11 दिसंबर 2025: बिहार के सीमांचल क्षेत्र में विकास और स्थानीय हितों के बीच टकराव उभर रहा है। कोचाधामन विधानसभा क्षेत्र के सतभीट्टा, कन्हैयाबाड़ी और शकोर गांवों में प्रस्तावित सैनिक स्टेशन के स्थल चयन को लेकर बुधवार को ग्रामीणों ने एक बड़ी बैठक की। लगभग 200 किसानों और स्थानीय निवासियों ने भाग लिया, जहां भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पर कड़े सवाल उठाए गए। एआईएमआईएम विधायक अख्तरुल इमान ने इस मुद्दे पर समर्थन जताते हुए वैकल्पिक स्थल के पुनर्निर्धारण की मांग की है। बैठक में जिला परिषद अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें 250 एकड़ निजी भूमि पर सैनिक कैंप स्थापित करने के खिलाफ आपत्तियां दर्ज की गईं।
बैठक बहादुरगंज और कोचाधामन अंचलों के अंतर्गत आयोजित हुई, जहां ग्रामीणों ने बताया कि प्रस्तावित साइट पर धार्मिक स्थल, मस्जिदें, मदरसे और घनी आबादी प्रभावित होगी। एक किसान नेता ने कहा, “हमारी खेती-बाड़ी का सहारा है यह जमीन। सेना का कैंप अच्छा है, लेकिन गांव वालों को उजाड़कर नहीं। कम से कम 100 परिवार बेघर हो जाएंगे।” स्थानीयों का आरोप है कि भूमि चयन में पारदर्शिता की कमी है और सर्वेक्षण बिना सूचना के किया गया। सैनिक स्टेशन से रोजगार और विकास की उम्मीद तो है, लेकिन विस्थापन का डर हावी है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि अगर पुनर्विचार न हुआ, तो आंदोलन तेज होगा।
इस बीच, एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान और कोचाधामन विधायक सरवर आलम ने हाल ही में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से पटना में मुलाकात की। उन्होंने ज्ञापन सौंपा, जिसमें सैनिक स्टेशन के स्थल को किशनगंज जिले के बाहरी इलाकों में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया गया। इमान ने कहा, “किशनगंज का विकास हमारी प्राथमिकता है, लेकिन स्थानीयों के हितों की अनदेखी नहीं हो सकती। 250 एकड़ भूमि पर मस्जिद, कब्रिस्तान और स्कूल प्रभावित हैं। वैकल्पिक साइट चुनकर ही प्रोजेक्ट आगे बढ़े।” उपमुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि मुद्दे का शीघ्र समाधान किया जाएगा और संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी जाएगी। यह मुलाकात 7 दिसंबर को हुई, जिसके बाद स्थानीय स्तर पर विरोध की लहर तेज हो गई।
यह विवाद सीमांचल के संवेदनशील भूगोल को दर्शाता है, जहां भारत-बांग्लादेश सीमा के निकट सुरक्षा मजबूत करने के लिए सैनिक स्टेशन की योजना है। केंद्र सरकार की ‘बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट स्कीम’ के तहत यह प्रोजेक्ट 2025-26 में शुरू होने वाला है, जिससे स्थानीय युवाओं को नौकरियां मिलेंगी। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था पहले हो। जिला प्रशासन ने शांति बनाए रखने के लिए पंचायत स्तर पर संवाद की पहल की है, जबकि एआईएमआईएम ने विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाने का ऐलान किया। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परियोजनाओं में सामुदायिक सहमति जरूरी है, वरना विकास की राह में बाधा बनेगी।
कुल मिलाकर, कोचाधामन की यह बैठक विकास और अधिकारों के संतुलन पर बहस छेड़ रही है। अगर समय रहते समाधान न हुआ, तो यह बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। स्थानीय निवासी अब प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं।