22 दिसंबर 2025, Rajya Sabha: बिहार की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) के संस्थापक जीतन राम मांझी ने Rajya Sabha सीटों के बंटवारे को लेकर एनडीए गठबंधन पर भारी उंगली उठाई है। रविवार को गया में आयोजित एक पार्टी कार्यक्रम में मांझी ने साफ धमकी दी कि अगर उनकी पार्टी को Rajya Sabha की एक सीट नहीं मिली तो वे न केवल केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा दे देंगे, बल्कि एनडीए से भी अलग हो जाएंगे। यह बयान बिहार में अप्रैल 2026 में खाली हो रही पांच Rajya Sabha सीटों के बीच आया है, जहां बीजेपी और जेडीयू को दो-दो सीटें मिलने की चर्चा है, जबकि मांझी की पार्टी को दरकिनार कर दिया गया लगता है। मांझी का यह बगावती तेवर न केवल गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एनडीए के लिए खतरे की घंटी भी बजा रहा है।
जीतन राम मांझी बिहार की राजनीति के एक ऐसे दिग्गज हैं, जिन्होंने दल-बदल की राजनीति में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। 2014 में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में मुख्यमंत्री बने मांझी को नीतीश ने ही कुर्सी से हटाया था, जिसके बाद उन्होंने अपना अलग दल हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) गठित किया। 2020 में एचएएम ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया और 2024 लोकसभा चुनावों में एक सीट हासिल की, जहां मांझी खुद गAYA से सांसद बने। वर्तमान में वे नरेंद्र मोदी सरकार में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्री हैं, जबकि उनके बेटे संतोष सुमन नीतीश कुमार सरकार में मंत्री हैं। एचएएम मुख्य रूप से महादलित समुदाय के वोट बैंक पर निर्भर है, जो बिहार की सियासत में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। लेकिन मांझी का तर्क है कि गठबंधन में उनकी पार्टी को हमेशा ठगा गया है।
कार्यक्रम में मांझी ने कहा, “2024 लोकसभा चुनावों के दौरान हमें दो लोकसभा सीटें और एक Rajya Sabha सीट का वादा किया गया था। हमने एक लोकसभा सीट जीती, जिसके लिए हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभारी हैं, जिन्होंने मुझे कैबिनेट में स्थान दिया। लेकिन Rajya Sabha सीट का वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ।” उन्होंने टीवी चैनलों का हवाला देते हुए कहा, “समाचारों में दिखाया जा रहा है कि अप्रैल 2026 में खाली हो रही पांच राज्यसभा सीटों में से दो बीजेपी को, दो जेडीयू को और एक लोजपा (राम विलास) को मिलेंगी, लेकिन एचएएम कहां है?” मांझी ने साफ शब्दों में चेतावनी दी, “अगर हमारी मांग पूरी नहीं हुई तो मैं कैबिनेट छोड़ दूंगा और अलग रास्ता अख्तियार कर लूंगा।” उन्होंने अपने बेटे संतोष सुमन को भी सलाह दी, “राजनीति में जोखिम लो, हार मत मानो।” यह बयान न केवल Rajya Sabha सीटों का मुद्दा है, बल्कि गठबंधन में छोटे दलों की उपेक्षा का प्रतीक बन गया है।
बिहार से Rajya Sabha की पांच सीटें अप्रैल 2026 में खाली हो रही हैं, जिनमें से तीन वर्तमान में NDA के पास हैं और दो RJD के। विधान परिषद चुनाव प्रणाली के तहत ये सीटें विधायकों के वोटों से भरी जाती हैं। एनडीए की वर्तमान विधानसभा में बहुमत होने से चार सीटें पक्की मानी जा रही हैं, जबकि पांचवीं पर AIMIM जैसे दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। लेकिन सीट बंटवारे में HAM को नजरअंदाज करने से मांझी नाराज हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद अक्टूबर 2025 में मांझी द्वारा विधानसभा चुनावों के लिए 15 सीटों की मांग से जुड़ा है, जहां उन्होंने कहा था, “हमें मान्यता चाहिए, सत्ता नहीं।” अगर मांझी अलग होते हैं, तो महादलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा एनडीए से खिसक सकता है, जो 2025 के विधानसभा चुनावों में भारी पड़ सकता है।
यह पहली बार नहीं है जब मांझी ने विवादास्पद बयानों से सुर्खियां बटोरी हैं। हाल ही में उन्होंने 2020 विधानसभा चुनावों में वोट धांधली का दावा किया, कहा कि उन्होंने गया के तत्कालीन डीएम अभिषेक सिंह से मदद मांगी थी ताकि उनका उम्मीदवार हार से जीत जाए। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, “2025 चुनाव में हारने वाले को मुझसे संपर्क करना चाहिए, मैं फिर डीएम से कह दूंगा।” विपक्ष ने इसे ‘वोट चोरी’ का सबूत बताते हुए हंगामा मचाया, जिसके बाद मांझी ने सफाई दी कि उनका मतलब वोटों की गिनती से था। इसके अलावा, उन्होंने सांसदों-विधायकों द्वारा विकास निधि से कमीशन लेने की बात कही और बेटे को सलाह दी, “5 करोड़ की निधि से 40 पैसे भी लो, लाखों कमा लो और पार्टी को मजबूत करो।” बाद में उन्होंने मीडिया पर दोष मढ़ा। ये बयान बीजेपी के लिए शर्मिंदगी का सबब बने, क्योंकि NDA की छवि पर बट्टा लग रहा है।
NDA नेताओं की ओर से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सियासी गलियारों में हलचल तेज है। जेडीयू के एक नेता ने निजी तौर पर कहा, “मांझी की मांग जायज है, लेकिन सीटें सीमित हैं। बातचीत से हल निकलेगा।” वहीं, विपक्षी आरजेडी ने मौके का फायदा उठाया। नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया, “NDA में दरार साफ दिख रही है। नीतीश-मोदी का गठबंधन टूटने की कगार पर।” कांग्रेस और अन्य दलों ने भी इसे ‘गठबंधन का अंत’ बताया। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. राजीव रंजन कहते हैं, “मांझी जैसे छोटे नेता गठबंधन की जान होते हैं। उनकी नाराजगी को नजरअंदाज करना एनडीए के लिए महंगा साबित हो सकता है, खासकर जब बिहार में जातिगत समीकरण संवेदनशील हैं।”
यह विवाद बिहार की सियासत को नई दिशा दे सकता है। अगर मांझी NDA छोड़ते हैं, तो HAM विपक्ष की ओर रुख कर सकता है या तीसरा मोर्चा गठित कर सकता है। इससे महादलित, मुस्लिम और अन्य पिछड़ों के वोट बंट सकते हैं। दूसरी ओर, अगर बीजेपी उनकी मांग मान लेती है, तो अन्य छोटे सहयोगी जैसे चिराग पासवान की लोजपा भी दबाव बढ़ा सकती है। मांझी का बयान न केवल Rajya Sabha का मुद्दा है, बल्कि गठबंधन में समानता और वादा निभाने की राजनीति का आईना भी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री मोदी को अब जल्दी हस्तक्षेप करना होगा, वरना 2025 चुनावों से पहले एनडीए की नींव हिल सकती है। मांझी की यह जंग ‘पहाड़ी राजा’ की तरह जारी रहेगी, जो कभी झुकता नहीं।