13 जनवरी 2026, Khagra Mela का भव्य उद्घाटन: Khagra Mela, जिसे Khagra Mela के नाम से भी जाना जाता है, बिहार के किशनगंज जिले में एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का आयोजन है। यह मेला ब्रिटिश काल से चला आ रहा है और एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है। हाल ही में, 2026 में इसका विधिवत उद्घाटन जिलाधिकारी विशाल राज द्वारा किया गया, जिसने स्थानीय लोगों में उत्साह की लहर दौड़ा दी। इस रिपोर्ट में हम मेले के इतिहास, उद्घाटन की झलकियां, सांस्कृतिक महत्व और आर्थिक प्रभाव पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह मेला न केवल व्यापार का केंद्र है, बल्कि लोक परंपराओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।
उद्घाटन की प्रमुख झलकियां
जिलाधिकारी विशाल राज ने मेले का शुभारंभ करते हुए कहा कि यह आयोजन किशनगंज की पहचान है और इसे संरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। उद्घाटन समारोह में स्थानीय कलाकारों ने लोक नृत्य और गीत प्रस्तुत किए, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गए। मेले की शुरुआत 25 दिसंबर 2025 से हुई थी, लेकिन आधिकारिक उद्घाटन जनवरी 2026 में हुआ, जिसमें हजारों लोग शामिल हुए। कोहरे और ठंड के बावजूद, लोगों का उत्साह देखते बनता था। मेले में पशुओं की खरीद-बिक्री के अलावा झूले, स्टॉल और सांस्कृतिक मंच प्रमुख आकर्षण रहे।
खगड़ा मेले का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
Khagra Mela की स्थापना 1883 में हुई थी, जब खगड़ा एस्टेट के नवाब सैयद अता हुसैन खान ने सूफी फकीर बाबा कमली शाह की सलाह पर इसे शुरू किया। इसका उद्देश्य स्थानीय लोगों को रोजगार प्रदान करना और क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देना था। प्रस्ताव को पूर्णिया के जिलाधिकारी ए. वीक्स और किशनगंज के सब-डिविजनल ऑफिसर राय बहादुर दास दत्ता ने मंजूरी दी, और सर्दियों में इसका पहला आयोजन हुआ। उस समय से यह मेला निरंतर चला आ रहा है, हालांकि समय के साथ इसकी चमक थोड़ी फीकी पड़ी है।
ब्रिटिश काल से आधुनिक युग तक की यात्रा
ब्रिटिश काल में यह मेला उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों से व्यापारियों को आकर्षित करता था, जिसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, मलेशिया और अफगानिस्तान जैसे देश शामिल थे। पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए प्रसिद्ध यह मेला एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला बन गया। आजादी के बाद भी यह जारी रहा, लेकिन आधुनिक चुनौतियों जैसे शहरीकरण और डिजिटल व्यापार ने इसके पारंपरिक स्वरूप को प्रभावित किया है। फिर भी, 2026 का आयोजन इसकी जीवंतता को साबित करता है।
मेले का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
Khagra Mela केवल व्यापार तक सीमित नहीं है; यह सांस्कृतिक विरासत का संरक्षक भी है। यहां लोक नृत्य, गीत, नाटक और पारंपरिक खेल आयोजित होते हैं, जो बिहार की समृद्ध संस्कृति को जीवंत बनाते हैं। उद्घाटन में प्रस्तुत कार्यक्रमों ने स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान किया, जिससे युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सकी।
लोक परंपराओं का जीवंत प्रदर्शन
मेले में बिहारी लोक संगीत, जैसे बिरहा और चैता, के साथ-साथ आदिवासी नृत्य देखने को मिलते हैं। पशु प्रदर्शनी में घोड़े, बैल और अन्य जानवरों की नस्लों का प्रदर्शन होता है, जो किसानों के लिए ज्ञानवर्धक होता है। इसके अलावा, हस्तशिल्प स्टॉल पर स्थानीय कारीगर अपनी कला दिखाते हैं, जैसे मधुबनी पेंटिंग और बांस की वस्तुएं। यह मेला सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है, जहां विभिन्न समुदाय एक साथ आते हैं।
2026 मेले की विशेषताएं और चुनौतियां
इस वर्ष मेले की शुरुआत 25 दिसंबर 2025 से हुई, लेकिन उद्घाटन जनवरी में जिलाधिकारी द्वारा किया गया। कोविड के बाद यह पहला पूर्ण रूप से आयोजित मेला है, जिसमें सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। हालांकि, मौसम की मार जैसे घना कोहरा और ठंड ने आगंतुकों को प्रभावित किया।
आकर्षण और नवाचार
2026 में मेले में डिजिटल स्टॉल जोड़े गए, जहां ऑनलाइन पशु व्यापार की जानकारी दी गई। बच्चों के लिए झूले और गेम्स, जबकि वयस्कों के लिए सांस्कृतिक शामें आयोजित की गईं। पशु व्यापार में लाखों का कारोबार हुआ, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है। हालांकि, पर्यावरणीय चिंताओं जैसे प्लास्टिक कचरा पर ध्यान देने की जरूरत है।
आर्थिक प्रभाव और स्थानीय विकास
Khagra Mela किशनगंज की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हजारों लोगों को अस्थायी रोजगार प्रदान करता है, जैसे स्टॉल संचालक, कलाकार और परिवहन कर्मी। पशु व्यापार से किसानों को लाभ होता है, जबकि पर्यटन से होटल और दुकानें फलती-फूलती हैं।
विकास की संभावनाएं
सरकार द्वारा मेले को प्रोत्साहन देने से, जैसे डालमिया सीमेंट की नई यूनिट, क्षेत्र में औद्योगिक विकास हो रहा है। मेला पर्यटन को बढ़ावा देता है, जो बिहार की अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकता है। हालांकि, आधुनिकीकरण की जरूरत है ताकि यह वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके।
निष्कर्ष: विरासत का संरक्षण
Khagra Mela का 2026 उद्घाटन एक बार फिर साबित करता है कि परंपराएं समय के साथ जीवित रह सकती हैं। जिलाधिकारी विशाल राज के नेतृत्व में यह आयोजन सफल रहा, लेकिन इसके संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। यह मेला न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी। आशा है कि आने वाले वर्षों में यह और मजबूत होगा।
Sources: किशनगंज जिला वेबसाइट, पटना प्रेस