16 दिसंबर 2025, Araria: Poorest District of Bihar: बिहार की मिट्टी में संघर्ष की अनगिनत कहानियां दबी हुई हैं, लेकिन सीमांचल के अररिया जिले की गरीबी की दास्तान सबसे ज्यादा कड़वी है। नीति आयोग की ‘नेशनल मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स’ (MPI) प्रोग्रेस रिव्यू 2023 रिपोर्ट के अनुसार, अररिया में बहुआयामी गरीबी की दर 52.07 प्रतिशत है, जो बिहार के सभी जिलों में सबसे ऊंची है। इसके बाद पूर्णिया (50.70%) और सुपौल (50.54%) जैसे जिले आते हैं। यह आंकड़ा एनएफएचएस-5 (2019-21) सर्वे पर आधारित है, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के 12 संकेतकों पर मापा जाता है। सीमांचल-कोसी क्षेत्र के ये जिले बाढ़, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भारत की बहुआयामी गरीबी दर 16.4 प्रतिशत हो चुकी है, लेकिन अररिया जैसे जिलों में यह अभी भी एक अभिशाप बनी हुई है। इस रिपोर्ट में हम अररिया की गरीबी की जड़ों, प्रभावों और विकास योजनाओं पर गहन विश्लेषण करेंगे, ताकि पाठक समझ सकें कि कैसे ये आंकड़े लाखों जिंदगियों को प्रभावित कर रहे हैं।
नवीनतम आंकड़े: एक भयावह चित्रण
नीति आयोग की 2023 रिपोर्ट के मुताबिक, अररिया बिहार का सबसे गरीब जिला है, जहां 52.07 प्रतिशत आबादी बहुआयामी गरीबी में जी रही है। बिहार की कुल गरीबी दर 33.76 प्रतिशत है, जो 2015-16 के 51.89 प्रतिशत से घटी है, लेकिन अररिया में कमी की रफ्तार धीमी रही। रिपोर्ट में 707 जिलों का डेटा है, जिसमें अररिया टॉप पर है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी दर 55 प्रतिशत से अधिक है, जबकि शहरी में 40 प्रतिशत के करीब।
कुपोषण का स्तर सबसे चिंताजनक है – जिले में 43 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग (कम कद) से पीड़ित हैं, और 23 प्रतिशत वेस्टिंग (कम वजन) का शिकार। शिक्षा के मामले में साक्षरता दर मात्र 55 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 77 प्रतिशत से 22 प्रतिशत पीछे है। बुनियादी सुविधाओं की कमी भी गंभीर – 60 प्रतिशत परिवारों को स्वच्छ पेयजल नहीं मिलता, और 70 प्रतिशत के पास शौचालय नहीं है। 2025 के ग्लोबल MPI रिपोर्ट में भी भारत की प्रगति का जिक्र है, जहां 41.4 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले, लेकिन क्षेत्रीय असमानताएं बरकरार हैं।
पूर्णिया (50.70%) और सुपौल जैसे पड़ोसी जिले भी इसी श्रेणी में हैं। सीमांचल-कोसी क्षेत्र के सात जिलों में औसत गरीबी दर 45 प्रतिशत से ऊपर है, जो बिहार के अन्य भागों से दोगुनी है। विश्व बैंक की 2025 स्प्रिंग रिपोर्ट में अररिया को बिहार के सबसे गरीब जिलों में शुमार किया गया है, जहां प्रति व्यक्ति आय मात्र 33,000 रुपये सालाना है – पटना के 2.15 लाख से छह गुना कम।
गरीबी की जड़ें: भौगोलिक और सामाजिक कारक
