12 दिसंबर 2025: टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बिहार से 63 लाख मजदूरों का पलायन हो चुका है, जिनमें से 71% दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं। यह आंकड़ा राज्य की आर्थिक कमजोरी और रोजगार संकट को उजागर करता है। केवल 25% मजदूर स्थानीय स्तर पर ही काम पा रहे हैं, जबकि बाकी दिल्ली, मुंबई, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में मजदूरी, निर्माण और सेवा क्षेत्र में लगे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पलायन की यह लहर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रेमिटेंस पर निर्भर बना रही है, जो कुल घरेलू आय का 50% तक पहुंच गया है। लेकिन यह सतही समृद्धि है – पलायन के पीछे छिपी सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां बिहार को पीछे धकेल रही हैं।
बिहार, भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य, लंबे समय से पलायन का केंद्र रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य से 74.54 लाख प्रवासी थे, जो अब 1 करोड़ से अधिक हो चुके हैं। TISS की 2025 रिपोर्ट ‘बिहार माइग्रेशन मॉडल’ में 63 लाख मजदूरों का जिक्र है, जो मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों से आते हैं। इनमें से 71% अंतरराज्यीय पलायन कर रहे हैं, जहां वे अनौपचारिक क्षेत्रों में कम मजदूरी पर काम करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, दरभंगा और मधुबनी जैसे जिलों से पलायन दर सबसे अधिक है। एक सर्वे में पाया गया कि 65% परिवारों में कम से कम एक सदस्य दूसरे राज्य में काम कर रहा है। औसतन, प्रत्येक प्रवासी परिवार को सालाना 48,662 रुपये का रेमिटेंस मिलता है, जो घरेलू आय का आधा हिस्सा है। लेकिन यह रेमिटेंस कृषि या स्थानीय उद्योगों में निवेश के बजाय उपभोग पर खर्च हो जाता है, जिससे दीर्घकालिक विकास रुक जाता है।
पलायन के कारण बहुआयामी हैं। बिहार में बेरोजगारी दर 3.9% है, जो राष्ट्रीय औसत से थोड़ी अधिक है, लेकिन कार्यबल भागीदारी दर मात्र 33.5% है – पूरे देश में सबसे कम। कृषि पर निर्भर अर्थव्यवस्था में सिंचाई, बिजली और बाजार की कमी ने किसानों को मजदूरी की ओर धकेल दिया है। TISS के प्रोफेसर मनीष के. झा ने कहा, “पलायन अब निम्न जातियों तक सीमित नहीं; सभी वर्गों से हो रहा है। 1980 के दशक में केवल निचले वर्ग पलायन करते थे, लेकिन अब मध्यम वर्ग भी शामिल है।” कोविड-19 महामारी ने स्थिति बिगाड़ दी। 2020 में 26 लाख मजदूर लौटे थे, लेकिन आर्थिक सुधार न होने से दोबारा पलायन बढ़ गया। विशेषज्ञों का कहना है कि 3 करोड़ तक बिहारी मजदूर दूसरे राज्यों में हैं, जो राज्य की 7.2% आबादी के बराबर है।
इस पलायन का सामाजिक प्रभाव गहरा है। परिवार टूट रहे हैं – महिलाएं और बच्चे घर पर अकेले रह जाते हैं, जिससे बाल श्रम और घरेलू हिंसा बढ़ रही है। TISS रिपोर्ट में उल्लेख है कि पलायन करने वाले 58% परिवारों में महिलाओं की जिम्मेदारी दोगुनी हो गई है। शिक्षा पर असर पड़ रहा है; कई बच्चे स्कूल छोड़कर मजदूरी में लग जाते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से प्रवासी मजदूरों को चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती। एक सर्वे में 90% प्रवासियों ने बताया कि वे बिहार में रोजगार न होने के कारण मजबूरन बाहर जाते हैं।
आर्थिक रूप से, पलायन ने ग्रामीण मजदूरी को तिगुना कर दिया है, लेकिन यह सकारात्मक नहीं। रेमिटेंस ने शोषणकारी संबंधों को कम किया, लेकिन स्थानीय उद्योगों का विकास रुका हुआ है। बिहार का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में प्रवासी रेमिटेंस का योगदान 28% तक है, लेकिन यह स्थायी नहीं। NITI आयोग की 2025 रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार को प्रवासी बेल्ट को मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि रोजगार सृजन हो। सरकार की ‘मुख्यमंत्री प्रवासी रोजगार प्रोत्साहन योजना’ और ‘बिहार प्रवासी उद्यमी योजना’ जैसे प्रयास हैं, लेकिन इन्हें मजबूत करने की जरूरत है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि स्किल डेवलपमेंट सेंटर और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए।
राजनीतिक रूप से, पलायन एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। 2025 विधानसभा चुनावों में प्रवासियों की भूमिका निर्णायक रही। चैठ पूजा के दौरान 3.1 मिलियन प्रवासी लौटे, जिन्होंने 67.14% मतदान प्रतिशत में योगदान दिया। लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान से 93 लाख प्रवासियों का वोटर आईडी प्रभावित हुआ, जिससे मताधिकार संकट पैदा हो गया। आरजेडी सांसद मनोज झा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि प्रवासी मजदूर फॉर्म भरने के लिए घर नहीं लौट पाते।
TISS रिपोर्ट के अनुसार, पलायन रोकने के लिए बिहार को 1 करोड़ नौकरियों की जरूरत है। यदि नौकरियां वोट हों, तो बिहार सबसे अमीर राज्य होता। लेकिन वर्तमान में, यह मॉडल टिकाऊ नहीं। सरकार को कृषि सुधार, औद्योगीकरण और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रेमिटेंस ट्रैकिंग पर फोकस करना चाहिए। प्रो. झा ने कहा, “पलायन बिहार की ताकत है, लेकिन इसे अवसर में बदलना होगा। अन्यथा, यह सामाजिक विघटन लाएगा।”
कुल मिलाकर, 63 लाख मजदूरों का पलायन बिहार की विकास यात्रा में एक काला अध्याय है। 71% का अंतरराज्यीय जाना राज्य को खाली कर रहा है, जबकि रेमिटेंस अस्थायी राहत दे रहा है। यदि समय रहते नीतिगत सुधार न हुए, तो बिहार का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। यह रिपोर्ट TISS की सिफारिशों पर अमल की मांग करती है – प्रवासियों को सम्मान और रोजगार दें, ताकि बिहार घर बने, न कि स्टेशन।