12 दिसंबर 2025: भारतीय राजनीति के एक प्रमुख स्तंभ, पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा स्पीकर Shivraj Patil का आज सुबह 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। लातूर जिले के चाकुर गांव में जन्मे इस वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने लंबी बीमारी के बाद अपने निवास ‘देवघर’ में अंतिम सांस ली। उनका निधन न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत विभिन्न दलों के नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की है। अंतिम संस्कार शनिवार को लातूर में ही होगा। इस रिपोर्ट में हम पाटिल के जीवन, राजनीतिक यात्रा, उपलब्धियों, विवादों और विरासत पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
Shivraj Patil का जन्म 12 अक्टूबर 1935 को चाकुर गांव, लातूर जिले (तत्कालीन हैदराबाद राज्य, वर्तमान महाराष्ट्र) में एक पंचमशाली लिंगायत परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम विठ्ठलराव पाटिल चाकुरकर था। बचपन से ही सामाजिक कार्यों में रुचि रखने वाले पाटिल ने हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक (बीएससी) और मुंबई विश्वविद्यालय से विधि स्नातक (एलएलबी) की डिग्री प्राप्त की। जून 1963 में उन्होंने विजयाताई एस. पाटिल से विवाह किया, जिनसे उनका एक पुत्र शैलेश पाटिल चाकुरकर और एक पुत्री स्वप्ना पाटिल हैं। सत्य साई बाबा के अनुयायी पाटिल का अधिकांश समय चाकुर और लातूर में ही बीता। वे एक सादगीपूर्ण जीवन जीने के लिए जाने जाते थे, जहां पारिवारिक मूल्य और सामाजिक सेवा प्राथमिकता थी।
Shivraj Patil की राजनीतिक यात्रा स्थानीय स्तर से शुरू हुई। 1967-69 में वे लातूर नगर पालिका के सदस्य रहे, जहां केशवराव सोनवाने और माणिकराव सोनवाने जैसे नेताओं के मार्गदर्शन में उन्होंने लातूर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। महाराष्ट्र विधानसभा में 1972 से 1980 तक दो कार्यकाल के लिए वे लातूर सिटी से विधायक चुने गए। इस दौरान उन्होंने विधान सभा की लोक उद्यम समिति के अध्यक्ष, कानून एवं न्याय, सिंचाई तथा प्रोटोकॉल के उपमंत्री, उपाध्यक्ष (5 जुलाई 1977 से 2 मार्च 1978) और स्पीकर (17 मार्च 1978 से 6 दिसंबर 1979) जैसे महत्वपूर्ण पद संभाले। राज्य स्तर पर उनकी भूमिका ने उन्हें केंद्रीय राजनीति के द्वार खोल दिए।
केंद्रीय राजनीति में प्रवेश 1980 में सातवीं लोकसभा के लिए लातूर से जीत के साथ हुआ। 1980 से 1999 तक वे सात लगातार लोकसभा चुनाव जीते, लेकिन 2004 में भाजपा की रूपatai पाटिल नीलंगेकर से हार गए। लोकसभा में उन्होंने उपाध्यक्ष (19 मार्च 1990 से 13 मार्च 1991) और स्पीकर (10 जुलाई 1991 से 22 मई 1996) के रूप में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। स्पीकर के तौर पर उन्होंने संसदीय कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए कम्प्यूटरीकरण और सूचना प्रसारण की पहल की। संसद पुस्तकालय भवन का निर्माण, लोकसभा कार्यवाही का प्रसारण (जिसमें प्रश्नकाल का लाइव प्रसारण शामिल) और 1991-95 तक अंतरराष्ट्रीय संसदीय सम्मेलनों में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उनके प्रमुख योगदान थे। जुलाई 2004 से जनवरी 2010 तक वे महाराष्ट्र से राज्यसभा सदस्य भी रहे।
