4 जनवरी 2026, IRCTC घोटाले में लालू प्रसाद यादव की दिल्ली हाईकोर्ट में अपील: राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के संरक्षक और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने IRCTC होटल घोटाले में ट्रायल कोर्ट के चार्ज फ्रेमिंग के फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की है। यह अपील राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है, क्योंकि यह लालू परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की लंबी कानूनी लड़ाई का एक और मोड़ है। हाईकोर्ट में जस्टिस स्वरना कांता शर्मा की बेंच सोमवार, 5 जनवरी को इसकी सुनवाई करेगी। आरजेडी इसे राजनीतिक साजिश बता रही है, जबकि विपक्षी दल इसे जवाबदेही की मिसाल मान रहे हैं। इस रिपोर्ट में हम इस मामले की पृष्ठभूमि, कानूनी पहलुओं, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
मामले की पृष्ठभूमि: रेल मंत्रालय में कथित सौदेबाजी
IRCTC घोटाला 2004-2009 के दौर से जुड़ा है, जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के अनुसार, रांची और पुरी में IRCTC के दो होटलों के किराए पर अनियमितताओं से यह मामला शुरू हुआ। आरोप है कि इन होटलों को सुजाता होटल्स नामक निजी कंपनी को टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी करके लीज पर दिया गया। बदले में, लालू परिवार से जुड़ी कंपनी एके होस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड को दिल्ली और पटना में प्राइम लोकेशन पर जमीनें सस्ते दामों पर हस्तांतरित की गईं। इन जमीनों की बाजार मूल्य करोड़ों रुपये था, लेकिन डील में इन्हें नाममात्र के भाव पर ट्रांसफर किया गया।
CBI ने 2017 में इसकी एफआईआर दर्ज की, जो चारा घोटाले और लैंड-फॉर-जॉब्स जैसे अन्य मामलों की तर्ज पर आधारित थी। जांच एजेंसी का दावा है कि यह सौदा ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ का उदाहरण था, जिसमें सार्वजनिक धन का नुकसान हुआ। 2023 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए लालू, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी यादव और अन्य 14 लोगों को समन जारी किया। विशेष सीबीआई जज विशाल गोग्ने ने 13 अक्टूबर 2025 को चार्ज फ्रेमिंग का आदेश दिया, जिसमें लालू पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत भ्रष्टाचार, IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश) और 420 (धोखाधड़ी) के आरोप लगाए गए। राबड़ी और तेजस्वी पर साजिश और धोखाधड़ी के आरोप हैं। कोर्ट ने कहा कि टेंडर प्रक्रिया में ‘मटेरियल मॉडिफिकेशंस’ हुए और जमीनों का मूल्यांकन कम करके लालू परिवार को फायदा पहुंचाया गया।
ट्रायल कोर्ट का फैसला लालू परिवार के लिए झटका था, क्योंकि इससे पहले वे कई बार जांच को राजनीतिक बताकर टालते रहे। जज गोग्ने ने अपने आदेश में कहा, “यह साजिश कई छोटी साजिशों का समूह हो सकती है, जिसमें लालू प्रसाद पूरी तरह जागरूक थे और प्रक्रिया को प्रभावित करने में शामिल रहे।” कोर्ट ने सार्वजनिक खजाने को हुए नुकसान को ‘प्राइमा फेसी फ्रॉड’ करार दिया। लालू की कानूनी टीम ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के पास जरूरी सैंक्शन्स (अनुमतियां) नहीं हैं और आरोपों में कोई ठोस सबूत नहीं है।
अपील के मुख्य तर्क: राजनीतिक साजिश या कानूनी खामी?
दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका में लालू के वकील ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करने की मांग की है। उनका कहना है कि CBI की जांच पक्षपाती थी और सबूतों की कमी के बावजूद चार्ज फ्रेम किए गए। याचिका में जोर दिया गया कि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी थी और जमीन डील वैध थी। आरजेडी नेता मानते हैं कि यह मामला बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले (2025) उछाला गया ताकि लालू परिवार की छवि खराब हो। तेजस्वी यादव ने अक्टूबर 2025 में चार्ज फ्रेमिंग पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “पिताजी को मैनेजमेंट गुरु कहा जाता है, लेकिन भाजपा उन्हें भ्रष्ट बताकर राजनीतिक बदला ले रही है।”
इस अपील का महत्व इसलिए भी है क्योंकि लालू पहले ही चारा घोटाले में सजा काट चुके हैं। 2013 से 2022 तक वे कई मामलों में दोषी ठहराए गए, लेकिन मेडिकल ग्राउंड पर जमानत पर बाहर हैं। आईआरसीटीसी केस लैंड-फॉर-जॉब्स स्कैम से जुड़ा माना जाता है, जहां रेलवे नौकरियों के बदले जमीनें ली गईं। एडवांस्ड जांच एजेंसियों ने 2025 में इन मामलों में चार्जशीट दाखिल कर ट्रायल तेज करने का दावा किया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: साजिश vs जवाबदेही
RJD ने अपील को ‘लोकतंत्र की जीत’ बताया। पार्टी प्रवक्ता मनीष यादव ने कहा, “यह भाजपा की साजिश है, जो विपक्ष को दबाने के लिए एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। हाईकोर्ट सच्चाई सामने लाएगा।” बिहार में महागठबंधन के सहयोगी कांग्रेस ने भी समर्थन जताया, इसे ‘केंद्रीय सत्ता के दुरुपयोग’ का उदाहरण बताया। दूसरी ओर, भाजपा ने लालू पर हमला बोला। बिहार भाजपा अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने ट्वीट किया, “लालू जी की अपील उनकी पुरानी आदत है—कानून से भागना। जनता को भ्रष्टाचार का जवाब चाहिए।”
यह मामला बिहार की राजनीति को प्रभावित कर सकता है, जहां लालू अभी भी प्रभावशाली हैं। 2025 चुनावों में आरजेडी की हार के बाद यह अपील परिवार की छवि सुधारने का प्रयास माना जा रहा है। एनडीए सरकार इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का हिस्सा बता रही है, जबकि विपक्ष इसे ‘इंडिया एगेंस्ट करप्शन’ का उलटा चित्रण कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का फैसला ट्रायल को रोक सकता है या तेज कर सकता है, जो लालू के राजनीतिक भविष्य को तय करेगा।
संभावित प्रभाव और निष्कर्ष
यदि हाईकोर्ट अपील खारिज करता है, तो ट्रायल कोर्ट में रोजाना सुनवाई शुरू हो जाएगी, जो लालू के लिए चुनौतीपूर्ण होगी। वहीं, यदि आदेश रद्द होता है, तो यह CBI की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करेगा। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, PC Act के तहत सैंक्शन्स की कमी एक मजबूत तर्क है, लेकिन कोर्ट के प्राइमा फेसी निष्कर्ष को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।
कुल मिलाकर, IRCTC मामला लालू प्रसाद की विरासत का आईना है—रेलवे में सुधारों के साथ भ्रष्टाचार के आरोप। यह न केवल कानूनी जंग है, बल्कि राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा भी। 5 जनवरी की सुनवाई के बाद ही स्पष्टता आएगी कि क्या यह अपील लालू की मुश्किलें कम करेगी या नई जटिलताएं पैदा करेगी। बिहार की जनता लालू को ‘मायावी’ नेता मानती है, लेकिन कानून की नजर में सब बराबर हैं।
Sources: बार एंड बेंच