16 दिसंबर 2025, Delhi Air Pollution – दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण की स्थिति ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गई है, जहां वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) कई जगहों पर 498 तक दर्ज किया गया। इस संकट के बीच दिल्ली सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए सभी सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों को निर्देश दिया है कि कक्षा 5 तक के छात्रों की पढ़ाई पूरी तरह ऑनलाइन मोड में शिफ्ट हो जाए। कक्षा 6 से 12 तक के लिए हाइब्रिड मोड (ऑनलाइन और फिजिकल कक्षाओं का मिश्रण) लागू किया गया है। यह निर्णय 15 दिसंबर 2025 से प्रभावी है और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (CAQM) के GRAP-4 (ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान) के तहत लिया गया है। यह कदम न केवल बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करने का प्रयास है, बल्कि शिक्षा प्रणाली की लचीलापन को भी परख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला लंबे समय तक चल सकता है, जब तक प्रदूषण स्तर में सुधार न हो।
दिल्ली में सर्दियों का मौसम हमेशा प्रदूषण का शिकार रहा है, लेकिन 2025 में यह समस्या चरम पर पहुंच गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, 15 दिसंबर को आनंद विहार में AQI 498, रिथला में 480 और इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर 460 दर्ज किया गया। PM2.5 और PM10 कणों की सांद्रता सामान्य से 20 गुना अधिक है, जो सांस संबंधी बीमारियों, अस्थमा और यहां तक कि कैंसर का खतरा बढ़ा रही है। बच्चों, खासकर प्राइमरी स्तर के, पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ता है, क्योंकि उनकी श्वसन प्रणाली विकसित नहीं होती। शिक्षा विभाग के निदेशक ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय CAQM के दिशा-निर्देशों के अनुपालन में लिया गया है, और स्कूलों को तुरंत अनुपालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है।
Delhi Air Pollution की पृष्ठभूमि: क्यों है दिल्ली दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर?
दिल्ली का प्रदूषण एक बहुआयामी समस्या है। सर्दियों में उलटी हवाओं, पराली जलाने, वाहनों के धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन और निर्माण कार्यों के कारण AQI ‘गंभीर’ स्तर को पार कर जाता है। 2025 में, पंजाब और हरियाणा से आने वाला पराली का धुआं मुख्य दोषी रहा, जिसने दिल्ली की हवा को जहर बना दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार है, जहां प्रति वर्ष 40,000 से अधिक मौतें प्रदूषण से जुड़ी हैं। बच्चों पर इसका प्रभाव चिंताजनक है – लैंसेट स्टडी के मुताबिक, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में प्रदूषण से 20% सांस की बीमारियां बढ़ रही हैं।
इस साल GRAP-4 चरण 14 दिसंबर को सक्रिय हो गया, जिसमें निर्माण कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध, 50% सरकारी कर्मचारियों का वर्क फ्रॉम होम और स्कूलों के लिए विशेष निर्देश शामिल हैं। शिक्षा विभाग ने 14 दिसंबर को ही सर्कुलर जारी किया, जिसमें कहा गया कि कक्षा 5 तक के बच्चों को फिजिकल क्लासेस में न भेजा जाए। इससे पहले, 2024 में भी इसी तरह का फैसला लिया गया था, लेकिन 2025 में यह और सख्त है। निजी स्कूलों के संगठन CBSE ने भी अनुपालन की पुष्टि की, और कई स्कूलों ने तुरंत ऑनलाइन क्लासेस शुरू कर दीं।
शिक्षा पर प्रभाव: ऑनलाइन शिफ्ट के फायदे और चुनौतियां
यह फैसला प्राइमरी छात्रों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देता है, लेकिन शिक्षा की निरंतरता पर सवाल खड़े करता है। कक्षा 5 तक के बच्चे, जो 10-11 वर्ष के होते हैं, ऑनलाइन लर्निंग में कम अनुकूलित होते हैं। एक सर्वे के अनुसार, 2020 की कोविड महामारी के दौरान 70% प्राइमरी छात्रों ने स्क्रीन टाइम से आंखों की समस्या और एकाग्रता की कमी का सामना किया। लेकिन प्रदूषण के जोखिम को देखते हुए, ऑनलाइन मोड एक आवश्यक बुराई है।