सरकारी भूमिकाओं में पाटिल का सफर इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल से शुरू हुआ। 1980-82 में रक्षा राज्य मंत्री, 1982-83 में वाणिज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), और 1983-84 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, अंतरिक्ष एवं महासागर विकास मंत्री रहे। वे वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के उपाध्यक्ष (1983-86) भी बने। राजीव गांधी सरकार में उन्होंने कार्मिक, रक्षा उत्पादन (1986), और स्वतंत्र प्रभार में नागरिक उड्डयन एवं पर्यटन (1986-89) संभाला। रक्षा, विदेश मामलों, वित्त और सांसदों के वेतन-भत्तों पर समितियों में उनकी सक्रियता उल्लेखनीय रही। 1992 में उन्होंने ‘उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार’ की शुरुआत की और 1999 लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी घोषणा-पत्र समिति के अध्यक्ष बने। 2007 राष्ट्रपति चुनाव में वे उम्मीदवार थे, लेकिन वामपंथियों के विरोध के कारण प्रणब मुखर्जी का नाम आगे आया।
हालांकि, पाटिल का राजनीतिक सफर विवादों से भी घिरा रहा। 22 मई 2004 से 30 नवंबर 2008 तक मनमोहन सिंह सरकार में गृह मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सबसे चर्चित रहा। इस दौरान 2006 मालेगांव बम विस्फोट (मुस्लिम कब्रिस्तान पर हमला) और नंदीग्राम (पश्चिम बंगाल) में सीआरपीएफ तैनाती में देरी जैसे मुद्दों पर आलोचना हुई। लेकिन सबसे बड़ा विवाद 26 नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमलों (26/11) से जुड़ा। हमलों के चार दिन बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। हमलों में 166 लोगों की मौत हुई, और खुफिया विफलता तथा प्रतिक्रिया में देरी के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया। अमेरिकी राजदूत डेविड मुलफोर्ड के लीक डिप्लोमेटिक केबल्स में पाटिल को ‘अक्षम’ और ‘सतर्क न रहने वाला’ कहा गया। मीडिया ने उन्हें ‘भारत का नीरो’ करार दिया, क्योंकि कथित तौर पर हमलों के दौरान वे कपड़े बदलने में व्यस्त थे। उनकी आत्मकथा में इस घटना का उल्लेख नहीं है।
इस्तीफे के बाद पाटिल ने 22 जनवरी 2010 से 21 जनवरी 2015 तक पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ प्रशासक के रूप में सेवा की। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी के अधीन यह पद उनके करियर का अंतिम अध्याय था।
पाटिल के निधन पर राजनीतिक हलकों में शोक की लहर दौड़ गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा, “शिवराज पाटिल जी एक समर्पित नेता थे, जिनकी सेवा देश को याद रहेगी।” राहुल गांधी ने उन्हें ‘कांग्रेस का प्रखर स्तंभ’ बताया। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पुत्र अभिजीत मुखर्जी और अन्य नेताओं ने श्रद्धांजलि दी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने राज्य में शोक दिवस घोषित किया। परिवार ने बताया कि लंबे समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे पाटिल का निधन शांतिपूर्ण था। पुत्र शैलेश ने कहा, “पिता जी हमेशा सेवा और सादगी के प्रतीक रहे।”
Shivraj Patil की विरासत भारतीय राजनीति में अमिट है। एक वकील से स्पीकर, मंत्री और राज्यपाल तक का सफर उनकी कठिन परिश्रम और कांग्रेसी निष्ठा को दर्शाता है। संसदीय सुधारों और रक्षा-विज्ञान क्षेत्र में उनके योगदान सराहनीय हैं, जबकि 26/11 विवाद ने सुरक्षा नीतियों पर बहस छेड़ी। वे महाराष्ट्र के लिंगायत समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में भी जाना जाते थे। उनका निधन कांग्रेसी पीढ़ी के अंत का प्रतीक है, जो नेहरू-इंदिरा युग से जुड़ी थी। आने वाली पीढ़ियों को उनके जीवन से सबक मिलेगा कि राजनीति सेवा का माध्यम है। शोकाकुल परिवार और प्रशंसकों को सांत्वना।