26 फरवरी 2026, चुनाव खर्च सीमा पर SC का नोटिस: आज सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया में राजनीतिक दलों के अनियंत्रित खर्च को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच (जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली) ने गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज (Common Cause) और सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (CPIL) द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ऑफ इंडिया (ECI) को नोटिस जारी किया। याचिका में राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर वैधानिक सीमा (ceiling) लगाने की मांग की गई है। कोर्ट ने छह हफ्तों के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
यह फैसला लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, क्योंकि याचिका में तर्क दिया गया है कि उम्मीदवारों पर खर्च की सख्त सीमा होने के बावजूद दलों के असीमित खर्च से चुनावी मुकाबला असमान हो जाता है और धनबल का दुरुपयोग बढ़ता है।
याचिका की पृष्ठभूमि और मुख्य तर्क
याचिका अधिवक्ता प्रशांत भूषण के माध्यम से दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) और चुनाव आचरण नियमों के नियम 90 के तहत व्यक्तिगत उम्मीदवारों पर खर्च की सख्त सीमा है (जैसे लोकसभा चुनाव में ₹95 लाख तक, विधानसभा में राज्य के अनुसार कम), लेकिन राजनीतिक दलों पर कोई वैधानिक सीमा नहीं है। इससे दलों को “अनलिमिटेड फाइनेंशियल रिसोर्सेज” का इस्तेमाल करने की छूट मिल जाती है, जो उम्मीदवारों की सीमा को “भ्रमपूर्ण और अप्रभावी” बना देती है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अनियंत्रित पार्टी खर्च से चुनाव अभियान एक नेता-केंद्रित हो जाते हैं, धनबल से चुनावी प्रक्रिया विकृत होती है और लोकतंत्र की सेहत पर असर पड़ता है। यह मुद्दा इलेक्टोरल बॉन्ड्स मामले (फरवरी 2024) से जुड़ा है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने योजना को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा था कि अनियंत्रित धनबल लोकतंत्र को विकृत करता है। याचिका में लॉ कमीशन की सिफारिशों का हवाला दिया गया है, जिसमें पार्टी खर्च पर सीमा लगाने की बात कही गई थी, लेकिन कोई कानूनी या कार्यकारी कार्रवाई नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने कहा कि यह “लोकतंत्र को प्रभावित करने वाला मूलभूत मुद्दा” है। कोर्ट ने इसे जटिल संवैधानिक सवाल बताया, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) और लोकतंत्र की सेहत शामिल है। जस्टिस बागची ने अन्य देशों (जैसे अमेरिका) में खर्च सीमा के प्रभाव पर सवाल उठाए और पूछा कि अगर सीमा लगाई गई तो क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा।
कोर्ट ने याचिका को गंभीरता से लिया और कहा कि यह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ा है। नोटिस जारी करते हुए केंद्र और ECI से जवाब मांगा गया। मामले को छह हफ्तों बाद सूचीबद्ध किया जाएगा।
वर्तमान व्यवस्था और चुनौतियां
वर्तमान में ECI उम्मीदवारों के खर्च की निगरानी करती है, लेकिन पार्टी खर्च (जैसे रैलियां, विज्ञापन, प्रचार सामग्री) पर कोई सीमा नहीं है। इससे बड़े दल बड़े फंडिंग से फायदा उठाते हैं। इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम रद्द होने के बाद भी अनियंत्रित खर्च जारी है। याचिका में मांग की गई है कि पार्टी खर्च पर सीमा लगाई जाए, ताकि चुनाव धनबल से प्रभावित न हों।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सुधार चुनावी सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण है, लेकिन लागू करना चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि इससे फंडिंग और अभिव्यक्ति के अधिकार पर सवाल उठ सकते हैं।
प्रभाव और विश्लेषण
यह नोटिस चुनाव सुधारों में नया अध्याय खोल सकता है। अगर सीमा लगी तो छोटे दलों और उम्मीदवारों को फायदा होगा, धनबल का दुरुपयोग कम होगा। लेकिन विरोध में कहा जा सकता है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश है। केंद्र और ECI के जवाब से आगे की दिशा तय होगी।
यह मामला लोकतंत्र में समान अवसर और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। अनियंत्रित धनबल लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। केंद्र और ECI के जवाब से उम्मीद है कि प्रभावी नियम बनेंगे। यह याचिका न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा भी है। आगे की सुनवाई में और स्पष्टता आएगी।
Sources: लाइव लॉ