26 दिसंबर 2025, RLM: बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल मच गई है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) से नेताओं के इस्तीफों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली इस छोटी लेकिन प्रभावशाली NDA सहयोगी संगठन से हाल ही में अनंत गुप्ता समेत कई प्रमुख नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है। ये नेता अब जनता दल (यूनाइटेड) या जदयू में शामिल होने की तैयारी में हैं, जिससे RLM में टूट की आशंकाएं गहरा गई हैं। नवंबर से चले आ रहे इस संकट ने न केवल कुशवाहा की पार्टी को कमजोर किया है, बल्कि बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले NDA गठबंधन की एकजुटता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
RLM का यह संकट नवंबर 2025 में शुरू हुआ था, जब सात वरिष्ठ नेताओं ने एक साथ इस्तीफा देकर पार्टी पर ‘परिवारवाद’ का गंभीर आरोप लगाया। इन नेताओं में पूर्व विधायक रामेश्वर शर्मा, जिला अध्यक्ष रामू पासवान और अन्य शामिल थे। उन्होंने पत्र में लिखा कि उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को बिना विधायकी के मंत्री पद पर नियुक्त कर परिवारवाद को बढ़ावा दिया, जो पार्टी के मूल सिद्धांतों—सामाजिक न्याय और कुशवाहा समाज के उत्थान—के विरुद्ध है। यह घटना पार्टी के भीतर लंबे समय से कुहरा बन चुकी असंतोष को उजागर कर गई। दीपक प्रकाश की नियुक्ति नवंबर 21, 2025 को नीतीश कुमार के नई कैबिनेट में हुई, जब बिहार विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने से पहले NDA सरकार का पुनर्गठन हुआ।
RLM की स्थापना 2016 में उपेंद्र कुशवाहा ने की थी, जब वे भाजपा से अलग होकर नई राह तलाश रहे थे। कुशवाहा, जो कभी केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं, ने कुशवाहा और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदाय को मजबूत करने का वादा किया था। 2020 के बिहार चुनावों में RLM ने NDA के साथ गठबंधन किया और चार सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन 2022 में कुशवाहा ने फिर से नीतीश कुमार के साथ हाथ मिला लिया, जब जदयू ने महागठबंधन छोड़ दिया। तब से RLM जदयू की छत्रछाया में चल रही है, लेकिन आंतरिक कलह कभी कम नहीं हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि कुशवाहा की महत्वाकांक्षा और सीमित संसाधनों ने पार्टी को कमजोर किया। नवंबर 27 को इस्तीफा देने वाले सात नेताओं ने कहा, “पार्टी अब एक परिवार की निजी संपत्ति बन गई है, जहां योग्यता का कोई स्थान नहीं।”
अब दिसंबर में यह सिलसिला तेज हो गया है। RLM के बिजनेस विंग से अनंत गुप्ता, जो पार्टी के आर्थिक मामलों के प्रभारी थे, ने 25 दिसंबर को इस्तीफा दिया। उनके साथ तीन अन्य सदस्य—राकेश कुमार, संजय सिंह और मीना देवी—भी अलग हो गए। इन नेताओं ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि वे नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जदयू में शामिल होंगे, क्योंकि वहां “सच्चा विकास और सामाजिक न्याय” की गारंटी है। अनंत गुप्ता ने कहा, “RLM में अब कोई भविष्य नहीं, हम नीतीश जी के साथ बिहार के युवाओं के लिए काम करेंगे।” यह कदम पार्टी के बिजनेस विंग को पूरी तरह विखंडित कर सकता है, जो कुशवाहा के चुनावी फंडिंग का मुख्य स्रोत था। जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इन नेताओं को पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाएंगी, खासकर आगामी लोकसभा उपचुनावों में।
इस घटनाक्रम का राजनीतिक प्रभाव गहरा है। बिहार विधानसभा चुनाव नवंबर 2025 में ही संपन्न हो चुके हैं, लेकिन 2029 के बड़े चुनावों से पहले NDA को मजबूत करने की होड़ है। RLM की कमजोरी जदयू के लिए फायदेमंद लग रही है, क्योंकि कुशवाहा समाज के वोट बैंक को सीधे अपनी जेब में डाल लिया जा सकता है। नीतीश कुमार ने हाल ही में कैबिनेट बैठक में रोजगार सृजन पर जोर दिया, जो इन नए सदस्यों को आकर्षित करने का हथियार बनेगा। लेकिन विपक्ष, खासकर RJD, इसे NDA की आंतरिक कलह बता रहा है। तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर कहा, “कुशवाहा जी की पार्टी टूट रही है, नीतीश का गठबंधन भी जल्द बिखरेगा।” दूसरी ओर, भाजपा ने चुप्पी साध रखी है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि वे कुशवाहा को संभालने की कोशिश कर रहे हैं।
उपेंद्र कुशवाहा ने इस्तीफों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “ये लोग व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के शिकार हैं। RLM मजबूत है और NDA का अभिन्न अंग बनी रहेगी।” लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं। पार्टी के पास अब सिर्फ दो विधायक बचे हैं, और सदस्यता में 30% की गिरावट आई है। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. राजीव रंजन कहते हैं, “यह RLM का अस्तित्व का संकट है। कुशवाहा को या तो गठबंधन तोड़ना पड़ेगा या विलय का रास्ता अपनाना।” जदयू में शामिल होने वाले नेताओं को OBC विंग में जगह मिल सकती है, जो बिहार के ग्रामीण इलाकों में वोट जुटाने में मददगार होगा।
महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठे हैं। इस्तीफा देने वाली मीना देवी ने कहा कि पार्टी में महिलाओं को कभी प्राथमिकता नहीं मिली। यह घटना बिहार की छोटी पार्टियों के लिए सबक है—गठबंधन राजनीति में स्वतंत्र पहचान बनाए रखना मुश्किल है। कुल मिलाकर, RLM का यह संकट बिहार की सियासत को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। नीतीश कुमार की रणनीति सफल लग रही है, लेकिन कुशवाहा का अगला कदम तय करेगा कि NDA कितना मजबूत रहेगा। बिहार के युवा मतदाता अब देख रहे हैं कि कौन सा गठबंधन वास्तव में उनका भविष्य सुरक्षित करेगा।
Sources: टाइम्स ऑफ़ इंडिया