17 दिसंबर 2025, Purnia: बिहार के सीमांचल क्षेत्र में सामाजिक सद्भाव और गरीबों की मदद का एक जीवंत उदाहरण रविवार को पूर्णिया शहर में देखने को मिला। शेख जकरिया फलाहे उम्मत फाउंडेशन के बैनर तले आयोजित निशुल्क सामूहिक निकाह समारोह में नौ मुस्लिम जोड़ियों ने इस्लामी रीति-रिवाजों के साथ एक-दूसरे का हाथ थामा। यह आयोजन न केवल गरीबी की बेड़ियों को तोड़ने का माध्यम बना, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी। सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में संपन्न यह समारोह, जो 2008 से चली आ रही परंपरा का 16वां संस्करण था, ने समाज को प्रेम, सहयोग और समावेशिता का संदेश दिया। फाउंडेशन ने न केवल विवाह की सभी व्यवस्थाएं संभालीं, बल्कि नवविवाहित जोड़ों को जरूरी सामान भी प्रदान किया, जिससे यह कार्यक्रम एक सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया।
इस समारोह की शुरुआत सुबह 9 बजे हुई, जब दुल्हनें अलग-अलग कमरों में सजने-संवरने के लिए तैयार की गईं। स्थान के रूप में चुना गया झंडा चौक लाइन बाजार स्थित एक विशाल विवाह भवन, जहां मंडप सजाया गया था। हल्के हरे रंग की सजावट, फूलों की मालाओं और कुरान की आयतों से सजा माहौल धार्मिक आस्था और खुशी का संगम था। काजी साहब की अगुवाई में, गवाहों और वकीलों की उपस्थिति में प्रत्येक निकाह की रस्म अदा की गई। “कबूल है” के तीन बार उच्चारण के साथ हर जोड़े का बंधन पक्का हुआ, और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा भवन गूंज उठा। आयोजकों ने सुनिश्चित किया कि हर रस्म इस्लामी परंपराओं के अनुरूप हो—महिर की राशि तय करना, दान का वितरण और दुआओं का सिलसिला।
समारोह की खासियत रही दुल्हनों के लिए विशेष व्यवस्था। गरीब परिवारों से चयनित इन लड़कियों को न केवल शादी के कपड़े, आभूषण और मेकअप प्रदान किया गया, बल्कि उनकी मांगों का भी ख्याल रखा गया। एक दुल्हन, फातिमा खातून (नाम परिवर्तित), ने बताया, “हमारा परिवार इतना गरीब था कि शादी का खर्च उठाना असंभव था। फाउंडेशन ने हमें नई जिंदगी दी। आज हमारा निकाह पूरे सम्मान के साथ हुआ, और हमें घरेलू सामान भी मिला। अल्लाह का शुक्र है।” इसी तरह, दूल्हा मोहम्मद सलीम ने कहा, “यह सिर्फ शादी नहीं, बल्कि समाज की एकजुटता का प्रमाण है। हिंदू भाई-बहनों का आशीर्वाद हमें और मजबूत बनाता है।”
निकाह के बाद का दौर सबसे भावुक रहा। प्रत्येक जोड़े को एक पलंग, ट्रंक, अलमारी, बर्तन, बिस्तर, कपड़े और अन्य जरूरी सामान भेंट किया गया। फाउंडेशन के सचिव, मौलाना अब्दुल्लाह ने बताया, “हमारा उद्देश्य गरीब बेटियों को दहेज के बोझ से मुक्त करना है। हर साल हम 5 से 10 जोड़ों का चयन करते हैं, और यह सब दानदाताओं के सहयोग से संभव होता है। इस बार नौ जोड़ों को 2 लाख रुपये मूल्य का सामान दिया गया।” भोज की व्यवस्था भी सराहनीय रही—शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थाली, जिसमें बिरयानी, कबाब, सब्जी और मिठाई शामिल थी। सैकड़ों मेहमानों ने इसमें हिस्सा लिया, जो न केवल मुस्लिम समुदाय से थे, बल्कि हिंदू पड़ोसी, स्थानीय नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए। एक हिंदू बुजुर्ग, रामेश्वर प्रसाद, ने कहा, “यह समारोह साबित करता है कि धर्म की दीवारें तोड़कर हम एक परिवार हैं। इन जोड़ों को हमारा आशीर्वाद।”
