IED blast in Jharkhand’s Saranda forest, 14 दिसंबर 2025: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के घने Saranda forest में रविवार को नक्सलियों द्वारा लगाए गए दो अलग-अलग आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) विस्फोटों ने सुरक्षा बलों को झकझोर दिया। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की एलीट कोबरा (कंबैट बटालियन फॉर रेसल्यूट एक्शन) 209 बटालियन के दो जवान घायल हो गए। इनमें से एक जवान की हालत गंभीर बताई जा रही है। यह घटना राज्य में चल रहे एंटी-नक्सल अभियान के बीच हुई, जब संयुक्त सुरक्षा बलों की टीम जंगल में सर्च एंड डोमिनेशन ऑपरेशन चला रही थी। सरांडा, जो लंबे समय से नक्सलियों का गढ़ रहा है, एक बार फिर हिंसा का केंद्र बन गया है, जिससे सुरक्षा व्यवस्था और नक्सल उन्मूलन अभियान पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
घटना की शुरुआत रविवार सुबह हुई, जब कोबरा 209 बटालियन की एक टीम चोटानाग्रा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले बालिबा गांव के आसपास के जंगलों में नक्सलियों की तलाशी ले रही थी। अधिकारियों के अनुसार, पहला विस्फोट दबाव-सक्रिय आईईडी के फटने से हुआ, जब टीम जंगल के घने इलाके में कंघी कर रही थी। इससे एक जवान को गंभीर चोटें आईं, जिन्हें तुरंत चाईबासा के सदर अस्पताल ले जाया गया। कुछ ही देर बाद, दूसरे आईईडी के विस्फोट से एक अन्य जवान घायल हो गया। घायलों में से एक का नाम आलख दास बताया जा रहा है, हालांकि आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है। डॉक्टरों ने बताया कि घायलों को पैरों और धड़ में चोटें आई हैं, और एक को सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। सीआरपीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “टीम सक्रिय रूप से नक्सली ठिकानों की तलाश कर रही थी। ये आईईडी नक्सलियों द्वारा पहले से लगाए गए थे, जो दबाव पड़ते ही फट जाते हैं। सौभाग्य से, कोई जानलेवा चोट नहीं लगी, लेकिन यह हमला अभियान की चुनौतियों को दर्शाता है।”
सरांडा जंगल, जो लगभग 800 वर्ग किलोमीटर में फैला है, लंबे समय से माओवादियों का मजबूत किला माना जाता है। यह क्षेत्र खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन नक्सली गतिविधियों के कारण विकास कार्य ठप पड़े हैं। पिछले कुछ महीनों में यहां कई घटनाएं हो चुकी हैं। अक्टूबर 2025 में ही दो आईईडी विस्फोटों में एक सीआरपीएफ हेड कांस्टेबल शहीद हो गए थे, जबकि दो अन्य घायल हुए थे। सितंबर 2024 में भी एक हाथी आईईडी में फंसकर मर गया था, जो नक्सलियों की क्रूरता का प्रतीक था। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2024 तक झारखंड में नक्सली हिंसा में 150 से अधिक सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं, जिनमें सरांडा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नक्सली संगठन सीपीआई (माओइस्ट) यहां ‘रेसिस्टेंस वीक’ जैसे कार्यक्रमों के दौरान हमले तेज कर देते हैं, ताकि सुरक्षा बलों का मनोबल तोड़ सकें। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी ने कहा, “ये आईईडी सस्ते और घातक हथियार हैं। नक्सली स्थानीय सामग्री से इन्हें बनाते हैं, जो जंगल की दुर्गमता का फायदा उठाते हैं।”
इस घटना के बाद सुरक्षा बलों ने अभियान को और तेज कर दिया है। चाईबासा एसएसपी ने बताया कि अतिरिक्त टीमें तैनात की गई हैं, और ड्रोन तथा स्निफर डॉग्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। केंद्र सरकार की ‘समग्र नक्सल उन्मूलन’ योजना के तहत झारखंड को विशेष फंडिंग मिल रही है, लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि विकास की कमी ही नक्सलवाद को पनपने दे रही है। आदिवासी समुदायों में बेरोजगारी और भूमि विवाद नक्सलियों को समर्थन देते हैं। एक स्थानीय निवासी ने कहा, “जंगल में स्कूल-हॉस्पिटल बनें, तो युवा नक्सलियों के चंगुल से बच सकते हैं।”
राजनीतिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं तेज हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ट्वीट कर घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की और नक्सलियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति दोहराई। विपक्षी भाजपा ने राज्य सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया, कहा कि ‘नक्सलियों को पनाह मिल रही है’। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स्थिति पर नजर रखने का आश्वासन दिया है। मानवाधिकार संगठनों ने मांग की है कि ऑपरेशनों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
यह घटना न केवल सुरक्षा बलों के लिए चुनौती है, बल्कि पूरे राज्य के विकास के लिए खतरा। सरांडा के लोहे की खदानें देश की अर्थव्यवस्था का आधार हैं, लेकिन हिंसा के कारण निवेश रुक गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जीडीपी वृद्धि राष्ट्रीय औसत से 20 प्रतिशत कम है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि आईईडी डिटेक्शन के लिए आधुनिक तकनीक जैसे ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार और स्थानीय खुफिया तंत्र को मजबूत किया जाए। साथ ही, सिविल एक्शन प्रोग्राम से ग्रामीणों को जोड़ा जाए। यदि ये कदम न उठाए गए, तो नक्सलवाद की जड़ें और गहरी हो जाएंगी।
अंत में, ये घायल जवान नक्सल उन्मूलन के सिपाही हैं, जिनकी बहादुरी पर देश गर्व करता है। सरकार को तत्काल न्याय और मजबूत रणनीति देनी होगी, ताकि सरांडा फिर से शांति का प्रतीक बने। अन्यथा, यह जंगल हिंसा का चक्र ही बना रहेगा।