17 दिसंबर 2025: बिहार की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता आदिल हसन ने भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन की नियुक्ति पर तीखा प्रहार किया है। कटिहार में आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए हसन ने कहा कि भाजपा में कार्यकारी अध्यक्ष का पद महज ‘रबर स्टांप’ है, जहां वास्तविक फैसले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ही लेते हैं। यह बयान न केवल भाजपा की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि बिहार के लंबित मुद्दों को भी केंद्र में ला खड़ा करता है। हसन की यह टिप्पणी भाजपा की हालिया संगठनात्मक पुनर्गठन के ठीक तीन दिन बाद आई है, जब 14 दिसंबर को नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति भाजपा के लिए एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत मानी जा रही है, लेकिन विपक्ष इसे ‘परिवारवाद’ और ‘गुजराती वर्चस्व’ का प्रतीक बता रहा है।
आदिल हसन का यह बयान कटिहार के एक स्थानीय सामुदायिक केंद्र में आयोजित AIMIM की सभा के दौरान दिया गया। सभा का विषय अल्पसंख्यक समुदाय की राजनीतिक भागीदारी था, लेकिन चर्चा जल्द ही राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर केंद्रित हो गई। हसन ने कहा, “भाजपा लोकतांत्रिक प्रक्रिया और चुनावों का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन हकीकत कुछ और है। नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन क्या पार्टी में आंतरिक चुनाव हुए? नहीं। सब कुछ ऊपर से तय हो जाता है। मोदी और शाह दो गुजराती नेता हैं, जो फैसले लेते हैं और बाकी पदाधिकारी रबर स्टांप की तरह हस्ताक्षर कर देते हैं।” उन्होंने जेपी नड्डा की नियुक्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि भाजपा मुख्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने नड्डा को दरकिनार कर फैसले थोप दिए थे। हसन ने नितिन नबीन को ‘बिहार का बेटा’ बताते हुए उनकी नियुक्ति को सकारात्मक बताया, लेकिन सवाल उठाया कि बिना आंतरिक प्रक्रिया के यह पद क्यों दिया गया?
नितिन नबीन की नियुक्ति भाजपा के लिए एक रणनीतिक कदम है। 45 वर्षीय नबीन बिहार सरकार में सड़क निर्माण मंत्री हैं और बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से पांच बार विधायक चुने जा चुके हैं। भाजपा की संसदीय बोर्ड ने 14 दिसंबर को दिल्ली में हुई बैठक में उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी। यह फैसला पार्टी के संगठनात्मक पुनर्गठन का हिस्सा है, जो 2029 के लोकसभा चुनावों की तैयारी में देखा जा रहा है। नबीन को जेपी नड्डा के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में पेश किया जा रहा है, जो एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने नियुक्ति के बाद कहा, “नितिन नबीन युवा ऊर्जा और बिहार की जमीनी समझ लाते हैं। वे पार्टी को नई दिशा देंगे।” 15 दिसंबर को दिल्ली भाजपा मुख्यालय में नबीन ने चार्ज संभाला, जहां अमित शाह और जेपी नड्डा उपस्थित थे। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह नियुक्ति बिहार में NDA की मजबूनी को मजबूत करने का प्रयास है, जहां नीतीश कुमार के साथ गठबंधन की चुनौतियां बनी हुई हैं।
हालांकि, AIMIM के आदिल हसन ने इस नियुक्ति को बिहार के साथ ‘धोखा’ करार दिया। उन्होंने कहा, “बिहार का बेटा अच्छा है, लेकिन पद देकर राजनीति बंद न करें। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा कब मिलेगा? कोसी-सीमांचल की बाढ़ समस्या का समाधान कब होगा? AIIMS जैसी संस्थाएं कब खुलेंगी? सीमांचल के लिए विशेष पैकेज का क्या हुआ?” हसन ने बिहार के वोटरों का हवाला देते हुए कहा कि 2009, 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को समर्थन दिया, साथ ही विधानसभा चुनावों में भी। फिर भी, बड़े उद्योग और निवेश गुजरात की ओर क्यों जा रहे हैं? “पद देकर बिहार को तसल्ली न दें, कंक्रीट कदम उठाएं,” उन्होंने चेतावनी दी। हसन का यह बयान AIMIM की रणनीति का हिस्सा लगता है, जो बिहार में मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट करने के लिए भाजपा की नीतियों पर हमला बोल रही है। AIMIM ने हाल ही में बिहार में अपनी उपस्थिति मजबूत की है, और हसन जैसे प्रवक्ता विपक्षी एकता को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं।
