18 दिसंबर 2025, बिहार के ग्रामीण लोकतंत्र को नई ऊर्जा मिलने वाली है। राज्य निर्वाचन आयुक्त (SEC) ने स्पष्ट घोषणा की है कि आगामी पंचायत चुनाव दिसंबर 2026 से पहले अनिवार्य रूप से संपन्न करा लिए जाएंगे। यह फैसला बिहार पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप है, जहां वर्तमान पंचायतों का कार्यकाल दिसंबर 2026 से पूर्व समाप्त हो जाएगा। SEC के इस बयान से राजनीतिक दलों में हलचल मच गई है, क्योंकि यह चुनाव स्थानीय स्तर पर सत्ता संतुलन बदल सकता है। बिहार में 8,391 ग्राम पंचायतें, 534 पंचायत समितियां और 39 जिला परिषदें हैं, जो करोड़ों ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस रिपोर्ट में हम इस घोषणा के कारणों, तैयारी, राजनीतिक प्रभावों, आरक्षण नीति और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह चुनाव न केवल ग्रामीण विकास को गति देगा, बल्कि बिहार सरकार की ‘सात निश्चय’ योजनाओं को भी मजबूत करेगा।
पृष्ठभूमि: देरी का इतिहास और कानूनी बाध्यता
बिहार में पंचायत चुनावों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। अंतिम पंचायत चुनाव 2021 में तीन चरणों में संपन्न हुए थे, लेकिन कोविड-19 महामारी और कानूनी विवादों के कारण इसमें देरी हुई। इससे पहले 2016 में हुए चुनावों का कार्यकाल 2021 में समाप्त होना था। संविधान के अनुच्छेद 243E के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है, और इसका विस्तार केवल आपात स्थिति में संभव है। SEC ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान कार्यकाल दिसंबर 2026 से पहले समाप्त हो जाएगा, इसलिए चुनावों को समय पर कराना कानूनी बाध्यता है।
राज्य निर्वाचन आयुक्त हरि प्रसाद शर्मा ने 17 दिसंबर 2025 को पटना में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “चुनावों की तिथियां पंचायती राज अधिनियम के अनुसार तय होंगी। कोई देरी नहीं होगी, और सभी प्रशासनिक तैयारियां पहले से शुरू हो चुकी हैं।” यह घोषणा उन अफवाहों को विराम देगी जो कह रही थीं कि चुनाव 2027 तक टल सकते हैं। बिहार में पंचायत चुनाव स्थानीय शासन की रीढ़ हैं, जहां 1.3 करोड़ से अधिक मतदाता भाग लेते हैं। पिछले चुनावों में 70% से अधिक मतदान हुआ था, जो ग्रामीण जागरूकता को दर्शाता है। लेकिन हिंसा और धांधली के आरोपों ने हमेशा विवाद पैदा किया है। SEC ने इस बार ई-वोटिंग और सख्त निगरानी की योजना बनाई है।
घोषणा का विवरण: समयसीमा, चरण और तैयारी
SEC की घोषणा के अनुसार, चुनाव दिसंबर 2026 से पहले, संभवतः जून-नवंबर 2026 के बीच तीन से चार चरणों में होंगे। प्रारंभिक तैयारी में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शामिल है, जिसकी समयसीमा को सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में बढ़ा दिया। बिहार में SIR 2.0 अभियान चल रहा है, जिसमें 2 करोड़ नए वोटर जोड़े जा चुके हैं। SEC ने निर्देश दिया है कि 18-19 वर्ष के युवा वोटरों को प्राथमिकता दी जाए।
चुनाव प्रक्रिया में आरक्षण एक प्रमुख मुद्दा होगा। पंचायती राज अधिनियम के तहत, ग्राम पंचायत मुखिया पदों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण, SC/ST के लिए जनसंख्या अनुपात में आरक्षण और OBC के लिए 18% सीटें आरक्षित होंगी। SEC ने कहा कि आरक्षण लॉटरी से तय होगा, और इसका नोटिफिकेशन मार्च 2026 तक जारी हो जाएगा। कुल मिलाकर, 1.5 लाख से अधिक पदों पर चुनाव होंगे, जिसमें 20,000 मुखिया, 5,000 पंचायत समिति सदस्य और 1,000 जिला परिषद सदस्य शामिल हैं।
तैयारी के मोर्चे पर, SEC ने जिला प्रशासनों को निर्देश दिए हैं कि मतदान केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए—वर्तमान 70,000 से 80,000 तक। ईवीएम की खरीद और प्रशिक्षण पर 100 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। इसके अलावा, कोड ऑफ कंडक्ट का सख्त पालन सुनिश्चित करने के लिए मॉडल कोड लागू होगा, जिसमें प्रचार पर खर्च सीमा 5 लाख रुपये तक होगी। SEC की वेबसाइट sec.bihar.gov.in पर सभी अपडेट उपलब्ध होंगे।
