9 जनवरी 2026, Indian Railways ने शुरू किया पहली हाइड्रोजन-पावर्ड ट्रेन का परीक्षण: Indian Railways ने 2026 की शुरुआत में अपनी पहली हाइड्रोजन-पावर्ड ट्रेन का परीक्षण शुरू कर दिया है, जो देश के परिवहन क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम है। यह ट्रेन हरियाणा के जिंद-सोनीपत रूट पर ट्रायल रन कर रही है, और यह पर्यावरण अनुकूल तकनीक पर आधारित है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल से संचालित यह ट्रेन केवल पानी की भाप उत्सर्जित करती है, जिससे वायु प्रदूषण शून्य होता है। इस पहल से भारत जर्मनी, जापान और चीन जैसे देशों की श्रेणी में शामिल हो रहा है, जहां हाइड्रोजन ट्रेनों पर प्रयोग हो रहे हैं। यह अभियान भारत की हरित ऊर्जा नीतियों को मजबूत करेगा और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करेगा। रिपोर्ट में हम इस ट्रेन की तकनीकी डिटेल्स, लाभ, विकास प्रक्रिया और भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
यह परीक्षण 8 जनवरी 2026 को शुरू हुआ, जो रेलवे के इतिहास में एक मील का पत्थर है। उत्तरी रेलवे के अंतर्गत 90 किलोमीटर के गैर-विद्युतीकृत रूट पर यह ट्रायल चल रहा है। ट्रेन की गति 140 किमी प्रति घंटा तक है, और यह लगभग 2500 यात्रियों को ले जाने में सक्षम है। हाइड्रोजन उत्पादन और भंडारण की सुविधा जिंद में स्थापित की गई है, जिसकी लागत 120 करोड़ रुपये है। यह सुविधा 3000 किलोग्राम हाइड्रोजन स्टोर कर सकती है और उच्च वोल्टेज बिजली आपूर्ति पर काम करती है। परीक्षण के दौरान सुरक्षा, प्रदर्शन, गति, ब्रेकिंग और वास्तविक स्थितियों का मूल्यांकन किया जा रहा है। यदि सफल रहा, तो 2026 के अंत तक यात्री सेवाएं शुरू हो सकती हैं।
परीक्षण की डिटेल्स
Indian Railways की यह पहली हाइड्रोजन ट्रेन इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF), चेन्नई द्वारा विकसित की गई है। रिसर्च डिजाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (RDSO) ने तकनीकी विनिर्देश दिए हैं। ट्रेन में 10 कोच हैं, जिसमें दो ड्राइविंग पावर कार शामिल हैं, प्रत्येक 1200 किलोवाट की क्षमता वाली। यह ब्रॉड गेज ट्रैक्स के लिए सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेन है।
स्थान और रूट
परीक्षण जिंद-सोनीपत रूट पर हो रहा है, जो हरियाणा में स्थित है। यह 90 किमी का गैर-विद्युतीकृत खंड है, जहां डीजल ट्रेनें चलती हैं। इस रूट का चयन इसलिए किया गया क्योंकि यहां हाइड्रोजन की आपूर्ति सुविधा उपलब्ध है। ट्रायल से जिंद से सोनीपत का सफर दो घंटे से घटकर एक घंटा हो सकता है। हरियाणा में भारत की सबसे बड़ी हाइड्रोजन सुविधा है, जो इस परियोजना को गौरव प्रदान करती है।
तकनीकी विशेषताएं
ट्रेन हरी हाइड्रोजन पर चलती है, जो पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से उत्पादित होती है। फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन मिलकर बिजली उत्पन्न करते हैं, और अतिरिक्त ऊर्जा लिथियम-आयन बैटरियों में स्टोर होती है। प्रति किलोमीटर लगभग 900 ग्राम हाइड्रोजन की खपत होती है। ट्रेन में ऑटोमैटिक दरवाजे और डिजिटल सूचना डिस्प्ले हैं। उत्सर्जन केवल पानी की भाप है, जो इसे पर्यावरण अनुकूल बनाता है। यह शोर मुक्त यात्रा प्रदान करती है और ओवरहेड विद्युतीकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती।
लाभ और प्रभाव
यह ट्रेन पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। डीजल ट्रेनों से उत्सर्जित प्रदूषण को कम करके वायु गुणवत्ता सुधारेगी। भारत के विशाल रेल नेटवर्क में गैर-विद्युतीकृत रूटों पर यह विकल्प डीजल और इलेक्ट्रिक के अलावा तीसरा स्तंभ बनेगा। आर्थिक रूप से, आयातित ईंधन पर निर्भरता घटेगी, और घरेलू हाइड्रोजन उत्पादन बढ़ेगा। यात्रियों के लिए तेज, सुरक्षित और शांत सफर उपलब्ध होगा।
पर्यावरणीय लाभ
शून्य टेलपाइप उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में मदद मिलेगी। भारत की नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्यों को समर्थन देगी। हाइड्रोजन ट्रेनें पारंपरिक ट्रेनों से अधिक कुशल हैं, और इनसे शोर प्रदूषण भी कम होता है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
यह परियोजना रोजगार सृजन करेगी, खासकर हाइड्रोजन उत्पादन और रखरखाव में। रेलवे की लागत कम होगी, क्योंकि हाइड्रोजन उत्पादन सौर ऊर्जा से जुड़ा जा सकता है। सामाजिक रूप से, यह भारत को वैश्विक स्तर पर नवाचार में अग्रणी बनाएगा।
विकास और भविष्य की योजनाएं
यह ट्रेन पूरी तरह से भारत में विकसित है, जो ‘मेक इन इंडिया’ का उदाहरण है। ICF और आरडीएसओ की टीम ने वर्षों की मेहनत से इसे साकार किया। भविष्य में, यदि ट्रायल सफल रहा, तो अन्य रूटों पर भी ऐसी ट्रेनें चलेंगी। सप्लाई चेन, कौशल विकास और नियामक ढांचे पर काम चल रहा है।
भविष्य की रणनीतियां
Indian Railways हाइड्रोजन को मुख्य ट्रैक्शन स्रोत बनाने की योजना बना रहा है। लागत तुलना और स्केलेबिलिटी पर ध्यान दिया जा रहा है। 2026 के अंत तक यात्री सेवाएं शुरू हो सकती हैं, और लंबी दूरी की ट्रेनों में इसका विस्तार होगा।
चुनौतियां और सुझाव
हाइड्रोजन उत्पादन की लागत और सुरक्षा चुनौतियां हैं। सरकार को सब्सिडी और अनुसंधान पर निवेश बढ़ाना चाहिए। कुल मिलाकर, यह पहल भारत को सतत विकास की ओर ले जा रही है।
Sources: डेक्कन क्रॉनिकल