23 दिसंबर 2025, China: अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की एक गोपनीय ड्राफ्ट रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि चीन ने अपनी तीन नई साइलो फील्ड्स में 100 से अधिक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (आईसीबीएम) तैनात कर दी हैं। यह कदम चीन की तेजी से बढ़ती न्यूक्लियर क्षमता का संकेत देता है, जो वैश्विक शक्ति संतुलन को बिगाड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, ये मिसाइलें मंगोलिया की सीमा के पास उत्तरी China के साइलो क्षेत्रों में लोड की गई हैं, और इनमें मुख्य रूप से सॉलिड-फ्यूल्ड डीएफ-31 आईसीबीएम शामिल हैं। यह खुलासा अमेरिका-चीन तनाव के बीच आया है, जहां बीजिंग ने हथियार नियंत्रण वार्ताओं में कोई रुचि नहीं दिखाई है। क्या यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में नई सैन्य दौड़ की शुरुआत है? इस विशेष रिपोर्ट में हम इस मुद्दे के हर पहलू को विस्तार से समझेंगे।
पेंटागन रिपोर्ट की मुख्य बातें: 100+ आईसीबीएम की तैनाती
पेंटागन की इस ड्राफ्ट रिपोर्ट, जो रॉयटर्स को लीक हुई है, में कहा गया है कि China ने अपनी नवीनतम साइलो फील्ड्स—हामी (झिंजियांग), ह्वानान (गांसू) और लुकुनशान (शांक्सी)—में कम से कम 100 आईसीबीएम लोड कर दिए हैं। ये साइलो फील्ड्स 2021 से निर्माणाधीन थे और अब पूरी तरह कार्यरत हो चुके हैं। प्रत्येक साइलो फील्ड में सैकड़ों अंडरग्राउंड साइलो हैं, जो मिसाइलों को अमेरिकी सैटेलाइट निगरानी से बचाने के लिए डिजाइन किए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये डीएफ-31 मिसाइलें 11,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तय कर सकती हैं और अमेरिकी महाद्वीप को निशाना बना सकती हैं।
यह तैनाती China की कुल न्यूक्लियर आर्सेनल को मजबूत करती है। 2025 के अंत तक, China के पास लगभग 600 न्यूक्लियर वारहेड्स हो सकते हैं, जो 2020 के 200 से दोगुना से अधिक है। पेंटागन के अनुमान के अनुसार, चीन की 462 आईसीबीएम लॉन्चरों में से 170 से अधिक पर मिसाइलें तैनात हैं, जो 270 से ज्यादा वारहेड्स ले जा सकती हैं। यह वृद्धि “न्यूक्लियर ट्रायड” (लैंड, एयर, सी-बेस्ड) को पूरा करने की दिशा में है, जहां सबमरीन-लॉन्च्ड आईसीबीएम भी शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये साइलो फील्ड्स “सर्वाइवेबल” हैं, अर्थात अमेरिकी पहले हमले में भी बचे रह सकते हैं, जो द्वितीयक हमले की क्षमता बढ़ाते हैं।
पृष्ठभूमि: चीन की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षा और अमेरिकी चिंताएं
China की यह तैनाती 2021 से चल रही साइलो निर्माण का परिणाम है, जब सैटेलाइट इमेजेस ने उत्तरी चीन में 300 से अधिक साइलो दिखाए थे। पेंटागन की 2024 वार्षिक रिपोर्ट में पहले ही चेतावनी दी गई थी कि चीन 2030 तक 1,000 न्यूक्लियर वारहेड्स का लक्ष्य रख रहा है। लेकिन 2025 में यह गति तेज हो गई है। फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, ये साइलो मंगोलिया सीमा के पास हैं, जो रूस के साथ निकटता को भी दर्शाता है। चीन ने आधिकारिक रूप से इनका उपयोग “पिपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स” (पीएलएआरएफ) के लिए किया है, लेकिन अमेरिका इसे “एग्रेसिव एक्सपैंशन” मानता है।
अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने कहा, “China की न्यूक्लियर बिल्ड-अप वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है।” यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब अमेरिका अपनी न्यूक्लियर क्षमता बढ़ा रहा है—2025 में बी-21 रेडर बॉम्बर और कोलंबिया-क्लास सबमरीन पर फोकस। लेकिन China ने हथियार नियंत्रण वार्ताओं को ठुकरा दिया है, जैसा कि पेंटागन ने नोट किया। बीजिंग का तर्क है कि अमेरिका की 5,000+ वारहेड्स वाली आर्सेनल के सामने यह “न्यूनतम निरोध” है।
चीनी प्रतिक्रिया: “अमेरिकी प्रोपगैंडा” का आरोप
चीनी विदेश मंत्रालय ने पेंटागन रिपोर्ट को “झूठी अफवाहें” करार दिया है। प्रवक्ता वांग वेनबिन ने ग्लोबल टाइम्स को दिए बयान में कहा, “यह अमेरिकी प्रोपगैंडा है जो चीन को बदनाम करने का प्रयास है। हमारी न्यूक्लियर नीति रक्षात्मक है और हम कभी पहले हमला नहीं करेंगे।” चीन ने जोर दिया कि साइलो फील्ड्स पारदर्शी हैं और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए खुले हैं, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रतिक्रिया बीजिंग की रणनीति का हिस्सा है—अंदरूनी प्रचार को मजबूत रखना।
रूस ने भी समर्थन जताया, कहते हुए कि “नाटो की आक्रामकता” के कारण चीन को मजबूत होना पड़ रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने चिंता जताई कि यह न्यूक्लियर हथियारों की होड़ को बढ़ावा देगा।
वैश्विक प्रभाव: एशिया में तनाव बढ़ा
यह तैनाती ताइवान, दक्षिण चीन सागर और भारत सीमा पर तनाव को बढ़ाती है। पेंटागन के अनुसार, चीन 2027 तक ताइवान पर आक्रमण की तैयारी कर रहा है, और ये आईसीबीएम अमेरिकी हस्तक्षेप को रोकने के लिए हैं। भारत के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि डीएफ-31 मिसाइलें दिल्ली को निशाना बना सकती हैं। क्वाड (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) ने हाल ही में संयुक्त अभ्यास बढ़ाए हैं। यूरोपीय संघ ने भी चेतावनी दी कि चीन की वृद्धि यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक अस्थिरता बढ़ाएगी।
विश्लेषणकारों का कहना है कि साइलो फील्ड्स “स्पॉइलर” रोल निभाएंगे—अमेरिकी मिसाइल डिफेंस को भेदने के लिए। लेकिन लागत अधिक है: प्रत्येक साइलो का निर्माण 1 करोड़ डॉलर से ऊपर। चीन की अर्थव्यवस्था पर दबाव के बावजूद, शी जिनपिंग की “विश्व स्तरीय सैन्य” नीति इसे प्राथमिकता दे रही है।
निष्कर्ष: शांति के लिए वार्ता जरूरी
पेंटागन रिपोर्ट चीन की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षा को उजागर करती है, जो शीत युद्ध जैसी दौड़ को जन्म दे सकती है। लेकिन द्विपक्षीय वार्ता ही समाधान है। अमेरिका को चीन को न्यूक्लियर टेबल पर लाना चाहिए, जैसा कि रूस के साथ हुआ। हमारा मानना है कि एशिया की शांति के लिए पारदर्शिता और विश्वास निर्माण आवश्यक है। क्या 2026 में नई वार्ताएं होंगी? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल, वैश्विक सुरक्षा पर बादल मंडरा रहे हैं।
Sources: फॉक्स न्यूज