30 जनवरी 2026, Trump ने ईरान के साथ सीधी बातचीत की संभावना जताई: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ सीधी बातचीत की संभावना जताई है, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि कड़े प्रतिबंध जारी रहेंगे। ट्रंप ने कहा कि वे ईरान से बात करने की योजना बना रहे हैं, लेकिन तेहरान को अपने परमाणु महत्वाकांक्षाओं को छोड़ना होगा। दूसरी ओर, ईरान ने इस बयान को सकारात्मक बताया, लेकिन बातचीत के लिए शर्तें रखीं और धमकियों के बीच वार्ता से इनकार किया। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच यह विकास महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ट्रंप का बयान: बातचीत की योजना लेकिन सख्त रुख
‘बात करने की योजना बना रहा हूं’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा, “मैं ईरान से बात करने की योजना बना रहा हूं।” उन्होंने यह भी जोर दिया कि अमेरिका की “बहुत बड़ी और शक्तिशाली नौसेना” क्षेत्र में तैनात है और ईरान को परमाणु समझौता करने या गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। ट्रंप ने कहा कि यदि ईरान समझौता नहीं करता तो अगला हमला “बहुत अधिक भयानक” होगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है, जिसमें विमानवाहक पोत और युद्धपोत शामिल हैं।
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अधिकतम दबाव की नीति से ईरान को बातचीत की मेज पर लाया जा सकता है। 2018 में ट्रंप ने ही ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका को बाहर निकाला था, जिसके बाद प्रतिबंधों की झड़ी लग गई। अब दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप एक नया समझौता चाहते हैं, जो ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को भी कवर करे।
ईरान की प्रतिक्रिया: सकारात्मक लेकिन शर्तों के साथ
धमकियों के बीच बातचीत नहीं
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ट्रंप के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तेहरान अमेरिका के साथ परमाणु बातचीत बहाल करने को तैयार है, लेकिन धमकियों या पूर्वशर्तों के तहत नहीं। अराघची ने तुर्की में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन निष्पक्ष और सम्मानजनक तरीके से।” ईरान ने अमेरिकी सैन्य तैनाती को आक्रामक बताया और चेतावनी दी कि किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।
ईरान ने यह भी कहा कि अमेरिकी प्रतिबंध हटाए बिना कोई समझौता संभव नहीं। तेहरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और वह एनपीटी के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की रिपोर्ट्स में ईरान के यूरेनियम संवर्धन में वृद्धि का जिक्र है, जो चिंता का विषय बना हुआ है।
पृष्ठभूमि: अमेरिका-ईरान तनाव की जड़ें
2018 से चला आ रहा विवाद
2015 में ट्रंप के JCPOA से बाहर निकलने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या, ईरान की ओर से अमेरिकी ठिकानों पर हमले और हारमुज जलडमरूमध्य में तनाव जैसी घटनाएं हुईं। बाइडेन प्रशासन में अप्रत्यक्ष बातचीत हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हुआ। अब ट्रंप की वापसी के साथ फिर से दबाव की रणनीति अपनाई जा रही है।
मध्य पूर्व में अमेरिका की सैन्य तैनाती बढ़ने से क्षेत्रीय देश चिंतित हैं। इजरायल ट्रंप का समर्थन कर रहा है, जबकि सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी ईरान के खिलाफ सख्त रुख चाहते हैं। तुर्की ने मध्यस्थता की पेशकश की है, लेकिन अभी तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं और आगे की राह
संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय देशों की भूमिका
यूरोपीय संघ ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। रूस और चीन ने अमेरिकी धमकियों की निंदा की है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की “अधिकतम दबाव” नीति कामयाब हो सकती है, लेकिन युद्ध का खतरा भी बढ़ रहा है। यदि बातचीत शुरू हुई तो यह मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होगा।
ट्रंप का यह बयान दिखाता है कि वे सैन्य विकल्प खुले रखते हुए कूटनीति का दरवाजा भी खोल रहे हैं। ईरान की सकारात्मक लेकिन सशर्त प्रतिक्रिया से उम्मीद है कि अप्रत्यक्ष या मध्यस्थों के जरिए बातचीत शुरू हो सकती है।
तनाव के बीच उम्मीद की किरण
अमेरिका-ईरान संबंधों में यह नया मोड़ क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए अहम है। ट्रंप की दोहरी रणनीति – बातचीत की पेशकश और सैन्य दबाव – से ईरान पर दबाव बढ़ेगा। जनता और विशेषज्ञ अब इंतजार कर रहे हैं कि क्या यह तनाव युद्ध की ओर जाएगा या एक नए समझौते की नींव रखेगा।
Sources: रॉयटर्स