15 फरवरी 2026, सुप्रीम कोर्ट का FSSAI को सख्त निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स में ज्यादा शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा पर स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने के मुद्दे पर बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) को फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) लागू करने पर गंभीरता से विचार करने का निर्देश दिया। मौजूदा बैक-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग व्यवस्था से असंतोष जताते हुए कोर्ट ने कहा कि यह उपभोक्ताओं को सूचित निर्णय लेने में पर्याप्त मदद नहीं करती। यह कदम गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन और हृदय रोगों पर अंकुश लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कोर्ट की सुनवाई और मुख्य निर्देश
जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश जारी किया। PIL ‘3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी’ ने दाखिल की थी, जिसमें पैकेज्ड फूड पर फ्रंट में बड़े और स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने FSSAI के अनुपालन हलफनामे पर असंतोष जताया और कहा कि पैकेज्ड फूड की बढ़ती खपत के बीच उपभोक्ताओं को हानिकारक तत्वों की आसानी से जानकारी मिलनी चाहिए।
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग क्या है?
FOPL का मतलब है पैकेज के सामने बड़े आकार में चेतावनी या इंडिकेटर लगाना, जैसे ‘हाई शुगर’, ‘हाई साल्ट’ या ‘हाई सैचुरेटेड फैट’। कोर्ट ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित प्रथा बताया और FSSAI को चार हफ्ते में इस पर जवाब दाखिल करने को कहा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा बैक-साइड लेबल छोटे अक्षरों में होने से आम उपभोक्ता को समझने में दिक्कत होती है।
पृष्ठभूमि और जनस्वास्थ्य का मुद्दा
भारत में NCDs से हर साल लाखों मौतें हो रही हैं। WHO की रिपोर्ट्स के अनुसार, ज्यादा शुगर, नमक और अस्वास्थ्यकर फैट वाली डाइट इसका मुख्य कारण है। पैकेज्ड फूड जैसे चिप्स, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक्स और प्रोसेस्ड स्नैक्स में ये तत्व छिपे रूप में ज्यादा होते हैं। उपभोक्ता आकर्षक पैकेजिंग देखकर खरीद लेते हैं, लेकिन पीछे की छोटी जानकारी नहीं पढ़ पाते।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण और सफलता
चिली ने 2016 में ब्लैक ऑक्टागन वॉर्निंग लेबल्स लागू किए, जिससे शुगर युक्त प्रोडक्ट्स की खपत में 25% तक गिरावट आई। मेक्सिको, इजरायल और कई यूरोपीय देशों में भी FOPL सफल रहा है। कोर्ट ने FSSAI को इन मॉडल्स का अध्ययन करने को कहा। भारत में FSSAI ने 2020 में ड्राफ्ट रेगुलेशंस जारी किए थे, लेकिन इंडस्ट्री के विरोध के कारण लागू नहीं हो सके।
इंडस्ट्री और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
फूड इंडस्ट्री ने इसे चुनौतीपूर्ण बताया, कहते हुए कि इससे बिक्री प्रभावित होगी। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और NGO ने कोर्ट के कदम की सराहना की। उनका कहना है कि यह उपभोक्ता अधिकार और जनस्वास्थ्य की जीत है। FSSAI ने पहले स्टार रेटिंग सिस्टम प्रस्तावित किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे अपर्याप्त माना।
आगे की राह और उम्मीदें
यदि FSSAI सकारात्मक जवाब देता है, तो जल्द ही नए नियम लागू हो सकते हैं। यह बदलाव उपभोक्ताओं को जागरूक बनाएगा और स्वस्थ विकल्प चुनने में मदद करेगा। कोर्ट ने चेतावनी दी कि देरी हुई तो न्यायिक हस्तक्षेप हो सकता है।
यह फैसला भारत में फूड सेफ्टी और पब्लिक हेल्थ के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। उपभोक्ता अब आकर्षक पैकेजिंग के पीछे छिपे खतरे को आसानी से समझ सकेंगे।
Sources: लाइव लॉ