8 जनवरी 2026, BSE Sensex & NSE NIFTY 50: भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई, जिसमें BSE Sensex 780.18 अंकों या 0.92% की गिरावट के साथ 84,180.96 पर बंद हुआ। NSE NIFTY 50 भी 1.01% गिरकर 25,876.85 पर पहुंचा। यह गिरावट लगातार चौथे सत्र की है, जिसमें कुल मिलाकर Sensex में 1,500 अंकों से अधिक की कमी आई है। निवेशकों की संपत्ति में लगभग 7-8 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। मुख्य कारणों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने की धमकी, भू-राजनीतिक तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और असमान कॉर्पोरेट कमाई शामिल हैं। सभी 16 प्रमुख सेक्टर प्रभावित हुए, जिसमें धातु, तेल और गैस, तथा कैपिटल गुड्स सबसे अधिक गिरे। इस रिपोर्ट में हम इस गिरावट के कारणों, प्रभावों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
गिरावट का बैकग्राउंड
भारतीय बाजार पिछले कुछ दिनों से दबाव में है। 5 जनवरी से शुरू हुई गिरावट अब तक जारी है, जिसमें Sensex का उच्चतम स्तर 84,965.27 और न्यूनतम 84,207.45 रहा। NIFTY मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स भी 1% से अधिक गिरे। जनवरी 2026 में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने 900 मिलियन डॉलर की निकासी की, जो 2025 में 19 बिलियन डॉलर की बिकवाली के बाद आई। बाजार की यह स्थिति वैश्विक अनिश्चितताओं से जुड़ी है, जहां अमेरिकी नीतियां प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।
हाल की गिरावट की समयरेखा
पिछले चार सत्रों में बाजार में लगातार गिरावट देखी गई। 5 जनवरी को मामूली गिरावट के बाद 6 और 7 जनवरी को तेज गिरावट आई, और 8 जनवरी को यह चरम पर पहुंची। कुल मिलाकर, निवेशकों ने 7 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाया। यह गिरावट अमेरिकी सीनेट द्वारा रूस पर प्रतिबंध बिल पास करने के बाद तेज हुई, जिसमें रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर सख्त कार्रवाई की बात है। भारत, जो रूसी क्रूड का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है, इसकी चपेट में आया।
बाजार की पूर्व स्थिति
2025 के अंत में बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर था, लेकिन 2026 की शुरुआत में अनिश्चितताएं बढ़ीं। अमेरिकी चुनाव के बाद ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीतियां वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर रही हैं। भारत के निर्यात, विशेष रूप से परिधान और समुद्री उत्पाद, पर असर पड़ सकता है।
गिरावट के मुख्य कारण
इस गिरावट के पीछे कई कारक हैं, लेकिन प्रमुख रूप से वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक नीतियां जिम्मेदार हैं।
ट्रंप की टैरिफ धमकी
ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने का समर्थन किया, जो भारत को सीधे प्रभावित कर सकता है। अमेरिका पहले ही कुछ भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगा चुका है। इससे निर्यात प्रभावित कंपनियां जैसे गोकालदास एक्सपोर्ट्स (8.5% नीचे), पर्ल ग्लोबल (7.9%), अवंति फीड्स (8.6%) और एपेक्स फ्रोजन (7.8%) गिरे। ट्रंप की वेनेजुएला से क्रूड आयात योजना ने भी तेल बाजार में हलचल मचाई।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली
FII की लगातार बिकवाली ने बाजार को दबाया। जनवरी में 900 मिलियन डॉलर की निकासी हुई, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण है। घरेलू निवेशक खरीदारी कर रहे हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।
सेक्टर-विशिष्ट दबाव
धातु शेयर 3.4% गिरे, तेल और गैस 2.8%, आईटी 2%। कैपिटल गुड्स में बीएचईएल 10.5%, एलएंडटी 3.1%, एबीबी 12% नीचे। कारण: वित्त मंत्रालय द्वारा चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध हटाने की योजना, जो भारतीय कैपिटल गुड्स कंपनियों को प्रभावित कर सकती है।
अन्य कारक
असमान कॉर्पोरेट कमाई और भू-राजनीतिक तनाव, जैसे रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व संघर्ष, ने निवेशकों का मनोबल गिराया।
बाजार पर प्रभाव
इस गिरावट से निवेशकों को बड़ा नुकसान हुआ, लेकिन कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं।
निवेशकों का नुकसान
बाजार पूंजीकरण में 8 लाख करोड़ रुपये की कमी आई। छोटे निवेशक सबसे अधिक प्रभावित हुए, क्योंकि मिडकैप और स्मॉलकैप 2% गिरे।
सेक्टर प्रभाव
तेल और गैस में रिलायंस इंडस्ट्रीज 2.2% नीचे, आईटी में टेक महिंद्रा 3% गिरा। हालांकि, कुछ स्टॉक जैसे टाटा स्टील रिकॉर्ड हाई पर पहुंचे, उत्पादन में 12% वृद्धि के कारण।
व्यापक आर्थिक प्रभाव
यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकती है, विशेष रूप से निर्यात क्षेत्र पर। हालांकि, रिफाइनर्स को वेनेजुएला क्रूड से फायदा हो सकता है।
विशेषज्ञ राय
विश्लेषकों के अनुसार, यह गिरावट अल्पकालिक है। अरिहंत कैपिटल की अनीता गांधी ने कहा कि टैरिफ अनिश्चितता से बाजार अस्थिर है, लेकिन भारत अमेरिकी दबाव से सुरक्षित रह सकता है। मोतीलाल ओसवाल के विशेषज्ञों ने सलाह दी कि निवेशक डिप पर खरीदारी करें, विशेष रूप से मजबूत फंडामेंटल वाले स्टॉक में। बाजार में रिकवरी की उम्मीद है, यदि वैश्विक तनाव कम होते हैं।
भविष्य की संभावनाएं
आने वाले दिनों में बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। यदि अमेरिका टैरिफ लागू करता है, तो और गिरावट हो सकती है। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और घरेलू निवेश से रिकवरी संभव है। निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए और विविधीकरण पर ध्यान देना चाहिए।
निष्कर्ष
भारतीय शेयर बाजार की यह भारी गिरावट वैश्विक अनिश्चितताओं का नतीजा है, लेकिन यह स्थायी नहीं लगती। ट्रंप की नीतियां और FII बिकवाली प्रमुख कारण हैं, लेकिन अवसर भी हैं। निवेशकों को धैर्य रखना चाहिए और विशेषज्ञ सलाह लेनी चाहिए। यह घटना बाजार की संवेदनशीलता को दर्शाती है।
Sources: इकनोमिक टाइम्स, फाइनेंसियल एक्सप्रेस