सरकार ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं: क्लासेस सुबह 8 से दोपहर 12 बजे तक होंगी, और स्कूलों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जैसे गूगल क्लासरूम या जूम का उपयोग करने को कहा गया है। हाइब्रिड मोड में सीनियर छात्रों को वैकल्पिक दिनों पर फिजिकल क्लासेस मिलेंगी, लेकिन मास्क और सैनिटाइजेशन अनिवार्य है। अभिभावकों की प्रतिक्रियाएं मिश्रित हैं – कुछ ने स्वास्थ्य के लिए सराहना की, जबकि ग्रामीण इलाकों के माता-पिता ने इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी का रोना रोया। दिल्ली में 80% स्कूलों में ब्रॉडबैंड उपलब्ध है, लेकिन स्लम क्षेत्रों में यह समस्या बनी हुई है।
शिक्षाविदों का कहना है कि यह संकट शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने का अवसर है। एनईपी 2020 के तहत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा मिलेगा, और AI-बेस्ड लर्निंग टूल्स का उपयोग बढ़ेगा। लेकिन लंबे समय तक ऑनलाइन रहने से ड्रॉपआउट रेट बढ़ने का खतरा है, खासकर लड़कियों में।
सरकार और विशेषज्ञों की राय: स्वास्थ्य बनाम शिक्षा का संतुलन
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, “बच्चों का स्वास्थ्य सर्वोपरि है। प्रदूषण से लड़ाई में शिक्षा को पीछे नहीं हटना पड़ेगा।” शिक्षा मंत्री अतishi ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 15 दिसंबर से 2,500 से अधिक सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेस शुरू हो गईं, और अभिभावकों को हेल्पलाइन नंबर प्रदान किया गया है। CAQM ने भी चेतावनी दी कि AQI 500 के पार जाने पर और सख्त कदम उठाए जाएंगे।
विशेषज्ञ डॉ. अनुराग अग्रवाल (फोर्टिस हॉस्पिटल) ने कहा, “प्रदूषण से बच्चों के फेफड़ों का 25% क्षतिग्रस्त हो सकता है। ऑनलाइन शिफ्ट सही है, लेकिन पोषण और व्यायाम पर फोकस जरूरी।” पर्यावरणविद् वंदना शिवा ने सरकार से अपील की कि पराली जलाने पर स्थायी समाधान निकाला जाए। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण से भारत को प्रतिवर्ष 1.5% जीडीपी का नुकसान होता है, जिसमें शिक्षा क्षेत्र भी प्रभावित है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, बीजिंग और लाहौर जैसे शहरों में भी प्रदूषण के कारण स्कूल बंद होते रहे हैं। भारत में, NCERT ने डिजास्टर मैनेजमेंट मॉड्यूल को पाठ्यक्रम में शामिल करने का सुझाव दिया है, ताकि बच्चे पर्यावरण जागरूकता से वाकिफ हों।
भविष्य की राह: प्रदूषण नियंत्रण और शिक्षा सुधार
यह फैसला अस्थायी लगता है, लेकिन AQI में सुधार के बिना यह लंबा खिंच सकता है। सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, ग्रीन कॉरिडोर विकसित करने और औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण के उपाय घोषित किए हैं। शिक्षा विभाग ने ‘क्लीन एयर फॉर स्कूल्स’ कैंपेन शुरू किया, जिसमें ऑनलाइन क्लासेस के साथ स्वास्थ्य वर्कशॉप शामिल हैं।
अभिभावकों के लिए सलाह: घर पर इंडोर गेम्स, योग और न्यूट्रिशन पर ध्यान दें। स्कूलों को डिजिटल डिवाइड को पाटने के लिए कम्युनिटी सेंटर्स में लैपटॉप उपलब्ध कराने चाहिए। लंबे समय में, NEP के तहत हाइब्रिड लर्निंग को स्थायी बनाना होगा।
निष्कर्ष: साफ हवा के लिए सामूहिक प्रयास
दिल्ली में प्रदूषण का यह दौर शिक्षा को चुनौती दे रहा है, लेकिन ऑनलाइन शिफ्ट बच्चों की रक्षा का साहसिक कदम है। कक्षा 5 तक की पढ़ाई को ऑनलाइन करना स्वास्थ्य और शिक्षा के बीच संतुलन का उदाहरण है। लेकिन असली समाधान प्रदूषण पर काबू पाना है – किसानों को पराली जलाने के विकल्प, वाहनों को इलेक्ट्रिक बनाना और जनजागरूकता। यदि हम सामूहिक रूप से प्रयास करें, तो अगली सर्दी में बच्चे साफ हवा में खेल सकेंगे। यह संकट हमें याद दिलाता है कि विकास पर्यावरण के बिना अधूरा है।