16 दिसंबर 2025, New Rural Employment Scheme– भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमएनआरईजीए) को अलविदा कहने की केंद्र सरकार की कोशिश ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। लोकसभा में पेश किए गए ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025’ (वीबी-जी राम जी विधेयक) के तहत एमएनआरईजीए को समाप्त कर नई योजना लाई जा रही है। इस नई योजना का नाम ‘वीबी-जी राम जी’ रखा गया है, जिसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम पूरी तरह हटा दिया गया है। विपक्ष ने इसे गांधीजी की विरासत का अपमान बताते हुए केंद्र सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और अन्य दलों के नेताओं ने इसे ‘गरीब-विरोधी’ और ‘राजनीतिक साजिश’ करार दिया है। यह विवाद न केवल योजना के प्रावधानों पर केंद्रित है, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से गांधीवादी विचारधारा को कमजोर करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
एमएनआरईजीए, जो 2005 में यूपीए सरकार द्वारा लागू की गई थी, ने पिछले दो दशकों में करोड़ों ग्रामीण परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की है। यह कानून हर वित्तीय वर्ष में ग्रामीण परिवार के एक वयस्क सदस्य को 100 दिनों का गारंटीड रोजगार देता है। योजना के तहत केंद्र सरकार 100% मजदूरी का खर्च वहन करती है, जबकि सामग्री लागत पर राज्यों का योगदान होता है। 2024-25 में इस योजना के तहत 2.5 करोड़ से अधिक परिवारों को रोजगार मिला, और कुल व्यय 80,000 करोड़ रुपये से ऊपर रहा। यह न केवल बेरोजगारी कम करने का माध्यम बनी, बल्कि ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास में भी योगदान दिया। योजना का नाम ‘महात्मा गांधी’ रखा जाना गांधीजी के ग्राम स्वराज और अहिंसा के सिद्धांतों से प्रेरित था, जो ग्रामीण आत्मनिर्भरता पर जोर देते हैं।
अब, मोदी सरकार द्वारा लाए गए नए विधेयक में कई बदलाव प्रस्तावित हैं। योजना का दायरा बढ़ाकर 100 से 125 दिनों का रोजगार गारंटी किया गया है, जो सतह पर सकारात्मक लगता है। इसके अलावा, सार्वजनिक कार्यों पर जोर दिया गया है, जैसे जल संरक्षण, सड़क निर्माण और कृषि से जुड़े प्रोजेक्ट। हालांकि, विवादास्पद प्रावधानों में केंद्र सरकार का मजदूरी खर्च 75% तक कम करना शामिल है, जिससे राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। नए कानून में ‘मांग-आधारित’ रोजगार की बजाय ‘प्रोजेक्ट-आधारित’ कार्यों को प्राथमिकता दी गई है, जो ग्राम सभाओं की भूमिका को सीमित कर सकता है। सबसे बड़ा विवाद नाम बदलने का है। ‘वीबी-जी राम जी’ नाम में ‘राम जी’ का संकेत स्पष्ट है, जो सरकार के ‘राम राज्य’ के विजन से जुड़ा माना जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि यह जानबूझकर गांधीजी का नाम हटाकर सांस्कृतिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा करने की साजिश है।
विपक्ष का हमला तीखा और बहुआयामी रहा है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने संसद भवन के बाहर पत्रकारों से कहा, “महात्मा गांधी का नाम क्यों हटाया जा रहा है? वे दुनिया के सबसे ऊंचे नेता हैं। योजना का नाम बदलने से कार्यालयों, स्टेशनरी और प्रचार सामग्री पर अनावश्यक खर्च होगा। इससे क्या फायदा?” उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार को गांधीजी की याद दिलाने की जरूरत नहीं। प्रियंका का बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जहां लाखों यूजर्स ने #SaveGandhiName ट्रेंड चलाया।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे ‘खोखला पाखंड’ बताया। