11 फरवरी 2026, AIMIM विधायक तौसीफ आलम की बढ़ती मुश्किलें: बिहार के सीमांचल क्षेत्र में राजनीतिक हलचल मचाने वाले ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नवनिर्वाचित विधायक मोहम्मद तौसीफ आलम की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पटना हाईकोर्ट ने बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र (निर्वाचन क्षेत्र संख्या 52) से संबंधित ईवीएम मशीनों को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण आदेश दिया है। यह आदेश विधायक पर लगे नामांकन पत्र में आवश्यक जानकारी छिपाने के गंभीर आरोपों के मद्देनजर आया है। यदि ये आरोप साबित हो गए, तो तौसीफ आलम की विधायकी पर संकट मंडरा सकता है, जिससे क्षेत्र की राजनीति में नया मोड़ आ सकता है।
चुनावी पृष्ठभूमि और तौसीफ आलम की जीत
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सीमांचल क्षेत्र AIMIM के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। पार्टी ने किशनगंज जिले की बहादुरगंज सीट पर मोहम्मद तौसीफ आलम को उम्मीदवार बनाया, जो पहले कांग्रेस से जुड़े हुए थे। तौसीफ आलम ने जोरदार प्रचार किया और अंततः बड़े अंतर से जीत हासिल की। आधिकारिक परिणामों के अनुसार, उन्हें 87,315 वोट मिले, जबकि निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के मोहम्मद मसवर आलम को 58,589 वोट ही प्राप्त हुए। इस तरह तौसीफ आलम ने लगभग 28,726 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
AIMIM की यह जीत सीमांचल में पार्टी की बढ़ती पैठ को दर्शाती है। पार्टी अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कई जनसभाएं कीं और मुस्लिम बहुल क्षेत्र में विकास, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर फोकस किया। तौसीफ आलम की जीत को स्थानीय लोग एक बड़े उलटफेर के रूप में देख रहे थे, क्योंकि पहले यह सीट कांग्रेस के प्रभाव क्षेत्र में मानी जाती थी।
आरोपों का उदय
चुनाव परिणाम घोषित होने के कुछ दिनों बाद ही नवनिर्वाचित विधायक पर गंभीर आरोप लगने शुरू हो गए। बहादुरगंज के सरंडा निवासी आसिफ अकरम ने 19 नवंबर 2025 को जिला निर्वाची पदाधिकारी सह डीएम विशाल राज को लिखित शिकायत सौंपी। शिकायत में दावा किया गया कि तौसीफ आलम ने नामांकन पत्र (हलफनामा) में आवश्यक जानकारियां छिपाई हैं। कुछ स्थानीय सूत्रों और सोशल मीडिया पोस्ट्स के अनुसार, आरोप मुख्य रूप से बच्चों की संख्या और पेंशन संबंधी जानकारी छिपाने से जुड़े हैं। उम्मीदवारों को हलफनामे में परिवार के सदस्यों, आश्रितों, संपत्ति, देनदारियां और किसी भी सरकारी लाभ (जैसे पेंशन) की पूरी जानकारी देनी अनिवार्य होती है। यदि ये जानकारियां गलत या अधरि बताई गईं, तो यह चुनावी कानून का उल्लंघन माना जाता है।
इसके अलावा, बहादुरगंज से कांग्रेस के पूर्व उम्मीदवार मुसब्बिर आलम ने भी पटना हाईकोर्ट में अलग से याचिका दाखिल की। इस याचिका में भी विधायक पर नामांकन में तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाया गया। मुसब्बिर आलम का दावा है कि ऐसी अनियमितता से चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हुई और विधायक की योग्यता पर सवाल उठते हैं।
पटना हाईकोर्ट का आदेश और ईवीएम की सुरक्षा
इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाया। कोर्ट ने 52-बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र की सभी ईवीएम मशीनों को सुरक्षित रखने का स्पष्ट निर्देश दिया। यह आदेश भविष्य में किसी चुनावी याचिका या पुनर्मतगणना की स्थिति में सबूतों को संरक्षित रखने के लिए है।
किशनगंज के डीएम विशाल राज ने मीडिया को बताया, “ईवीएम मशीनों को वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों की की मौजूदगी में सुरक्षित स्थान पर रखा जा रहा है। यह कदम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में उठाया गया है, ताकि भविष्य में किसी जांच या आवश्यकता पड़ने पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सके। मामला अभी न्यायिक विचाराधीन है।” ईवीएम की सुरक्षा से जिले में राजनीतिक माहौल गरम हो गया है। स्थानीय लोग और राजनीतिक कार्यकर्ता इस मामले पर चर्चा कर रहे हैं।
कानूनी निहितार्थ और संभावित परिणाम
भारत में चुनावी हलफनामे में गलत या अधूरी जानकारी देना गंभीर अपराध है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए के तहत इसके लिए तीन महीने से दो साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। यदि आरोप साबित हो जाते हैं, तो विधायक की सदस्यता रद्द की जा सकती है और उपचुनाव कराना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि उम्मीदवारों को पूर्ण पारदर्शिता बरतनी चाहिए।
यह मामला AIMIM के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। पार्टी सीमांचल में अपनी जमीन मजबूत कर रही है, लेकिन ऐसे आरोप पार्टी की छवि को प्रभावित कर सकते हैं। तौसीफ आलम की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार वे कानूनी रूप से अपना पक्ष मजबूती से रख रहे हैं।
सीमांचल की राजनीति पर प्रभाव
बहादुरगंज सीट मुस्लिम बहुल है और यहां हमेशा से कांग्रेस, RJD और अब AIMIM के बीच कड़ा मुकाबला रहता है। तौसीफ आलम की जीत ने AIMIM को नई ताकत दी थी, लेकिन यह विवाद पार्टी के विस्तार पर ब्रेक लगा सकता है। विपक्षी दल इस मामले को उठाकर AIMIM पर हमलावर हो सकते हैं। वहीं, स्थानीय लोग विकास कार्यों की उम्मीद कर रहे हैं और उम्मीद है कि यह कानूनी लड़ाई क्षेत्र के विकास को प्रभावित न करे।
अंत में, यह मामला भारतीय लोकतंत्र में चुनावी पारदर्शिता की महत्वपूर्णता को रेखांकित करता है। पटना हाईकोर्ट की आगे की सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं। यदि ईवीएम की जांच होती है या आरोप साबित होते हैं, तो बहादुरगंज की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल मामला न्यायालय में है और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए।
Sources: दैनिक भास्कर