7 जनवरी 2026, Greenland पर अमेरिकी धमकी: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रशासन ने Greenland पर कब्जा करने की धमकी को एक बार फिर दोहराया, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। Greenland, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, को अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्कटिक क्षेत्र में प्रभुत्व के लिए आवश्यक मानता है। इस धमकी के खिलाफ फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय सहयोगी देश योजना बना रहे हैं, जो यूरोपीय संघ (EU) की एकता को गंभीर चुनौती दे रही है। यह रिपोर्ट इस मुद्दे की पृष्ठभूमि, वर्तमान विकास, यूरोपीय प्रतिक्रियाओं और संभावित परिणामों पर विस्तार से चर्चा करती है।
पृष्ठभूमि: अमेरिकी रुचि का इतिहास
Greenland पर अमेरिकी रुचि नई नहीं है। 2019 में ट्रंप ने इसे खरीदने का प्रस्ताव रखा था, जिसे डेनमार्क ने अस्वीकार कर दिया। ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक महत्व रखता है, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण नए समुद्री मार्ग और प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं। अमेरिका पहले से ही थुले एयर बेस के माध्यम से वहां सैन्य उपस्थिति रखता है, जो 1951 के रक्षा समझौते के तहत है। इस समझौते से अमेरिका सैन्य वृद्धि कर सकता है, लेकिन पूर्ण कब्जा नहीं। 2026 में, ट्रंप प्रशासन ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता बताया, चीन और रूस की बढ़ती गतिविधियों का हवाला देते हुए। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने कहा कि सैन्य विकल्प हमेशा खुला है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हो सकता है।
Greenland की आबादी लगभग 57,000 है, मुख्य रूप से इनुइट लोग, जो स्वतंत्रता या डेनमार्क से मजबूत संबंध चाहते हैं। 2025 के चुनावों में, ग्रीनलैंड की संसद ने अमेरिकी कब्जे का विरोध किया। डेनमार्क ने इसे “अस्वीकार्य” बताया और अमेरिकी राजदूत को तलब किया। ट्रंप ने इसे “रूस से खतरा” करार दिया, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह संसाधनों (जैसे सोना, दुर्लभ पृथ्वी तत्व) के लिए है।
वर्तमान विकास: अमेरिकी रुख
ट्रंप प्रशासन ने Greenland को “पश्चिमी गोलार्ध की सुरक्षा” के लिए आवश्यक बताया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइक वाल्ट्ज ने संसाधनों को लूटने की बात स्वीकार की, जबकि विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अगले सप्ताह डेनमार्क से वार्ता की घोषणा की। व्हाइट हाउस ने सैन्य बल का उपयोग “विकल्प” बताया, जो नाटो सहयोगी पर हमला होगा। रिपब्लिकन सीनेटरों ने सैन्य कार्रवाई का विरोध किया, लेकिन ट्रंप ने नाटो को “कमजोर” कहा। यह वेनेजुएला हमले के बाद की घटना है, जो अमेरिकी आक्रामकता का पैटर्न दिखाती है।
एक्स (पूर्व ट्विटर) पर चर्चा गर्म है। उपयोगकर्ताओं ने इसे “पागलपन” कहा, जबकि कुछ ने समर्थन किया। एक पोस्ट में कहा गया कि ग्रीनलैंड को अमेरिकी आधारों से बचाव की जरूरत है।
यूरोपीय प्रतिक्रियाएं: फ्रांस और जर्मनी की योजना
फ्रांस के विदेश मंत्री ने कहा कि वे सहयोगियों के साथ योजना बना रहे हैं, यदि अमेरिका आगे बढ़ा तो। जर्मनी और पोलैंड के मंत्री बैठक कर रहे हैं। EU ने इसे “नाटो के भविष्य के लिए खतरा” बताया। ब्रूगेल थिंक टैंक ने कहा कि यूरोप को ग्रीनलैंड और डेनमार्क का समर्थन करना चाहिए। फ्रांस ने “सैन्य सहयोग” का सुझाव दिया, जबकि ऑस्ट्रिया ने अमेरिकी आधारों को जब्त करने की धमकी दी। यह EU की एकता को चुनौती दे रहा है, क्योंकि कुछ देश (जैसे यूक्रेन समर्थक) अमेरिका पर निर्भर हैं। यूक्रेन युद्ध ने ईयू को सतर्क बनाया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट किया कि यूरोपीय नेता निजी तौर पर क्रोधित हैं, और यह नाटो को तोड़ सकता है। CBC न्यूज ने Greenland को “नाटो तोड़ने वाला द्वीप” कहा।
ईयू एकता पर प्रभाव
यह धमकी EU की एकता को चुनौती दे रही है। जहां फ्रांस और जर्मनी मजबूत प्रतिक्रिया चाहते हैं, वहीं अन्य देश (जैसे पूर्वी यूरोपीय) अमेरिका से डरते हैं। चैथम हाउस ने कहा कि यूरोप के पास लीवरेज है, जैसे व्यापार प्रतिबंध। यदि अमेरिका सैन्य कार्रवाई करता है, तो नाटो टूट सकता है, क्योंकि डेनमार्क नाटो सदस्य है। ट्रंप ने नाटो से निकलने की धमकी दी, जो रूस को लाभ पहुंचाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह “गैंगस्टर” रणनीति है, जो अमेरिकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही है।
Greenland के नेता ने ट्रंप से धमकियां बंद करने की अपील की। 85% ग्रीनलैंडवासी अमेरिकी कब्जे के खिलाफ हैं।
निष्कर्ष: संभावित परिणाम
यह संकट अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदल सकता है। यदि अमेरिका पीछे हटता है, तो यह वार्ता से हल हो सकता है, लेकिन सैन्य कार्रवाई से नाटो टूट सकता है और ईयू विभाजित हो सकता है। यूरोप को अपनी रक्षा मजबूत करनी होगी। ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति सहयोगियों को अलग कर रही है, जो वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है। ग्रीनलैंड के लोग और डेनमार्क इसका केंद्र हैं, जिनकी इच्छा का सम्मान होना चाहिए। यह घटना दिखाती है कि शक्ति की राजनीति अभी भी जीवित है, और EU को एकजुट रहना होगा।
Sources: रॉयटर्स, न्यू यॉर्क टाइम्स, सीबीसी