फाउंडेशन का इतिहास प्रेरणादायक है। 2008 में शेख जकरिया के नेतृत्व में स्थापित यह संस्था पूर्णिया की पहली ऐसी मुस्लिम संगठन है, जो गरीब लड़कियों का निकाह पूरे रीति-रिवाज से कराती है। शुरुआती दिनों में छोटे स्तर पर शुरू हुआ यह आयोजन अब 16 वर्षों में 81 जोड़ों तक पहुंच चुका है। पूर्णिया के अलावा किशनगंज, अररिया और कटिहार जैसे आसपास के जिलों से भी परिवार लाभान्वित हो चुके हैं। फाउंडेशन के अनुसार, इन विवाहों से दहेज प्रथा पर अंकुश लगा है, और लड़कियों को शिक्षा व रोजगार के अवसर मिले हैं। “हमारा मॉडल सस्टेनेबल है—स्थानीय दानदाता, सरकारी सहायता और स्वयंसेवकों की मदद से चलता है,” जकरिया साहब ने एक पुराने साक्षात्कार में कहा था। इस आयोजन ने न केवल आर्थिक राहत दी, बल्कि सामाजिक एकता को मजबूत किया। पिछले वर्षों में हिंदू संगठनों के साथ सहयोग बढ़ा है, जहां संयुक्त रूप से सामूहिक विवाह होते हैं।
यह समारोह वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में विशेष रूप से प्रासंगिक है। बिहार में जहां दहेज और बाल विवाह जैसी कुरीतियां अभी भी चुनौती हैं, ऐसे आयोजन महिलाओं के सशक्तिकरण का माध्यम बनते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, बिहार में 40% से अधिक विवाह दहेज से प्रभावित होते हैं। फलाहे उम्मत जैसे प्रयास इन आंकड़ों को बदलने की दिशा में कदम हैं। स्थानीय विधायक ने भी समारोह में पहुंचकर सराहना की, “सरकार सामूहिक विवाह को प्रोत्साहित कर रही है। यह फाउंडेशन हमारा साझेदार बने।” इसके अलावा, पर्यावरण संरक्षण का पहलू भी जोड़ा गया—प्लास्टिक मुक्त आयोजन और पौधरोपण अभियान।
समारोह का समापन दुआओं और गीतों के साथ हुआ, जहां नवविवाहित जोड़ों ने एक-दूसरे को रुखसती दी। रंग-बिरंगी साड़ियों में सजी दुल्हनें, दूल्हों के कंधे पर हाथ रखकर निकलीं, तो आंसुओं और मुस्कानों का मिश्रण था। फाउंडेशन के स्वयंसेवकों ने अंत तक हर जोड़े को सुरक्षित घर पहुंचाने की व्यवस्था की। यह दृश्य न केवल भावुक था, बल्कि आशा का संदेश देता था—कि समाज में गरीबी कोई बाधा नहीं, अगर इच्छाशक्ति हो।
इस आयोजन ने सोशल मीडिया पर भी तहलका मचा दिया। ट्विटर (अब X) पर #SamuhikNikahPurnia ट्रेंड किया, जहां हजारों यूजर्स ने शुभकामनाएं दीं। प्रभात खबर के ट्वीट को 5,000 से अधिक लाइक्स मिले, जिसमें लिखा था, “9 मुस्लिम जोड़ियों का सामूहिक निकाह, जरूरत के सामान के साथ हुई रुखसती। #Insaniyat”। इंस्टाग्राम रील्स में वायरल वीडियो ने लाखों व्यूज जुटाए, जो एकता का पैगाम फैला रहे हैं।
निष्कर्षतः यह 16वां निशुल्क सामूहिक निकाह समारोह पूर्णिया के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने वाला एक मील का पत्थर साबित हुआ। शेख जकरिया फलाहे उम्मत फाउंडेशन जैसे संगठन साबित करते हैं कि छोटे प्रयास बड़े बदलाव ला सकते हैं। आने वाले वर्षों में ऐसे आयोजनों की संख्या बढ़े, ताकि हर गरीब बेटी सम्मानपूर्वक जीवन शुरू कर सके। यह समारोह हमें याद दिलाता है—प्रेम की कोई सीमा नहीं, और एकता ही असली ताकत है। नवविवाहित जोड़ों को हार्दिक शुभकामनाएं!