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी गांधीजी को श्रद्धांजलि देने के दिखावे करते हैं, लेकिन योजना से उनका नाम मिटा रहे हैं। यह गरीबों के अधिकारों को छीनने की साजिश है। फंड खत्म, तो अधिकार खत्म।” खड़गे ने संसदीय समिति की सिफारिशों का हवाला देते हुए कहा कि एमएनआरईजीए में 150 दिनों का रोजगार बढ़ाने और मजदूरी वृद्धि की मांग लंबित है, जबकि सरकार नाम बदलकर मुद्दे से भटका रही है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में एमएनआरईजीए फंड लंबित होने का जिक्र करते हुए उन्होंने केंद्र पर राज्य-विरोधी नीति का आरोप लगाया।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बयान में गहराई जोड़ी। उन्होंने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा, “ग्राम स्वराज और राम राज्य के आदर्श कभी प्रतिस्पर्धी नहीं थे, बल्कि गांधीजी के चेतना के दोहरे स्तंभ थे। ग्रामीण गरीबों की योजना से गांधी का नाम हटाना इस गहन समन्वय की अनदेखी है। विवाद दुर्भाग्यपूर्ण है। महात्मा की विरासत का अपमान न करें।” थरूर ने याद दिलाया कि गांधीजी का अंतिम शब्द ‘हे राम’ था, जो राम और गांधी के विचारों की एकता दर्शाता है। उन्होंने नाम बदलाव को ‘अनावश्यक’ बताते हुए कहा कि इससे योजना की पहचान प्रभावित होगी।
टीएमसी के राज्यसभा सांसद डेरिक ओ’ब्रायन ने इसे ‘महात्मा का अपमान’ कहा। उन्होंने ट्वीट किया, “ये वही लोग हैं जो गांधी हत्यारे की पूजा करते हैं। वे इतिहास से गांधी को मिटाना चाहते हैं।” ओ’ब्रायन ने योजना के वित्तीय बदलावों पर भी सवाल उठाए, कहा कि राज्यों पर बढ़ता बोझ विकास को बाधित करेगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने डीएमके के आधिकारिक हैंडल से बयान जारी कर कहा, “गांधी का नाम हटाना द्रविड़ आंदोलन के सिद्धांतों के खिलाफ है। यह गरीबों के अधिकारों को कमजोर करेगा।” अन्य विपक्षी दलों जैसे सपा, बसपा और राष्ट्रीय जनता दल ने भी एकजुट होकर विरोध जताया। सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा, “नाम बदलना सत्ता की भूख है, लेकिन ग्रामीणों का दर्द नहीं समझा।”
सरकार ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए नाम बदलाव को ‘विकास-केंद्रित’ बताया। भाजपा प्रवक्ता ने कहा, “विपक्ष को ‘राम’ शब्द से एलर्जी है। नई योजना विकसित भारत के विजन से जुड़ी है, जो सभी के लिए रोजगार बढ़ाएगी। गांधीजी की भावना बरकरार रहेगी।” ग्रामीण विकास मंत्री ने संसद में स्पष्ट किया कि 125 दिनों का रोजगार बढ़ाना गरीबों के हित में है, और केंद्र 60% फंड देगा। हालांकि, विपक्ष ने इसे ‘कागजी बदलाव’ बताया, क्योंकि राज्यों के बकाया फंड (पश्चिम बंगाल में 5,000 करोड़) अभी भी अटके हैं।
यह विवाद ग्रामीण भारत के भविष्य पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। नई योजना से रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं, लेकिन वित्तीय बोझ राज्यों को कर्जदार बना सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रोजेक्ट-आधारित मॉडल से ग्राम सभाओं की शक्ति कम होगी, जो लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को प्रभावित करेगा। राजनीतिक रूप से, यह 2026 के विधानसभा चुनावों में मुद्दा बनेगा, जहां विपक्ष गांधी की विरासत को केंद्र में रखेगा। सोशल मीडिया पर #GandhiKaNaamWapas और #MGNREGASave जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जो जनभावना को दर्शाते हैं।
निष्कर्षतः, यह विवाद केवल नाम का नहीं, बल्कि विचारधारा का है। गांधीजी के ग्रामोदय के सिद्धांत को राम राज्य के नाम पर कमजोर करने की कोशिश विपक्ष को एकजुट कर रही है। सरकार को चाहिए कि वह संवाद से मुद्दा सुलझाए, ताकि ग्रामीण कल्याण प्रभावित न हो। अन्यथा, यह ‘विकसित भारत’ के सपने को राजनीतिक कलह में बदल देगा।