दिया है।
मुद्रा अवमूल्यन और महंगाई का प्रभाव
रियाल की गिरावट ने आयातित वस्तुओं को महंगा कर दिया है, जिससे खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, 2025 में Iran की जीडीपी 5.2 प्रतिशत सिकुड़ गई, जो दशक की सबसे खराब गिरावट है। बेरोजगारी दर 15 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है, खासकर युवाओं में, जो प्रदर्शनों की मुख्य ताकत हैं।
विरोध प्रदर्शनों का प्रसार
विरोध प्रदर्शन 28 दिसंबर 2025 को तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू हुए, जहां दुकानदारों ने मुद्रा संकट के खिलाफ हड़ताल की। शुरुआत में यह शांतिपूर्ण था – व्यापारी और दुकान मालिक सरकार की नीतियों के खिलाफ नारे लगा रहे थे। लेकिन मंगलवार को कम से कम 10 विश्वविद्यालयों के छात्रों के शामिल होने के बाद यह राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। प्रदर्शनकारी “निराशा! निराशा!” जैसे नारों के साथ प्रशासनिक भवनों, मस्जिदों और बैंकों पर पत्थर फेंक रहे हैं। फारस प्रांत के मर्वदास्ट, खूजिस्तान, हमदान और करमानशाह जैसे क्षेत्रों में हड़तालें फैल गईं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं, जहां आगजनी और पुलिस के साथ टकराव दिखाई दे रहे हैं। X (पूर्व ट्विटर) पर हाल की पोस्ट्स से पता चलता है कि प्रदर्शनकारी आर्थिक न्याय की मांग कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने इसे हिंसक बना दिया। एक पोस्ट में लिखा गया, “ईरान के सड़कों पर आग लगी हुई है – सात मौतें, और गिनती जारी।”
क्षेत्रीय विस्तार
प्रदर्शन अब 15 प्रांतों तक फैल चुके हैं, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में किसान भी शामिल हो रहे हैं। खाद्य कीमतों में 60 प्रतिशत की वृद्धि ने उन्हें मजबूर किया है।
मौतों और हिंसा का विवरण
सबसे दर्दनाक पहलू मौतें हैं। गुरुवार तक कम से कम सात लोगों की जान जा चुकी है, जो चार प्रमुख शहरों में हुईं। चारमहाल और बख्तियारी प्रांत के लोरडोगान में तीन मौतें हुईं, जहां सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच गोलीबारी हुई। लोरिस्तान प्रांत के अज्ना में तीन और लोग मारे गए, साथ ही 17 घायल हुए। कुहदास्ट में एक बसिज (क्रांतिकारी गार्ड का सदस्य) की मौत हुई, जिसे अधिकारियों ने प्रदर्शनकारी हमले का शिकार बताया, जबकि मानवाधिकार संगठन हेंगाव ने इसे बलों द्वारा गोली मारकर हत्या करार दिया। ईस्फहान प्रांत में एक और मौत की पुष्टि हुई। फारस न्यूज एजेंसी के अनुसार, लोरिस्तान में एक पुलिस स्टेशन पर हमले में 17 पुलिसकर्मी घायल हुए, जहां प्रदर्शनकारियों ने पुलिस वाहनों में आग लगा दी। ये मौतें मुख्य रूप से लुर जातीय समूह वाले क्षेत्रों में हुईं, जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि इंटरनेट ब्लैकआउट और सेंसरशिप ने रिपोर्टिंग को मुश्किल बना दिया है।
घायलों की स्थिति
एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) के अनुसार, सैकड़ों घायल हैं, जिनमें रबर बुलेट्स से चोटें प्रमुख हैं। अस्पतालों में दवाओं की कमी ने स्थिति को बदतर बना दिया है।
सरकारी प्रतिक्रिया: संवाद या दमन?
सरकार की प्रतिक्रिया दोहरी रही है – एक ओर संवाद की पेशकश, दूसरी ओर दमन। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने प्रदर्शनकारियों की “जायज मांगों” को स्वीकार किया और कहा, “इस्लामी नजरिए से… अगर हम लोगों की आजीविका का मुद्दा हल नहीं करेंगे, तो हम नर्क में पहुंच जाएंगे।” सरकार प्रवक्ता फातिमा मोहाजेरानी ने व्यापार संघों और व्यापारियों के साथ प्रत्यक्ष संवाद की घोषणा की। लेकिन जमीनी स्तर पर क्रांतिकारी गार्ड्स ने “सख्त कार्रवाई” का वादा किया, जिसमें 30 से अधिक गिरफ्तारियां शामिल हैं। बुधवार को ठंड के बहाने राष्ट्रीय अवकाश घोषित कर देश को बंद कर दिया गया, जो प्रदर्शनों को दबाने की रणनीति मानी जा रही है। अधिकारियों ने “दुश्मनों” (अमेरिका और इजरायल का इशारा) को दोषी ठहराया, लेकिन पेजेश्कियन ने कहा, “अगर लोग असंतुष्ट हैं, तो हम जिम्मेदार हैं… अमेरिका या किसी और को दोष न दें।”
सुधारों की संभावना
सरकार ने सब्सिडी बढ़ाने का वादा किया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिना प्रतिबंध हटाए यह अपर्याप्त है।
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और प्रतिक्रियाएं
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संकट वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर चेतावनी दी, “अगर शासन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को मारता है, तो अमेरिका हस्तक्षेप करने को तैयार है।” यह बयान 2022 के प्रदर्शनों के बाद ट्रंप की नीति की याद दिलाता है। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने हिंसा रोकने की अपील की है, जबकि इजरायल ने चुप्पी साध रखी है। क्षेत्रीय शक्तियां जैसे सऊदी अरब और तुर्की इसे अवसर के रूप में देख रही हैं। X पर ट्रंप के बयान पर बहस छिड़ गई है, जहां कुछ यूजर्स इसे “अमेरिकी हस्तक्षेप” बता रहे हैं।
वैश्विक तेल बाजार पर असर
प्रदर्शनों से तेल उत्पादन प्रभावित हो रहा है, जिससे वैश्विक कीमतें 2 प्रतिशत बढ़ी हैं।
निष्कर्ष: Iran का भविष्य दांव पर
यह संकट ईरान के भविष्य को परिभाषित कर सकता है। यदि सरकार संवाद को प्राथमिकता देती है, तो सुधार संभव हैं – जैसे सब्सिडी बढ़ाना या प्रतिबंधों पर बातचीत। लेकिन यदि दमन जारी रहा, तो यह 1979 की इस्लामी क्रांति जैसा विद्रोह भड़का सकता है। आर्थिक न्याय की यह लड़ाई न केवल ईरान, बल्कि मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। दुनिया ईरान की अगली चाल का इंतजार कर रही है।
Sources: रॉयटर्स, फारस न्यूज एजेंसी, अमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International)