अररिया की गरीबी की मुख्य वजहें भौगोलिक हैं। कोसी और महानंदा नदियों की बाढ़ हर साल फसलें तबाह कर देती है। 2025 की बाढ़ में 1.5 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित हुई, जिससे किसानों की आय 40 प्रतिशत गिरी। जिले की 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन सिंचाई सुविधा केवल 20 प्रतिशत क्षेत्र में है। जलवायु परिवर्तन ने इसे और जटिल बना दिया – UNDP की 2025 ग्लोबल MPI रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीब क्षेत्रों में जलवायु जोखिम 50 प्रतिशत अधिक है।
सामाजिक संरचना भी बाधा है। अररिया में मुस्लिम आबादी 41 प्रतिशत और SC/ST 20 प्रतिशत है। ये समुदाय शिक्षा और रोजगार से वंचित हैं। महिलाओं की साक्षरता दर 48 प्रतिशत है, जो लिंग असमानता को उजागर करती है। प्रवासन एक बड़ी समस्या – सालाना 2 लाख युवा दिल्ली-मुंबई पलायन करते हैं, जिससे परिवार विखंडित होते हैं। औद्योगिक विकास की कमी से रोजगार सीमित हैं; बिहार का जीडीपी वृद्धि दर 2025-26 में 22 प्रतिशत है, लेकिन अररिया में मात्र 8 प्रतिशत।
भ्रष्टाचार और योजनाओं का असमान वितरण भी जिम्मेदार। मनरेगा में 30 प्रतिशत फंड लीकेज की शिकायतें आम हैं। CRY की 2025 MPI फैक्टशीट में अररिया को SC/ST समुदायों के लिए उच्च गरीबी वाले जिलों में गिना गया है।
प्रभाव: मानवीय और आर्थिक संकट
यह गरीबी केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी है। कुपोषण से 2025 में 500 से अधिक बच्चों की मौत हुई, जो राष्ट्रीय औसत से दोगुनी है। मातृ मृत्यु दर 200 प्रति लाख है, जबकि बिहार औसत 150। शिक्षा की कमी से अपराध बढ़ा – अपराध दर 15 प्रतिशत ऊपर। महिलाओं पर असर सबसे गहरा: 70 प्रतिशत घरेलू हिंसा का शिकार, बाल विवाह 40 प्रतिशत।
पर्यावरणीय प्रभाव भी भयानक – बाढ़ से 50,000 परिवार बेघर। आर्थिक रूप से, गरीबी चक्र पीढ़ियों को लील रहा है। OPHI की रिपोर्ट में कहा गया कि अररिया जैसे जिलों में MPI इंटेंसिटी 44 प्रतिशत है, अर्थात गरीबों में औसत वंचना गंभीर।
विकास योजनाएं: प्रयास और चुनौतियां
बिहार सरकार ने गरीबी उन्मूलन पर जोर दिया है। ‘सात निश्चय योजना’ से अररिया में 5,000 किमी सड़कें बनीं, और ‘जल जीवन हरियाली’ से 1 लाख पेड़ लगे। केंद्र की PMAY से 20,000 घर, उज्ज्वला से 1.5 लाख गैस कनेक्शन। बिहार ने 3.77 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला।
फिर भी चुनौतियां हैं। योजनाओं का क्रियान्वयन कमजोर – 40 प्रतिशत लाभार्थी वंचित। एनजीओ जैसे प्रथम और CRY शिक्षा-स्वास्थ्य कैंप चला रहे। 2025 में नई MPI रिपोर्ट से प्रेरणा लेते हुए, बाढ़ नियंत्रण और कौशल विकास पर फोकस जरूरी।
निष्कर्ष: बदलाव की राह
अररिया की 52.07 प्रतिशत गरीबी दर सीमांचल-कोसी की असमानता का प्रतीक है। पूर्णिया और सुपौल जैसे जिले भी प्रभावित, लेकिन विकास योजनाओं से उम्मीद। नीति आयोग की रिपोर्ट दिखाती है कि भारत SDG 1.2 को 2030 से पहले हासिल कर सकता है। अररिया के युवाओं को अवसर दें, तो यह जिला बिहार का गौरव बनेगा। समय है एकजुट होकर इस गरीबी के अंधेरे को मिटाने का।