राजनीतिक प्रभाव: दलों के बीच जंग तेज
यह घोषणा बिहार की राजनीति को हिला देगी। सत्ताधारी NDA (BJP-JDU) इसे अपनी मजबूती के रूप में देख रही है, जबकि विपक्षी महागठबंधन (RJD-Congress) इसे चुनौती मान रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, “पंचायत चुनाव ग्रामीण विकास का आधार हैं, और हमारी सरकार ‘सात निश्चय’ के तहत बुनियादी ढांचे पर काम कर रही है।” वहीं, RJD नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया, “SEC की घोषणा स्वागतयोग्य है, लेकिन सरकार को पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। पिछले चुनावों में धांधली हुई थी।”
BJP ने अपनी रणनीति में स्थानीय नेताओं को मजबूत करने का फैसला लिया है, जबकि JDU पंचायत स्तर पर महिला सशक्तिकरण पर फोकस करेगी। विपक्ष का आरोप है कि आरक्षण में हेरफेर हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव 2029 विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल साबित होगा। ग्रामीण मुद्दे जैसे बाढ़, बेरोजगारी और सड़कें प्रमुख होंगे। पिछले पंचायत चुनावों में NDA ने 60% सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार युवा मतदाताओं का प्रभाव बढ़ेगा।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव: ग्रामीण सशक्तिकरण का अवसर
पंचायत चुनाव ग्रामीण भारत की आवाज हैं। बिहार में 90% आबादी ग्रामीण है, और पंचायतें MGNREGA, PMAY और स्वच्छ भारत जैसी योजनाओं का क्रियान्वयन करती हैं। SEC की समयसीमा से ग्रामीण विकास परियोजनाओं में गति आएगी। महिलाओं के लिए 50% आरक्षण से 75,000 महिला प्रतिनिधि चुनी जाएंगी, जो लिंग समानता को बढ़ावा देगा। SC/ST समुदायों के लिए आरक्षण सामाजिक न्याय सुनिश्चित करेगा।
आर्थिक रूप से, चुनाव से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बूस्ट मिलेगा—प्रचार, सामग्री खरीद और श्रमिक रोजगार से। लेकिन चुनौतियां भी हैं: नक्सल प्रभावित क्षेत्रों जैसे औरंगाबाद और गया में सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। SEC ने CRPF की सहायता मांगी है। पर्यावरणीय दृष्टि से, चुनावों में हरित प्रचार को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
विशेषज्ञों की राय: अवसर और सावधानियां
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. राजेश कुमार कहते हैं, “यह घोषणा स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करेगी, लेकिन पारदर्शिता जरूरी है। SIR अभियान से युवा भागीदारी बढ़ेगी।” वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता मीरा सिंह का मत है कि महिलाओं को प्रशिक्षण देकर सशक्त बनाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने SIR की समयसीमा बढ़ाने का आदेश देकर चुनावी प्रक्रिया को सहज बनाया है।
भविष्य की राह: चुनौतियां और समाधान
चुनौतियों में मतदाता जागरूकता, धांधली रोकना और डिजिटल विभाजन शामिल हैं। SEC ने मोबाइल ऐप और SMS अलर्ट की योजना बनाई है। यदि समय पर चुनाव हुए, तो बिहार का ग्रामीण विकास मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर उदाहरण बनेगा। 2026 के अन्य चुनावों (केरल, तमिलनाडु) के साथ बिहार का यह चुनाव राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करेगा।
निष्कर्ष: लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होंगी
राज्य निर्वाचन आयुक्त की यह घोषणा बिहार के पंचायत चुनावों को समयबद्ध बनाने का संकल्प है। दिसंबर 2026 से पहले होने वाले ये चुनाव ग्रामीण सशक्तिकरण का प्रतीक बनेंगे। राजनीतिक दलों को मुद्दों पर फोकस करना चाहिए, न कि सत्ता की जंग पर। SEC की सक्रियता सराहनीय है, और यदि पारदर्शी अमल हुआ, तो बिहार का लोकतंत्र नई ऊंचाइयों को छुएगा। ग्रामीण बिहार की आवाज अब मजबूत होगी—यह चुनाव उसकी जीत का अवसर है।