भाजपा की ओर से इस बयान पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन कटिहार के स्थानीय भाजपा नेता रामविलास महतो ने इसे ‘ईर्ष्या का प्रमाण’ बताया। महतो ने कहा, “AIMIM जैसे छोटे दल अपनी प्रासंगिकता बचाने के लिए बड़े फैसलों पर सवाल उठाते हैं। नितिन नबीन की नियुक्ति बिहार की क्षमता का सम्मान है, जो पार्टी को मजबूत करेगी।” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद बिहार की आगामी राजनीतिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। प्रोफेसर रामेश्वर सिंह, पटना विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष, ने कहा, “भाजपा की यह नियुक्ति उत्तर भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश है। लेकिन विपक्ष इसे ‘गुजराती लॉबी’ का विस्तार बताकर हमला बोल रहा है। बिहार के मुद्दे—जैसे विशेष दर्जा—अभी भी अनसुलझे हैं, जो विपक्ष को हथियार दे रहे हैं।” सिंह ने चेतावनी दी कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों से पहले ऐसे बयान गठबंधन की परीक्षा लेंगे।
इस घटना का व्यापक संदर्भ भाजपा की आंतरिक संरचना से जुड़ा है। पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के बाद कार्यकारी अध्यक्ष का पद महत्वपूर्ण होता है, जो संगठनात्मक कार्यों का नेतृत्व करता है। नबीन की नियुक्ति को ‘युवा चेहरा’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन आलोचक इसे ‘परिवारवाद’ का विस्तार बताते हैं। नबीन के पिता पूर्व सांसद रमेश नबीन हैं, जो भाजपा के पुराने कार्यकर्ता रहे। विपक्षी दल, खासकर RJD और कांग्रेस, ने भी इसी तरह के सवाल उठाए हैं। RJD प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा, “भाजपा में लोकतंत्र नाम का ढोंग है। बिहार को पद देकर चुप न कराएं।” AIMIM का यह तंज विशेष रूप से मुस्लिम-प्रधान क्षेत्रों जैसे सीमांचल में प्रभावी हो सकता है, जहां पार्टी अपनी जड़ें मजबूत कर रही है।
आदिल हसन की पृष्ठभूमि भी इस बयान को महत्वपूर्ण बनाती है। वे AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं और अक्सर अल्पसंख्यक मुद्दों पर मुखर रहते हैं। हसन ने पहले भी भाजपा की ‘हिंदुत्व’ नीतियों पर हमला बोला है, खासकर CAA-NRC जैसे मुद्दों पर। कटिहार सभा में AIMIM कार्यकर्ताओं की अच्छी संख्या थी, जो दर्शाता है कि पार्टी बिहार में विस्तार कर रही है। सभा के बाद हसन ने सोशल मीडिया पर भी अपना बयान दोहराया, जहां #RubberStampBJP हैशटैग ट्रेंड करने लगा। ट्विटर (अब X) पर हजारों यूजर्स ने इसे शेयर किया, जिसमें कई ने बिहार के लंबित मुद्दों का जिक्र किया।
यह विवाद भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि बिहार में NDA का गठबंधन नाजुक संतुलन पर टिका है। नीतीश कुमार की JDU ने नियुक्ति का स्वागत किया है, लेकिन आंतरिक रूप से विशेष दर्जे की मांग तेज हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि AIMIM जैसे दल विपक्षी वोट को बांट सकते हैं, जो 2025 चुनावों में भाजपा के लिए खतरा है। एक हालिया सर्वे (CVoter, दिसंबर 2025) के अनुसार, बिहार में 35% युवा मतदाता ‘परिवर्तन’ चाहते हैं, और नबीन जैसे चेहरे इसी को लक्षित करते हैं। लेकिन हसन का तंज साबित करता है कि विपक्ष ‘विकास के वादों’ पर सवाल उठाकर हमला बोलेगा।
निष्कर्षतः आदिल हसन का यह तंज भाजपा की आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल तो खड़ा करता ही है, बिहार की उपेक्षा को भी उजागर करता है। नितिन नबीन की नियुक्ति पार्टी के लिए अवसर है, लेकिन विपक्ष इसे कमजोरी के रूप में पेश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह विवाद और तेज हो सकता है, खासकर जब बिहार बजट सत्र नजदीक आ रहा है। राजनीति में पदों से ज्यादा जरूरी हैं कंक्रीट कदम—क्या भाजपा बिहार को न्याय देगी, या यह ‘रबर स्टांप’ वाली राजनीति जारी रहेगी? समय ही बताएगा।