2 जनवरी 2026, Ghaziabad– उत्तर प्रदेश के Ghaziabad जिले में एक वायरल वीडियो ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को एक झुग्गी-झोपड़ी इलाके में रहने वाले एक व्यक्ति की ‘राष्ट्रीयता’ जांचने के लिए मोबाइल फोन को ‘मशीन’ बताते हुए देखा जा सकता है। अधिकारी व्यक्ति को बांग्लादेशी बताकर डराने का प्रयास करते नजर आते हैं, जिससे सोशल मीडिया पर भारी विवाद छिड़ गया है। Ghaziabad पुलिस ने इस घटना की जांच शुरू कर दी है, लेकिन मामला सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन का रूप ले चुका है। यह घटना अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच आई है, जहां पुलिस की ‘रूटीन सत्यापन’ प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
घटना 23 दिसंबर 2025 को कौशांबी थाना क्षेत्र के एक झुग्गी क्लस्टर में हुई। वीडियो में इंस्पेक्टर अजय शर्मा, जो कौशांबी थाने के प्रभारी हैं, एक व्यक्ति मुहम्मद सादिक के पास पहुंचते हैं। सादिक, जो बिहार के अररिया जिले के निवासी हैं, दस्तावेज दिखाने का प्रयास करते हैं, लेकिन अधिकारी फोन को उनकी पीठ पर रखकर ‘स्कैन’ करते हैं। वीडियो में अधिकारी कहते सुनाई देते हैं, “तुम बांग्लादेशी हो? मशीन तो बांग्लादेशी दिखा रही है, है ना?” सादिक बार-बार स्पष्ट करते हैं कि वे भारतीय हैं और बिहार से हैं, लेकिन अधिकारी का यह ‘जोक’ जल्द ही धमकी में बदल जाता है। वीडियो के अंत में अन्य निवासियों को भी दस्तावेज दिखाने की चेतावनी दी जाती है, जिससे इलाके में दहशत फैल जाती है।
यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया, खासकर एक्स (पूर्व ट्विटर) पर। 1 जनवरी 2026 से अब तक लाखों व्यूज बटोर चुका यह क्लिप पुलिस की ‘तकनीकी जांच’ को लेकर मीम्स और आलोचनाओं का शिकार बना। न्यूज18 की रिपोर्टिंग के अनुसार, यह घटना एक बड़े ‘एरिया डॉमिनेशन एक्सरसाइज’ का हिस्सा थी, जिसमें रेलवे रिजर्व फोर्स (RRF) और CRPF की टीमें भी शामिल थीं। पुलिस का दावा है कि यह अभियान अवैध बांग्लादेशी नागरिकों और रोहिंग्या शरणार्थियों की पहचान के लिए चलाया जा रहा था। लेकिन वीडियो में दिखाई गई ‘मशीन’ मात्र एक साधारण स्मार्टफोन थी, जो किसी वैज्ञानिक उपकरण से कोसों दूर लगती है।
पुलिस ने घटना के बाद तत्काल प्रतिक्रिया देते हुए जांच के आदेश दिए। इंदिरापुरम सर्कल के एसीपी अभिषेक श्रीवास्तव ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, “यह कोई वैज्ञानिक डिवाइस नहीं थी। यह पुलिस की स्टाइल में पूछताछ थी, जिसे दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया। जांच पूरी होने पर उचित कार्रवाई की जाएगी।” Ghaziabad पुलिस के आधिकारिक बयान में कहा गया कि यह ‘रूटीन सिक्योरिटी प्रक्रिया’ थी, जिसमें संवेदनशील इलाकों में गश्त, दस्तावेज सत्यापन और अपराध रोकथाम शामिल है। पुलिस ने स्पष्ट किया कि अभियान का उद्देश्य नागरिकता सत्यापन नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना था। फिर भी, आलोचकों का कहना है कि ऐसी ‘ट्रिक्स’ से गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों में भय का माहौल बनता है।
जन प्रतिक्रिया तीखी रही। AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, “इस डिवाइस को पुलिस के सिर पर लगाकर देखना चाहिए कि उनके दिमाग में दिमाग है या नहीं। यह सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का स्पष्ट उदाहरण है, क्योंकि पीड़ित मुहम्मद सादिक बिहार के हैं।” ओवैसी ने इसे ‘नफरत और सांप्रदायिक’ का प्रतीक बताया। द लॉजिकल इंडियन जैसे प्लेटफॉर्म्स ने इसे ‘ओवररीच’ करार देते हुए नागरिक अधिकारों पर बहस छेड़ दी। सोशल मीडिया पर #GhaziabadCitizenshipMachine और #PoliceAccountability जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे, जहां लोग पुलिस की ‘क्रिएटिव’ तकनीकों पर व्यंग्य कस रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “मोदी है तो मुमकिन है – अब फोन से नागरिकता चेक!” वहीं, कुछ ने इसे ‘दबाव बनाने की पुरानी ट्रिक’ बताया, जो झुग्गी निवासियों को डराने के लिए इस्तेमाल होती है।
यह घटना उत्तर प्रदेश में चल रहे बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासी अभियान के संदर्भ में और भी संवेदनशील हो जाती है। पिछले कुछ महीनों में, यूपी पुलिस ने बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ ‘ऑपरेशन टॉर्च’ जैसे अभियान चलाए हैं, जिसमें हजारों लोगों के दस्तावेज सत्यापित किए गए। Ghaziabad जैसे सीमावर्ती जिलों में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से गर्म है, जहां भाजपा सरकार अवैध प्रवास को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ती है। लेकिन मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसे अभियान अक्सर गरीब मजदूरों और प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाते हैं, जो दस्तावेजों की कमी के कारण फंस जाते हैं। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, वीडियो में दिखाए गए झुग्गी निवासियों के पास पासपोर्ट जैसे दस्तावेज थे, फिर भी उन्हें संदेह की नजर से देखा गया।
वकीलों और विशेषज्ञों का मत है कि यह घटना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। पूर्व IPS अधिकारी ने कहा, “पुलिस को डराने की बजाय पारदर्शी सत्यापन प्रक्रिया अपनानी चाहिए। ऐसी घटनाएं विश्वास की कमी पैदा करती हैं।” जांच में अगर अधिकारी दोषी पाए जाते हैं, तो विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ अदालती हस्तक्षेप भी संभव है। इधर, विपक्षी दल इसे ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ बता रहे हैं, जबकि सत्ताधारी पक्ष इसे ‘रूटीन प्रक्रिया का अतिरंजन’ कह रहा है।
अंततः यह वीडियो पुलिस सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है। डिजिटल युग में, जहां सोशल मीडिया हर घटना को तुरंत उजागर कर देता है, पुलिस को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा। गाजियाबाद पुलिस ने जांच को 48 घंटों में पूरा करने का आश्वासन दिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह केवल कागजी कार्रवाई होगी या वास्तविक जवाबदेही? झुग्गी निवासियों का भय दूर करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है, ताकि कानून का राज हर नागरिक के लिए समान रहे। यह मामला न केवल गाजियाबाद तक सीमित है, बल्कि पूरे देश में नागरिकता और पहचान की बहस को नई दिशा दे सकता है।
Sources: एनडीटीवी, हिंदुस्तान टाइम्स, इंडिया टुडे,