Bihar Mob Lynching, 14 दिसंबर 2025: बिहार के नवादा जिले में एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 40 वर्षीय कपड़ा व्यापारी मोहम्मद अतहर हुसैन, जो नालंदा जिले के निवासी थे, को 5 दिसंबर को चोरी के संदेह में भीड़ ने पकड़ लिया। लेकिन यह केवल चोरी का मामला नहीं था—यह धार्मिक पूर्वाग्रह से प्रेरित एक क्रूर मॉब लिंचिंग का मामला साबित हुआ। पीड़ित को नंगा करके उनकी पैंट उतार ली गई, धर्म की पहचान की जांच की गई, और फिर बेरहमी से प्रताड़ित किया गया। आठ दिनों तक अस्पताल में संघर्ष करने के बाद, 13 दिसंबर की देर रात बिहारशरीफ सदर अस्पताल में उनकी मौत हो गई। यह घटना न केवल एक निर्दोष की हत्या है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन चुकी है।
घटना की शुरुआत 5 दिसंबर की सुबह हुई, जब अतहर हुसैन नवादा के रोह थाना क्षेत्र में फेरी लगाने के लिए पहुंचे थे। स्थानीय लोगों ने उन्हें चोरी के शक में घेर लिया। मृतक के भाई ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि भीड़ ने अतहर का नाम पूछा, फिर अचानक हमला बोल दिया। उन्हें एक घर में ले जाकर लोहे की रॉड, ईंट-पत्थर और लाठियों से पीटा गया। प्लायर से उनकी उंगलियां तोड़ी गईं, नाखून उखाड़े गए, कान काटने की कोशिश की गई, और गर्म रॉड से दागा गया। पेट्रोल डालकर आग लगाने की धमकी भी दी गई। अतहर ने मौत से पहले 7 दिसंबर को मीडिया को दिए बयान में कहा, “उन्होंने मेरी पैंट उतारकर चेक किया कि मैं मुस्लिम हूं या नहीं। उसके बाद सीने पर चढ़कर गला दबाया और सिर फोड़ दिया।” उनकी पत्नी शबनम ने रोते हुए कहा, “मेरे पति को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि उनका धर्म अलग था। कान काटे गए, करंट लगाया गया, और बेरहमी से पीटा गया। हम न्याय चाहते हैं।” परिवार ने मांग की है कि मृतक को 50 लाख रुपये का मुआवजा, एक सदस्य को सरकारी नौकरी, और सभी अपराधियों पर कठोर कार्रवाई हो।
पुलिस ने तत्काल कार्रवाई का दावा किया है। रोह थाना प्रभारी रंजन कुमार के अनुसार, घटना के बाद एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें 10 लोगों को नामजद किया गया। अब तक छह वयस्कों—सोनू कुमार, रंजन कुमार, सचिन कुमार, श्री कुमार आदि—को गिरफ्तार किया गया है, जबकि दो नाबालिगों को जुवेनाइल होम भेजा गया। लेकिन परिवार का आरोप है कि पुलिस ने पहले ही अतहर पर चोरी का झूठा केस दर्ज कर उन्हें अपराधी साबित करने की कोशिश की। एक तरफ चोरी की एफआईआर में अतहर को आरोपी बनाया गया, वहीं लिंचिंग की शिकायत में देरी हुई। यह दोहरी मानदंड की मिसाल है।
यह घटना बिहार में मॉब लिंचिंग की बढ़ती प्रवृत्ति को उजागर करती है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य में ऐसी घटनाएं आम हो चुकी हैं। 2023 में सारण जिले में एक मुस्लिम युवक को गौ-रक्षा के नाम पर पीट-पीटकर मार डाला गया था। 2024 में पटना के पास एक अन्य मामले में भीड़ ने संदिग्ध चोर को जिंदा जला दिया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 तक बिहार में लिंचिंग से जुड़े 25 से अधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि अफवाहें, सोशल मीडिया पर भड़काऊ सामग्री, और पुलिस की निष्क्रियता इन घटनाओं को बढ़ावा दे रही हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अशरफ फेम ने सोशल मीडिया पर लिखा, “मॉब लिंचिंग की खबरें अब आम हो चुकी हैं। किसी मुसलमान की जान की कीमत कुछ नहीं रह गई है।”
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी उभर रही हैं। विपक्षी दलों ने नीतीश कुमार सरकार पर निशाना साधा है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता ने कहा, “सुशासन बाबू का दावा खोखला साबित हो गया। जहां कानून-व्यवस्था के नाम पर चुनाव लड़ते हैं, वहां खुलेआम हत्या हो रही है।” कांग्रेस ने भी केंद्र और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। वहीं, सत्ताधारी एनडीए ने इसे “व्यक्तिगत अपराध” बताते हुए पुलिस कार्रवाई का समर्थन किया। लेकिन सवाल यह है कि जब ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं, तो सिस्टम की जिम्मेदारी कौन लेगा? बिहार विधानसभा में विपक्ष ने विशेष सत्र बुलाने की मांग की है, ताकि मॉब लिंचिंग विरोधी कानून पर चर्चा हो सके।
कानून-व्यवस्था पर यह घटना एक काला अध्याय जोड़ती है। बिहार, जो कभी सामाजिक सद्भाव का प्रतीक था, आज धार्मिक ध्रुवीकरण का शिकार हो रहा है। केंद्र सरकार ने 2019 में मॉब लिंचिंग को IPC की धारा 153A और 302 के तहत अपराध घोषित किया, लेकिन राज्य स्तर पर सख्ती की कमी है। मानवाधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि पुलिस को भीड़ नियंत्रण के लिए तत्काल प्रशिक्षण और ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। इसके अलावा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अफवाह फैलाने वालों पर सख्ती जरूरी है। यदि ऐसी घटनाओं पर त्वरित न्याय नहीं मिला, तो सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचेगा।
अंत में, अतहर हुसैन की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। सरकार को न केवल अपराधियों को सजा देनी होगी, बल्कि जड़ें मजबूत करनी होंगी। परिवार को न्याय मिले, और बिहार फिर से सुरक्षित बने—यह हर नागरिक की मांग है। अन्यथा, “सुशासन” का नारा केवल जुमला साबित होगा।